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श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 10: विभूतियोग — भगवान की विभूतियाँ, सरल अर्थ

गीता का दसवाँ अध्याय, सभी 42 श्लोकों का भाव क्रम से: भगवान सबके मूल, भक्त के हृदय में ज्ञान का दीपक, अर्जुन की स्तुति, और सूर्य, ओंकार से लेकर "शस्त्रधारियों में राम" तक भगवान की विभूतियाँ।

चित्रण: भगवद गीता अध्याय 10: विभूतियोग — भगवान की विभूतियाँ, सरल अर्थ
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दसवें अध्याय में भगवान बताते हैं कि उन्हें संसार में कहाँ-कहाँ देखा जा सकता है। जो भी वस्तु सबसे सुन्दर, सबसे बलवान, सबसे श्रेष्ठ है, उसमें उनका तेज है। यह अध्याय ध्यान के लिए एक सरल मार्ग देता है: संसार की हर महानता को देखकर ईश्वर को याद करना।

श्लोक 1 से 7: मेरे मूल को कोई नहीं जानता

श्रीकृष्ण कहते हैं: हे महाबाहो, फिर मेरे परम वचन सुनो। मेरी उत्पत्ति को न देवता जानते हैं, न महर्षि, क्योंकि मैं सब प्रकार से उनका भी आदि हूँ। जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में मोह रहित होकर सब पापों से छूट जाता है।

बुद्धि, ज्ञान, असम्मोह, क्षमा, सत्य, इन्द्रिय-संयम, मन का संयम, सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु, भय, अभय, अहिंसा, समता, सन्तोष, तप, दान, यश और अपयश, प्राणियों के ये अलग-अलग भाव मुझसे ही होते हैं। सात महर्षि, उनसे पहले के चार सनकादि और चौदह मनु मेरे मन से उत्पन्न हुए, जिनकी यह सारी प्रजा है। जो मेरी इस विभूति और योग-शक्ति को तत्त्व से जानता है, वह अविचल भक्ति योग से युक्त होता है।

श्लोक 8 से 11: भक्त के हृदय में दीपक

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥ (10.8)

अर्थ: मैं ही सबकी उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब चलता है। यह जानकर बुद्धिमान भक्त प्रेम भाव से मुझे भजते हैं।

वे मुझमें मन और प्राण लगाकर, आपस में मेरी चर्चा करते हुए, एक-दूसरे को मेरी कथा सुनाते हुए सन्तुष्ट और आनन्दित रहते हैं। उन निरन्तर प्रेम से भजने वालों को मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे पाते हैं (10.10)। उन पर कृपा करने के लिए मैं उनके हृदय में स्थित होकर ज्ञान के प्रकाशमान दीपक से अज्ञान का अन्धकार नष्ट कर देता हूँ (10.11)।

श्लोक 12 से 18: अर्जुन की स्तुति और प्रार्थना

अर्जुन कहते हैं: आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं। सब ऋषि, देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास आपको सनातन दिव्य पुरुष, आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं, और आप स्वयं भी मुझसे यही कहते हैं। हे केशव, आप जो कुछ कहते हैं, उसे मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन, आपके व्यक्तित्व को न देवता जानते हैं, न दानव। हे पुरुषोत्तम, हे भूतभावन, हे देवों के देव, हे जगत्पति, आप स्वयं ही अपने को जानते हैं। जिन विभूतियों से आप इन लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं, उन्हें पूरी तरह बताइए। मैं आपका सदा चिन्तन करते हुए आपको कैसे जानूँ, और किन-किन भावों में आपका चिन्तन करूँ? आपकी अमृत जैसी वाणी सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 19 से 42: भगवान की विभूतियाँ

श्रीकृष्ण कहते हैं: मेरी विभूतियों का अन्त नहीं, इसलिए मैं मुख्य-मुख्य बताता हूँ।

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥ (10.20)

अर्थ: हे गुडाकेश (निद्रा को जीतने वाले अर्जुन), मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ; मैं ही सब प्राणियों का आदि, मध्य और अन्त हूँ।

  • अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु, ज्योतियों में सूर्य, मरुतों में मरीचि और नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ।
  • वेदों में सामवेद, देवताओं में इन्द्र, इन्द्रियों में मन और प्राणियों में चेतना हूँ।
  • रुद्रों में शंकर, यक्ष-राक्षसों में कुबेर, वसुओं में अग्नि और पर्वतों में सुमेरु हूँ।
  • पुरोहितों में बृहस्पति, सेनापतियों में स्कन्द (कार्तिकेय) और जलाशयों में समुद्र हूँ।
  • महर्षियों में भृगु, वाणी में एक अक्षर ॐ, यज्ञों में जप यज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय हूँ।
  • वृक्षों में पीपल, देवर्षियों में नारद, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।
  • घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न उच्चैःश्रवा, हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा हूँ।
  • शस्त्रों में वज्र, गायों में कामधेनु, सन्तान उत्पत्ति का कारण कामदेव और सर्पों में वासुकि हूँ।
  • नागों में शेषनाग, जलचरों के स्वामी वरुण, पितरों में अर्यमा और शासन करने वालों में यमराज हूँ।
  • दैत्यों में प्रह्लाद, गणना करने वालों में काल, पशुओं में सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ।
  • पवित्र करने वालों में वायु, "रामः शस्त्रभृतामहम्" — शस्त्रधारियों में राम, मछलियों में मगर और नदियों में गंगा हूँ (10.31)।
  • सृष्टियों का आदि, मध्य और अन्त, विद्याओं में अध्यात्म विद्या और वाद करने वालों में तत्त्व-निर्णय वाला वाद हूँ।
  • अक्षरों में अकार, समासों में द्वन्द्व समास, अक्षय काल और सब ओर मुख वाला धाता (पालनकर्ता) हूँ।
  • सबका नाश करने वाली मृत्यु और आगे होने वालों की उत्पत्ति हूँ; स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ।
  • सामों में बृहत्साम, छन्दों में गायत्री, महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसन्त हूँ।
  • छल करने वालों में जुआ, तेजस्वियों का तेज, विजय, निश्चय और सात्त्विकों का सत्त्व हूँ।
  • वृष्णिवंशियों में वासुदेव, पाण्डवों में अर्जुन, मुनियों में व्यास और कवियों में शुक्राचार्य हूँ।
  • दमन करने वालों का दण्ड, विजय चाहने वालों की नीति, गुप्त रखने योग्य भावों में मौन और ज्ञानियों का ज्ञान हूँ।
  • सब प्राणियों का बीज भी मैं हूँ; ऐसा कोई चर या अचर प्राणी नहीं जो मुझसे रहित हो।

मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं; यह तो मैंने संक्षेप में कहा।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥ (10.41)

अर्थ: जो-जो भी विभूति युक्त, शोभा युक्त या शक्ति युक्त वस्तु है, उस-उस को तुम मेरे तेज के एक अंश से उत्पन्न जानो।

अथवा हे अर्जुन, इतना विस्तार जानने से क्या लाभ? मैं इस सारे जगत को अपनी योग-शक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ (10.42)।

इस अध्याय की सीख

  • जहाँ भी असाधारण सुन्दरता, शक्ति या गुण दिखे, वहाँ ईश्वर का अंश देखो; यह सरल ध्यान है।
  • सत्संग, भगवान की चर्चा और कथा-श्रवण से भक्ति बढ़ती है, और ईश्वर स्वयं हृदय में ज्ञान का दीपक जलाते हैं।
  • "शस्त्रधारियों में मैं राम हूँ": मर्यादा के साथ बल ही ईश्वरीय बल है।
  • पूरा ब्रह्माण्ड भगवान के एक अंश में है; इतनी विशालता के सामने अहंकार टिक नहीं सकता।

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