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श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 2: सांख्ययोग — कर्मण्येवाधिकारस्ते और स्थितप्रज्ञ, सरल अर्थ

गीता का दूसरा अध्याय, सभी 72 श्लोकों का भाव क्रम से: अर्जुन की शरणागति, आत्मा की अमरता, क्षत्रिय धर्म, कर्मयोग और "कर्मण्येवाधिकारस्ते", तथा स्थितप्रज्ञ के लक्षण।

चित्रण: भगवद गीता अध्याय 2: सांख्ययोग — कर्मण्येवाधिकारस्ते और स्थितप्रज्ञ, सरल अर्थ
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दूसरा अध्याय पूरी गीता का सार कहा जाता है। इसमें श्रीकृष्ण पहली बार बोलते हैं, और आत्मा, कर्तव्य, कर्मयोग और स्थिर बुद्धि, चारों बड़े विषयों की नींव यहीं रख देते हैं। आगे के सोलह अध्याय इन्हीं बातों का विस्तार हैं।

श्लोक 1 से 10: अर्जुन की शरणागति

श्रीकृष्ण आँसुओं से भरे अर्जुन से कहते हैं: इस संकट में तुम्हें यह मोह कहाँ से आ गया? यह श्रेष्ठ पुरुषों के योग्य नहीं। "क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ" — हे पार्थ, नपुंसकता (कायरता) को मत अपनाओ; हृदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।

अर्जुन कहते हैं: मैं पूज्य भीष्म और द्रोण पर बाण कैसे चलाऊँ? गुरुजनों को मारकर उनके रक्त से सने भोग भोगने से तो भीख माँगकर खाना अच्छा है। हम यह भी नहीं जानते कि हमारा जीतना अच्छा है या उनका। फिर वह गीता की पहली प्रार्थना करते हैं:

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥ (2.7)

अर्थ: कायरता के दोष से मेरा स्वभाव दब गया है और धर्म के विषय में मेरा मन मोहित है। मैं आपसे पूछता हूँ: जो निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे शिक्षा दीजिए।

"मैं युद्ध नहीं करूँगा" कहकर अर्जुन चुप हो जाते हैं, और श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए उपदेश आरम्भ करते हैं।

श्लोक 11 से 30: आत्मा अमर है

श्रीकृष्ण कहते हैं: तुम उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक के योग्य नहीं, और बातें विद्वानों जैसी करते हो। ज्ञानी न जीवितों के लिए शोक करते हैं, न मृतकों के लिए। ऐसा कोई समय नहीं था जब मैं, तुम या ये राजा नहीं थे, और न आगे कभी ऐसा होगा कि हम न रहें (2.12)। जैसे इस शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा आते हैं, वैसे ही मृत्यु के बाद दूसरा शरीर मिलता है; धीर पुरुष इससे मोहित नहीं होता (2.13)।

सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख इन्द्रियों के विषयों के संयोग से आते-जाते हैं; ये अनित्य हैं, इन्हें सहन करो (2.14)। जो इनसे विचलित नहीं होता, वही अमरता के योग्य है। असत् का अस्तित्व नहीं और सत् का अभाव नहीं (2.16)। जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उस अविनाशी को कोई नष्ट नहीं कर सकता।

न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ (2.20)

अर्थ: आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। यह न कभी उत्पन्न हुई, न होगी। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है; शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती।

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ (2.22)

अर्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र छोड़कर नए वस्त्र पहन लेता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर धारण कर लेती है।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥ (2.23)

अर्थ: इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती।

श्रीकृष्ण आगे कहते हैं: यदि तुम आत्मा को बार-बार जन्म लेने और मरने वाला भी मानो, तब भी शोक उचित नहीं, क्योंकि जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है (2.27)। सभी प्राणी जन्म से पहले अव्यक्त थे, मृत्यु के बाद भी अव्यक्त हो जाते हैं, बीच में ही प्रकट हैं; फिर शोक कैसा? इस आत्मा को कोई आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह कहता है, और सुनकर भी कोई इसे नहीं जानता। सबके शरीर में स्थित आत्मा सदा अवध्य है।

श्लोक 31 से 38: स्वधर्म का पालन

अपने धर्म को देखकर भी तुम्हें डगमगाना नहीं चाहिए; क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं। ऐसा युद्ध अपने आप खुला हुआ स्वर्ग का द्वार है। यदि तुम यह धर्मयुद्ध नहीं करोगे तो अपना धर्म और कीर्ति खोकर पाप के भागी बनोगे। लोग सदा तुम्हारी अपकीर्ति कहेंगे, और सम्मानित व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है। महारथी समझेंगे कि तुम डरकर भाग गए। मारे गए तो स्वर्ग पाओगे, जीते तो पृथ्वी का राज्य भोगोगे; इसलिए निश्चय करके युद्ध के लिए उठो। सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय को समान समझकर युद्ध करो, तब तुम्हें पाप नहीं लगेगा (2.38)।

श्लोक 39 से 53: कर्मयोग की बुद्धि

अब तक सांख्य (ज्ञान) की दृष्टि से बात हुई, अब योग (निष्काम कर्म) की बुद्धि सुनो, जिससे तुम कर्म के बन्धन से छूट जाओगे। इस मार्ग में आरम्भ का नाश नहीं होता और उलटा फल भी नहीं होता; इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से बचाता है (2.40)। इस मार्ग में निश्चयात्मक बुद्धि एक होती है, जबकि अस्थिर लोगों की बुद्धियाँ अनन्त शाखाओं वाली होती हैं।

जो लोग वेदों के फल बताने वाले वाक्यों में ही रमे रहते हैं, भोग और ऐश्वर्य के लिए कर्मकाण्ड करते हैं, उनकी बुद्धि समाधि में स्थिर नहीं होती। वेद तीन गुणों के विषय बताते हैं; हे अर्जुन, तुम तीनों गुणों से ऊपर उठो, द्वन्द्वों से रहित, नित्य सत्त्व में स्थित और आत्मवान बनो।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (2.47)

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। तुम कर्मफल के कारण मत बनो, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

सरल शब्दों में: पूरा मन लगाकर काम करो; परिणाम पर चिन्ता करके काम बिगाड़ो मत; और "फल तो मेरे हाथ में नहीं" कहकर काम छोड़ भी मत दो।

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥ (2.48)

अर्थ: हे धनंजय, आसक्ति त्यागकर, सफलता और असफलता में समान रहकर, योग में स्थित होकर कर्म करो। यह समता ही योग कहलाती है।

फल की इच्छा से किया कर्म बुद्धियोग से बहुत नीचा है; फल चाहने वाले दीन हैं। समबुद्धि वाला पुण्य और पाप दोनों से ऊपर उठ जाता है, इसलिए योग में लगो: "योगः कर्मसु कौशलम्" — कर्मों में कुशलता ही योग है (2.50)। ऐसे ज्ञानी जन्म के बन्धन से मुक्त होकर निर्दोष पद पाते हैं। जब तुम्हारी बुद्धि मोह के दलदल को पार कर लेगी और सुनी-सुनाई बातों से विचलित न होकर परमात्मा में अचल हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त करोगे।

श्लोक 54 से 72: स्थितप्रज्ञ के लक्षण

अर्जुन पूछते हैं: स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति के क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता, बैठता और चलता है?

श्रीकृष्ण बताते हैं: जब मनुष्य मन की सारी कामनाएँ त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है (2.55)। जो दुःख में उद्विग्न नहीं होता, सुख की लालसा नहीं रखता, और जिसके राग, भय और क्रोध मिट गए हैं, वह स्थिर बुद्धि वाला मुनि है (2.56)। जो शुभ पाकर हर्षित और अशुभ पाकर द्वेष नहीं करता, उसकी बुद्धि स्थिर है। जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, वैसे ही जो इन्द्रियों को विषयों से समेट लेता है, उसकी प्रज्ञा स्थिर है (2.58)।

इन्द्रियाँ इतनी बलवान हैं कि यत्न करने वाले बुद्धिमान का मन भी बलपूर्वक हर लेती हैं। इसलिए उन्हें वश में करके मुझमें मन लगाओ। मन का पतन कैसे होता है, यह श्रीकृष्ण एक सीढ़ी की तरह बताते हैं:

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥ (2.62)
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥ (2.63)

अर्थ: विषयों का चिन्तन करने से उनमें आसक्ति होती है, आसक्ति से कामना, कामना (पूरी न होने) से क्रोध, क्रोध से मूढ़ता, मूढ़ता से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से मनुष्य का पतन हो जाता है।

राग-द्वेष से मुक्त होकर, वश में की हुई इन्द्रियों से विषयों में विचरने वाला व्यक्ति प्रसन्नता पाता है, और प्रसन्नता में सारे दुःख नष्ट हो जाते हैं। अयुक्त व्यक्ति में न बुद्धि होती है, न भावना; भावना के बिना शान्ति नहीं, और अशान्त को सुख कहाँ? (2.66) जैसे हवा नाव को बहा ले जाती है, वैसे ही भटकती इन्द्रियों के पीछे चलने वाला मन बुद्धि को बहा ले जाता है।

जो सब प्राणियों के लिए रात है, उसमें संयमी जागता है, और जिसमें प्राणी जागते हैं, वह मुनि के लिए रात है (2.69)। जैसे नदियों का जल भरते रहने पर भी समुद्र अपनी मर्यादा में अचल रहता है, वैसे ही जिसमें सब कामनाएँ समा जाती हैं, वही शान्ति पाता है, कामनाओं के पीछे भागने वाला नहीं (2.70)। जो सब कामनाएँ छोड़कर ममता, अहंकार और लालसा से रहित होकर विचरता है, वह शान्ति पाता है (2.71)। यही ब्राह्मी स्थिति है; इसे पाकर मनुष्य मोहित नहीं होता, और अन्त समय में भी इसमें स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण पाता है (2.72)।

इस अध्याय की सीख

  • तुम शरीर नहीं, आत्मा हो। शरीर बदलता है, तुम नहीं। यह समझ भय और शोक को कम करती है।
  • अपना कर्तव्य पूरी लगन से करो, फल ईश्वर पर छोड़ दो। परिणाम की चिन्ता काम की गुणवत्ता घटाती है।
  • सफलता और असफलता में मन को सम रखना ही योग है।
  • क्रोध अचानक नहीं आता; वह विषयों के चिन्तन से शुरू होता है। पतन की सीढ़ी को पहले कदम पर ही रोको।

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