सहायता और पूछताछ: ☎ +91 7309990011 WhatsApp ✉ info@websofy.com
श्रीराम जन्मभूमि प्रतीकश्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

ग्रन्थ अध्याय

श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग — सरल हिन्दी अर्थ और सार

गीता का पहला अध्याय, सभी 47 श्लोकों का भाव क्रम से: धृतराष्ट्र का प्रश्न, कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाएँ, शंखनाद, और अर्जुन का शोक जिसके कारण वे धनुष रख देते हैं।

चित्रण: भगवद गीता अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग — सरल हिन्दी अर्थ और सार
अपनी भाषा में पढ़ें

English · বাংলা · मराठी · ગુજરાતી · ਪੰਜਾਬੀ · தமிழ் · తెలుగు · ಕನ್ನಡ · മലയാളം · ଓଡ଼ିଆ · नेपाली · اردو

अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।

गीता का आरम्भ शोक से होता है, उपदेश से नहीं। पहला अध्याय बताता है कि सबसे वीर व्यक्ति भी मोह में फँस सकता है, और यहीं से ज्ञान की आवश्यकता जन्म लेती है। इसलिए इस अध्याय का नाम "अर्जुनविषादयोग" है: अर्जुन का विषाद (दुःख) भी योग बन गया, क्योंकि उसी से गीता का ज्ञान प्रकट हुआ।

श्लोक 1: धृतराष्ट्र का प्रश्न

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥

अर्थ: धृतराष्ट्र पूछते हैं: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

अन्धे राजा धृतराष्ट्र महल में बैठे हैं। "मेरे पुत्र" और "पाण्डु के पुत्र" कहकर वे अनजाने में अपना पक्षपात प्रकट कर देते हैं। यही "मेरा-तेरा" का भाव पूरे युद्ध की जड़ है।

श्लोक 2 से 11: दुर्योधन द्रोणाचार्य के पास

संजय बताते हैं कि पाण्डवों की व्यूह-रचना देखकर दुर्योधन अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास गया। उसने पाण्डव सेना के महारथियों के नाम गिनाए: भीम और अर्जुन के समान योद्धा युयुधान (सात्यकि), विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज, शैब्य, युधामन्यु, उत्तमौजा, अभिमन्यु और द्रौपदी के पाँचों पुत्र। फिर अपनी सेना के वीर गिनाए: स्वयं द्रोण, भीष्म, कर्ण, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण और भूरिश्रवा। फिर कहा कि भीष्म द्वारा रक्षित हमारी सेना "अपर्याप्त" है और भीम द्वारा रक्षित उनकी सेना "पर्याप्त" (कुछ टीकाकार अपर्याप्त का अर्थ "अपरिमित" करते हैं, कुछ "अपूर्ण")। अन्त में उसने कहा कि सब लोग अपने-अपने स्थान पर रहकर भीष्म की रक्षा करें। दुर्योधन की बातों में भय और चिन्ता छिपी है; अधर्म के पक्ष में खड़े व्यक्ति के मन में शान्ति नहीं होती।

श्लोक 12 से 19: शंखनाद

दुर्योधन का उत्साह बढ़ाने के लिए पितामह भीष्म ने सिंह की तरह गरजकर शंख बजाया। फिर कौरव सेना में शंख, नगाड़े, ढोल और नरसिंघे एक साथ बज उठे। उत्तर में सफ़ेद घोड़ों वाले रथ पर बैठे श्रीकृष्ण और अर्जुन ने दिव्य शंख बजाए: श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य, अर्जुन ने देवदत्त और भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख। युधिष्ठिर ने अनन्तविजय, नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक बजाया। काशिराज, शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र और अभिमन्यु ने भी शंख बजाए। उस भयंकर घोष ने आकाश और पृथ्वी को गुँजा दिया और धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिए।

श्लोक 20 से 27: अर्जुन दोनों सेनाओं के बीच

युद्ध आरम्भ होने ही वाला था। हनुमान जी के चिह्न वाली ध्वजा के रथ पर बैठे अर्जुन ने धनुष उठाया और श्रीकृष्ण से कहा: हे अच्युत, मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कीजिए, ताकि मैं देख सकूँ कि मुझे किनसे युद्ध करना है। श्रीकृष्ण ने रथ भीष्म और द्रोण के ठीक सामने खड़ा करके कहा: "हे पार्थ, इन इकट्ठे हुए कौरवों को देखो।"

अर्जुन ने देखा: सामने पिता के समान चाचा-ताऊ, पितामह, गुरु, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र, ससुर और हितैषी खड़े हैं। सब अपने ही थे। यह देखकर वे करुणा से भर गए।

श्लोक 28 से 35: अर्जुन का शोक

अर्जुन कहते हैं: हे कृष्ण, युद्ध के लिए खड़े इन स्वजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुँह सूख रहा है, शरीर काँप रहा है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं। गाण्डीव धनुष हाथ से छूट रहा है, त्वचा जल रही है, मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा, मन भ्रमित हो रहा है। मुझे अपशकुन दिखाई दे रहे हैं। अपने ही लोगों को मारकर मुझे कोई कल्याण नहीं दिखता। मैं न विजय चाहता हूँ, न राज्य, न सुख। जिनके लिए राज्य और सुख चाहिए, वही तो यहाँ प्राण देने को खड़े हैं। तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन्हें नहीं मारना चाहता, पृथ्वी की तो बात ही क्या।

श्लोक 36 से 46: कुल-धर्म के नाश का भय

अर्जुन तर्क देते हैं: धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी? ये आततायी हैं, फिर भी इन्हें मारने से हमें पाप ही लगेगा। लोभ से इनकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई है और ये कुल-नाश के दोष को नहीं देखते, पर हम तो देखते हैं। कुल का नाश होने से सनातन कुल-धर्म नष्ट होते हैं, धर्म के नष्ट होने पर अधर्म फैलता है, स्त्रियाँ दूषित होती हैं, वर्णसंकर उत्पन्न होते हैं, और पितरों को पिण्ड-जल मिलना बन्द हो जाता है। अहो! हम राज्य-सुख के लोभ में अपने ही लोगों को मारने को तैयार हो गए, यह कितना बड़ा पाप है। इससे तो अच्छा है कि मैं शस्त्र छोड़ दूँ और निहत्था रहूँ, और कौरव मुझे युद्ध में मार डालें।

श्लोक 47: अर्जुन धनुष रख देते हैं

एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥

अर्थ: रणभूमि में ऐसा कहकर, शोक से व्याकुल मन वाले अर्जुन बाण सहित धनुष छोड़कर रथ के पिछले भाग में बैठ गए।

इस अध्याय की सीख

  • अर्जुन की बातें दयालु लगती हैं, पर वे कर्तव्य से नहीं, मोह से निकली हैं। करुणा और मोह में अन्तर पहचानना जीवन की बड़ी कला है।
  • संकट में मन तर्क गढ़ लेता है ताकि कठिन काम से बचा जा सके। अर्जुन के सारे तर्क इसी के उदाहरण हैं।
  • जब मन उलझ जाए, तब किसी सच्चे मार्गदर्शक की शरण लेना पहला कदम है। अगले अध्याय में अर्जुन यही करते हैं।
  • घबराहट के शारीरिक लक्षण (मुँह सूखना, काँपना) अर्जुन जैसे महावीर को भी होते हैं; इन्हें स्वीकार करना कमज़ोरी नहीं।

अंतिम अद्यतन:

आगे पढ़ें

अध्यात्म

शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में

शिव पुराण अपनी सात संहिताओं में, क्रम से: शिव महिमा, अग्नि-स्तम्भ की कथा, सती और पार्वती, कार्तिकेय और गणेश का जन्म, द्वादश ज्योतिर्लिंग, शिव के अवतार और शिव पूजा की विध…

अध्यात्म

श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

मार्कण्डेय पुराण की दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य): मधु-कैटभ, महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज की कथा सहित सभी 13 अध्याय क्रम से, और नवरात्रि में पाठ की व…

अध्यात्म

गरुड़ पुराण: सरल हिन्दी में भाग-दर-भाग

गरुड़ पुराण शान्त और सरल भाषा में, क्रम से: गरुड़ जी के प्रश्न, मृत्यु के बाद जीव की यात्रा, कर्म और उनके फल, तेरह दिनों के संस्कार, दान का महत्त्व और मोक्ष का मार्ग।