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श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में

भागवत पुराण चतुर्थ स्कन्ध: दक्ष यज्ञ, ध्रुव चरित, राजा पृथु और पुरंजन की कथा

चतुर्थ स्कन्ध (31 अध्याय): दक्ष यज्ञ और सती, बालक ध्रुव का तप और ध्रुव पद, पृथ्वी को दुहने वाले राजा पृथु, प्रचेता, और नारद जी की राजा पुरंजन की रूपक कथा।

चित्रण: भागवत पुराण चतुर्थ स्कन्ध: दक्ष यज्ञ, ध्रुव चरित, राजा पृथु और पुरंजन की कथा
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चतुर्थ स्कन्ध में स्वायम्भुव मनु की पुत्रियों और पुत्रों के वंशों की कथाएँ हैं। इसमें भक्ति की सबसे प्रिय बाल-कथा, ध्रुव चरित, और जीवन का गहरा रूपक, पुरंजन की कथा, है।

अध्याय 1 से 7: दक्ष यज्ञ

मनु की पुत्री प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति से हुआ, और उनकी पुत्री सती का विवाह शिव से। एक सभा में शिव जी के उठकर अभिवादन न करने से दक्ष ने अपमान माना, शिव को शाप दिया, और फिर बड़े यज्ञ में शिव को नहीं बुलाया। सती बिना बुलाए गईं, पिता से अपमानित हुईं और योगाग्नि से देह त्याग दी। शिव जी की जटा से वीरभद्र प्रकट हुए और यज्ञ नष्ट किया। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर शिव जी शान्त हुए, दक्ष को बकरे का सिर देकर जीवित किया, और यज्ञ पूरा हुआ। (विस्तृत कथा शिव पुराण के सती खण्ड में है।)

अध्याय 8 से 12: ध्रुव चरित

राजा उत्तानपाद की रानी सुरुचि ने पाँच वर्ष के ध्रुव को पिता की गोद से उतारकर कहा कि भगवान की तपस्या करके मेरे गर्भ से जन्म लो, तब गोद मिलेगी। माँ सुनीति ने कहा: बेटा, किसी का बुरा मत सोचो, भगवान की शरण लो। मार्ग में नारद जी मिले और उन्होंने परीक्षा के लिए कहा: इतनी छोटी उम्र में तप कठिन है, घर लौट जाओ। ध्रुव अडिग रहे। तब नारद जी ने उन्हें मधुवन जाकर "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मन्त्र जपने की विधि दी।

ध्रुव ने छह महीने कठोर तप किया: पहले महीने हर तीसरे दिन फल, दूसरे महीने हर छठे दिन पत्ते, तीसरे महीने हर नौवें दिन जल, चौथे महीने हर बारहवें दिन वायु, और पाँचवें महीने से एक पैर पर खड़े होकर साँस रोककर ध्यान। उनकी साँस रुकने से सारे संसार की साँस रुकने लगी। भगवान गरुड़ पर प्रकट हुए। ध्रुव स्तुति करना नहीं जानते थे; भगवान ने अपना शंख उनके गाल से छुआया, और ध्रुव के मुख से अपने आप सुन्दर स्तुति निकली।

भगवान ने उन्हें ध्रुव लोक दिया, जो प्रलय में भी नष्ट नहीं होता, और 36,000 वर्ष पृथ्वी पर राज्य करने का वर। ध्रुव लौटे; पिता ने उन्हें गले लगाया और राज्य दिया। बाद में ध्रुव के भाई उत्तम को यक्षों ने मार डाला; ध्रुव ने यक्षों से युद्ध किया, पर दादा मनु ने समझाया कि क्रोध छोड़ो, और ध्रुव ने युद्ध रोक दिया। कुबेर ने प्रसन्न होकर वर दिया। अन्त में ध्रुव दिव्य विमान में सशरीर ध्रुव लोक गए, और अपनी माँ सुनीति को भी साथ ले गए।

अध्याय 13 से 23: राजा पृथु

ध्रुव के वंश में राजा अंग का पुत्र वेन अत्याचारी निकला; ऋषियों ने उसे मारा। उसकी भुजाओं के मन्थन से भगवान के अंश राजा पृथु और उनकी पत्नी अर्चि प्रकट हुए। पृथ्वी ने अन्न छिपा लिया था; पृथु ने धनुष उठाया तो पृथ्वी गाय बनकर भागी, फिर शरण आई और बोली: मुझे दुहो, पर बछड़ा और बर्तन चाहिए। पृथु ने मनु को बछड़ा बनाकर अन्न दुहा; ऋषियों, देवताओं, पितरों, असुरों और सबने अपने-अपने बछड़े और बर्तन से अपनी-अपनी वस्तुएँ दुहीं।

पृथु ने सौ अश्वमेध यज्ञ करने चाहे; इन्द्र ने ईर्ष्या से घोड़ा चुराया। भगवान विष्णु ने प्रकट होकर दोनों में मेल कराया। पृथु ने भगवान से वर माँगा: मुझे दस हज़ार कान दीजिए ताकि मैं आपकी कथा सुनता रहूँ। पृथु ने प्रजा को धर्म का उपदेश दिया, सनत्कुमारों से ज्ञान लिया, और अन्त में पत्नी के साथ वन में तप करके भगवान को प्राप्त हुए।

अध्याय 24 से 31: प्रचेता और पुरंजन की कथा

पृथु के वंश में राजा प्राचीनबर्हि ने अनेक यज्ञों में पशु-बलि दी। नारद जी ने उन्हें आकाश में उन पशुओं को दिखाया जो बदला लेने की प्रतीक्षा में थे, और फिर पुरंजन की कथा सुनाई:

पुरंजन की कथा (रूपक): राजा पुरंजन अपने अनजाने मित्र "अविज्ञात" को छोड़कर एक सुन्दर नगर की खोज में निकला। उसे नौ द्वारों वाला एक नगर मिला, जहाँ एक सुन्दर स्त्री अपने ग्यारह सेवकों और एक पाँच फन वाले साँप के साथ रहती थी। पुरंजन उससे विवाह करके वहाँ रहने लगा, उसी के अनुसार हँसता, रोता, खाता और सोता। समय के साथ चण्डवेग नाम का गन्धर्व राजा अपने 360 गन्धर्वों और 360 गन्धर्वियों के साथ नगर पर आक्रमण करने लगा, फिर कालकन्या (बुढ़ापा) आई, और अन्त में यवनराज (मृत्यु) ने नगर जला दिया। मरते समय पुरंजन अपनी पत्नी के बारे में सोच रहा था, इसलिए अगले जन्म में स्त्री बना। अन्त में उसका पुराना मित्र अविज्ञात ब्राह्मण बनकर आया और उसे याद दिलाया कि तुम न पुरुष थे, न स्त्री; तुम मेरे मित्र हंस हो।

रूपक का अर्थ: पुरंजन जीव है, अविज्ञात परमात्मा (सदा का मित्र), नौ द्वारों वाला नगर शरीर (दो आँखें, दो कान, दो नथुने, मुख, गुदा और उपस्थ), सुन्दर स्त्री बुद्धि, ग्यारह सेवक दस इन्द्रियाँ और मन, पाँच फन वाला साँप पाँच प्राण, चण्डवेग समय (360 दिन और 360 रातें, यानी वर्ष), कालकन्या बुढ़ापा, और यवनराज मृत्यु। अर्थ: जीव शरीर और बुद्धि में आसक्त होकर अपने सच्चे मित्र भगवान को भूल जाता है।

यह सुनकर प्राचीनबर्हि ने हिंसा छोड़ दी। उनके दस पुत्र प्रचेताओं ने समुद्र में दस हज़ार वर्ष तप किया, रुद्र गीत (शिव जी का उपदेश) प्राप्त किया, भगवान के दर्शन किए, और वृक्षों की पुत्री मारिषा से विवाह करके दक्ष को पुत्र रूप में पाया।

इस स्कन्ध की सीख

  • अपमान को दृढ़ संकल्प में बदलो, जैसे ध्रुव ने किया; और अपने लक्ष्य से न डिगो।
  • भगवान की कृपा से वह भी कहा जाता है जो हम नहीं जानते; ध्रुव को शंख के स्पर्श से स्तुति मिली।
  • अच्छा राजा (नेता) प्रकृति को सँवारता है और सबको उनका हिस्सा देता है, जैसे पृथु।
  • हम इस शरीर रूपी नगर में मेहमान हैं; भगवान हमारे सच्चे मित्र हैं, उन्हें न भूलें।

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