श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में
भागवत पुराण षष्ठ स्कन्ध: अजामिल उद्धार, नाम महिमा, नारायण कवच और वृत्रासुर
षष्ठ स्कन्ध (19 अध्याय): "नारायण" नाम पुकारने से अजामिल का उद्धार, यमराज द्वारा नाम महिमा, दक्ष पुत्र और नारद, नारायण कवच, दधीचि की अस्थियाँ और वृत्रासुर की भक्ति, और पुंसवन व्रत।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।षष्ठ स्कन्ध भगवान के नाम की महिमा से आरम्भ होता है। अजामिल की कथा भागवत की सबसे प्रसिद्ध कथाओं में है, और इसका सन्देश सरल है: भगवान का नाम अनजाने में लिया जाए, तब भी अपना काम करता है।
अध्याय 1 से 3: अजामिल का उद्धार
कान्यकुब्ज (कन्नौज) में अजामिल नाम का एक ब्राह्मण था, जो युवावस्था में शास्त्रों का ज्ञाता और सदाचारी था। एक दिन वन में उसने एक दासी को देखा और उसके मोह में पड़कर पत्नी, माता-पिता और धर्म छोड़ दिया। जुआ, चोरी और धोखे से परिवार पालने लगा। उसके दस पुत्र हुए, जिनमें सबसे छोटे का नाम "नारायण" था, जिसे वह बहुत प्यार करता था।
अठासी वर्ष की आयु में मृत्यु के समय भयानक यमदूत आए। डरकर अजामिल ने पास खेलते बेटे को पुकारा: "नारायण!" उसी क्षण भगवान के पार्षद (विष्णुदूत) आ गए और यमदूतों को रोक दिया। यमदूतों ने कहा: इसने जीवन भर पाप किए हैं। विष्णुदूतों ने कहा: इसने करोड़ों जन्मों के पापों का प्रायश्चित्त कर लिया, क्योंकि इसने विवश होकर भी "नारायण" नाम पुकारा। जैसे अनजाने में पी गई दवा भी असर करती है और अनजाने में छुई आग भी जलाती है, वैसे ही भगवान का नाम अनजाने में भी पापों को जलाता है।
अजामिल को जीवनदान मिला। उसने यह संवाद सुना था; उसका मन पूरी तरह बदल गया। वह हरिद्वार गया, भगवान के भजन में जीवन बिताया, और अन्त में विष्णुदूत उसे वैकुण्ठ ले गए।
यमदूतों ने यमराज से पूछा, तो यमराज ने कहा: भगवान का नाम-कीर्तन ही इस युग में सबसे बड़ा धर्म है। मेरे दूतों, जो भगवान का नाम लेते हैं, उनके पास कभी मत जाना।
अध्याय 4 और 5: दक्ष और नारद
प्रचेताओं के पुत्र दक्ष ने सृष्टि बढ़ाने के लिए हज़ारों पुत्र उत्पन्न किए। नारद जी ने उन्हें वैराग्य का उपदेश दिया और वे तपस्या में चले गए। दक्ष ने क्रोध में नारद जी को शाप दिया कि तुम कहीं एक स्थान पर टिक नहीं सकोगे। नारद जी ने शाप सहर्ष स्वीकार किया; इसीलिए वे सदा घूमते रहते हैं। फिर दक्ष की साठ पुत्रियाँ हुईं, जिनसे सृष्टि चली।
अध्याय 6 से 8: नारायण कवच
इन्द्र ने अहंकार में गुरु बृहस्पति का अनादर किया; बृहस्पति चले गए और देवता असुरों से हारने लगे। देवताओं ने त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप को अपना गुरु बनाया। विश्वरूप ने इन्द्र को "नारायण कवच" दिया: भगवान के विभिन्न रूपों (मत्स्य, वराह, नृसिंह, वामन, राम आदि) से शरीर के हर अंग और हर दिशा में रक्षा की प्रार्थना वाला स्तोत्र। इस कवच से इन्द्र ने असुरों को जीता। आज भी यह संकट और भय में रक्षा के लिए पढ़ा जाता है।
अध्याय 9 से 13: दधीचि और वृत्रासुर
विश्वरूप के असुरों से भी सम्बन्ध के कारण इन्द्र ने उन्हें मार डाला। क्रोधित त्वष्टा ने यज्ञ से वृत्रासुर को उत्पन्न किया, जो इन्द्र को मारने के लिए था। वृत्र के सामने देवताओं के सब अस्त्र विफल हुए। भगवान ने कहा: दधीचि ऋषि की हड्डियों से बना वज्र ही वृत्र को मार सकता है।
देवता दधीचि ऋषि के पास गए। दधीचि ने कहा: यह शरीर तो एक दिन छूटना ही है; यदि यह दूसरों के काम आए तो इससे बड़ा सौभाग्य क्या? उन्होंने योग से शरीर त्याग दिया, और उनकी हड्डियों से विश्वकर्मा ने वज्र बनाया।
युद्ध में वृत्रासुर ने इन्द्र को भी ललकारा, पर उसकी बातें किसी महान भक्त जैसी थीं। उसने प्रार्थना की: "हे प्रभु, मुझे न स्वर्ग चाहिए, न ब्रह्मलोक, न पृथ्वी का राज्य, न योग की सिद्धियाँ, न मोक्ष; जैसे पंख न निकले चिड़िया के बच्चे माँ की, भूखे बछड़े गाय की, और प्रिय की प्रतीक्षा करती पत्नी पति की राह देखती है, वैसे ही मेरा मन आपके दर्शन को तरसता है।" वृत्र पूर्व जन्म में चित्रकेतु नाम का भक्त था। इन्द्र ने वज्र से उसका वध किया, और वृत्र भगवान के धाम गया।
ब्रह्महत्या के पाप से इन्द्र को कष्ट हुआ, जिसे उन्होंने पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों में बाँट दिया, और अश्वमेध से शुद्ध हुए।
अध्याय 14 से 17: चित्रकेतु
राजा चित्रकेतु की करोड़ों रानियाँ थीं पर सन्तान नहीं। अंगिरा ऋषि की कृपा से पुत्र हुआ, जिसे सौतनों ने ईर्ष्या से विष देकर मार डाला। शोक में डूबे राजा को नारद जी ने मृत बालक की आत्मा से बात कराई, जिसने कहा: मेरे अनगिनत जन्मों में अनगिनत माता-पिता हुए; किसके लिए शोक करूँ? राजा का मोह टूटा और वे भक्त बने। बाद में एक बार उन्होंने शिव जी को पार्वती के साथ सभा में देखकर उपहास किया, तो पार्वती जी ने उन्हें असुर बनने का शाप दिया; वही वृत्रासुर बने।
अध्याय 18 और 19: मरुत और पुंसवन व्रत
दिति ने इन्द्र को मारने वाला पुत्र पाने के लिए कठोर व्रत किया। इन्द्र ने सेवा का बहाना करके अवसर पाकर गर्भ के उनचास टुकड़े कर दिए, पर भगवान की कृपा से वे सब जीवित रहे और उनचास मरुत (वायु देवता) बने, जो इन्द्र के ही मित्र हुए। अन्त में पुंसवन व्रत की विधि है, जो उत्तम सन्तान और परिवार के कल्याण के लिए मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा से एक वर्ष तक किया जाता है।
इस स्कन्ध की सीख
- भगवान का नाम सबसे सरल और सबसे शक्तिशाली साधन है; बच्चों के नाम भगवान के नाम पर रखने की परम्परा इसी से है।
- एक भूल से जीवन भटक सकता है, पर एक सच्चा मोड़ उसे बचा भी सकता है।
- दूसरों के हित के लिए त्याग सबसे बड़ा धर्म है, जैसे दधीचि का।
- सच्ची भक्ति में कोई माँग नहीं, केवल भगवान की चाह होती है (वृत्रासुर की प्रार्थना)।
- गुरु का अनादर (इन्द्र) शक्ति छीन लेता है।
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