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श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 12: भक्तियोग — प्रिय भक्त के लक्षण, सम्पूर्ण सरल अर्थ

गीता का बारहवाँ अध्याय, सभी 20 श्लोकों का भाव क्रम से: साकार या निराकार उपासना, हर प्रकार के व्यक्ति के लिए साधना की सीढ़ी, और भगवान को प्रिय भक्त के लक्षण।

चित्रण: भगवद गीता अध्याय 12: भक्तियोग — प्रिय भक्त के लक्षण, सम्पूर्ण सरल अर्थ
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बारहवाँ अध्याय गीता का सबसे छोटा अध्याय है, केवल 20 श्लोक, पर बहुत से घरों में इसका प्रतिदिन पाठ होता है। इसमें भगवान बताते हैं कि जो जहाँ है, वहीं से भक्ति आरम्भ कर सकता है, और अन्त में अपने प्रिय भक्त के गुण गिनाते हैं, जो किसी भी अच्छे मनुष्य का चित्र है।

श्लोक 1: अर्जुन का प्रश्न

अर्जुन पूछते हैं: जो भक्त निरन्तर आप में लगे रहकर आपके (साकार) रूप की उपासना करते हैं, और जो अविनाशी, अव्यक्त (निराकार) ब्रह्म की उपासना करते हैं, उन दोनों में योग को कौन अधिक अच्छी तरह जानता है?

श्लोक 2 से 7: साकार भक्ति सरल है

श्रीकृष्ण कहते हैं: जो मुझमें मन लगाकर, नित्य युक्त होकर, परम श्रद्धा से मेरी उपासना करते हैं, वे मेरे मत में सबसे श्रेष्ठ योगी हैं। जो इन्द्रियों को वश में रखकर, सब जगह सम बुद्धि वाले, सब प्राणियों के हित में लगे, अचिन्त्य, सर्वव्यापी, अकथनीय, कूटस्थ, अचल, नित्य, अव्यक्त अक्षर की उपासना करते हैं, वे भी मुझे ही पाते हैं। पर अव्यक्त में मन लगाने वालों को अधिक कष्ट होता है, क्योंकि देहधारियों के लिए अव्यक्त की गति कठिन है।

जो सब कर्म मुझे अर्पित करके, मेरे परायण होकर, अनन्य भक्ति योग से मेरा ध्यान करते हुए मुझे भजते हैं, उन मुझमें चित्त लगाने वालों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूपी संसार-सागर से उद्धार करने वाला बनता हूँ।

श्लोक 8 से 12: साधना की सीढ़ी

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ (12.8)

अर्थ: मुझमें ही मन लगाओ, मुझमें ही बुद्धि लगाओ; इसके बाद तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें संशय नहीं।

भगवान जानते हैं कि हर कोई ऐसा नहीं कर पाता, इसलिए वे सीढ़ी बताते हैं:

  • पहली सीढ़ी: यदि मन मुझमें स्थिर नहीं कर सकते, तो अभ्यास योग से मुझे पाने की इच्छा करो (बार-बार मन को मेरी ओर लाओ)।
  • दूसरी सीढ़ी: यदि अभ्यास भी नहीं कर सकते, तो मेरे लिए कर्म करने वाले बनो; मेरे लिए कर्म करते हुए भी सिद्धि पाओगे।
  • तीसरी सीढ़ी: यदि यह भी नहीं कर सकते, तो मेरे आश्रित होकर, मन को वश में करके सब कर्मों के फल का त्याग करो।

अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, और ध्यान से कर्मफल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तुरन्त शान्ति मिलती है (12.12)।

श्लोक 13 से 20: प्रिय भक्त के लक्षण

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ (12.13)
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ (12.14)

अर्थ: जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में सम और क्षमाशील है; जो सदा सन्तुष्ट, योगी, मन को वश में रखने वाला और दृढ़ निश्चय वाला है, और जिसने मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दी है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है।

  • जिससे संसार को उद्वेग (परेशानी) नहीं होता और जो संसार से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और उद्वेग से मुक्त है, वह मुझे प्रिय है (12.15)।
  • जो किसी से कुछ अपेक्षा नहीं रखता, बाहर-भीतर से शुद्ध, कुशल (दक्ष), पक्षपात रहित और दुःखों से छूटा हुआ है, और जिसने सब (स्वार्थ भरे) आरम्भ त्याग दिए हैं, वह मुझे प्रिय है (12.16)।
  • जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, और शुभ-अशुभ का त्यागी है, वह भक्तिमान मुझे प्रिय है (12.17)।
  • जो शत्रु और मित्र में, मान और अपमान में, सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख में सम है और आसक्ति से रहित है (12.18);
  • जो निन्दा और स्तुति को समान मानता है, मननशील (कम बोलने वाला) है, जो कुछ मिले उसी में सन्तुष्ट है, जिसका कोई स्थायी ठिकाना (ममता का घर) नहीं, जो स्थिर बुद्धि वाला है, वह भक्तिमान मुझे प्रिय है (12.19)।

जो श्रद्धावान भक्त मुझे परम लक्ष्य मानकर इस धर्ममय अमृत का ऊपर कहे अनुसार पालन करते हैं, वे मुझे अत्यन्त प्रिय हैं (12.20)।

इस अध्याय की सीख

  • भक्ति के लिए कोई ऊँची योग्यता नहीं चाहिए; जहाँ हो, वहीं से आरम्भ करो।
  • मन न लगे तो अभ्यास करो; अभ्यास न हो तो भगवान के लिए काम करो; वह भी न हो तो फल की चिन्ता छोड़ो।
  • सच्चा भक्त पहचाना जाता है उसके स्वभाव से: किसी से द्वेष नहीं, सबसे मित्रता, दया, क्षमा और सन्तोष।
  • जिससे कोई परेशान न हो और जो किसी से परेशान न हो, वह भगवान को प्रिय है।

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