श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
भगवद गीता अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोग — सरल हिन्दी अर्थ और सार
गीता का पाँचवाँ अध्याय, सभी 29 श्लोकों का भाव क्रम से: संन्यास श्रेष्ठ है या कर्मयोग, कमल-पत्र की तरह निर्लेप जीवन, समदृष्टि, और ईश्वर को सबका मित्र जानने से मिलने वाली शान्ति।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।चौथे अध्याय के अन्त में श्रीकृष्ण ने कर्मों के त्याग (संन्यास) की भी प्रशंसा की और योग में स्थित होकर लड़ने को भी कहा। अर्जुन फिर पूछते हैं कि इन दोनों में से कौन-सा मार्ग श्रेष्ठ है। पाँचवाँ अध्याय बताता है कि सच्चा संन्यास बाहर का नहीं, भीतर का है।
श्लोक 1 से 6: संन्यास और कर्मयोग
अर्जुन कहते हैं: हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। इन दोनों में जो एक निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए।
श्रीकृष्ण कहते हैं: संन्यास और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करने वाले हैं, पर इन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है। जो न किसी से द्वेष करता है, न कुछ चाहता है, उसे सदा संन्यासी ही जानो; ऐसा द्वन्द्वों से रहित व्यक्ति सहज ही बन्धन से छूट जाता है। बालक (अज्ञानी) ही सांख्य और योग को अलग-अलग फल देने वाले कहते हैं, पण्डित नहीं; किसी एक में भी ठीक से स्थित व्यक्ति दोनों का फल पाता है। सांख्य वाले जो स्थान पाते हैं, योगी भी वही पाते हैं; जो दोनों को एक देखता है, वही ठीक देखता है। कर्मयोग के बिना संन्यास पाना कठिन है, जबकि योगयुक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को पा लेता है।
श्लोक 7 से 12: कमल-पत्र की तरह
जो योगयुक्त है, जिसका मन शुद्ध है, जिसने मन और इन्द्रियों को जीत लिया है, और जो सब प्राणियों में अपने आत्मा को देखता है, वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता। तत्त्व को जानने वाला योगी देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, चलते, सोते, साँस लेते, बोलते, त्यागते, ग्रहण करते, आँखें खोलते और बन्द करते हुए भी यह मानता है कि "मैं कुछ नहीं करता"; इन्द्रियाँ अपने विषयों में बरत रही हैं।
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ (5.10)
अर्थ: जो सब कर्मों को परमात्मा में अर्पित करके, आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, वह पाप से वैसे ही लिप्त नहीं होता जैसे कमल का पत्ता जल में रहकर भी जल से गीला नहीं होता।
योगी आसक्ति छोड़कर शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों से केवल आत्म-शुद्धि के लिए कर्म करते हैं। कर्मफल को त्यागने वाला स्थायी शान्ति पाता है, जबकि कामना से फल में आसक्त व्यक्ति बँधता है।
श्लोक 13 से 17: नौ द्वारों का नगर
वश में किए मन वाला देही सब कर्मों को मन से त्यागकर नौ द्वारों वाले शरीर रूपी नगर में सुख से रहता है, न कुछ करता है, न करवाता है। परमेश्वर संसार के कर्तापन, कर्मों और कर्मफल के संयोग की रचना नहीं करते; यह स्वभाव से होता है। ईश्वर किसी के पाप या पुण्य को ग्रहण नहीं करते; अज्ञान से ज्ञान ढका है, इसलिए प्राणी मोहित होते हैं। पर जिनका अज्ञान आत्मज्ञान से नष्ट हो गया, उनका ज्ञान सूर्य की तरह परमात्मा को प्रकाशित करता है। जिनकी बुद्धि, मन और निष्ठा उसी में है, वे ज्ञान से पाप धोकर पुनर्जन्म नहीं पाते।
श्लोक 18 से 21: समदृष्टि
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥ (5.18)
अर्थ: ज्ञानी पुरुष विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल, सबमें समान दृष्टि रखते हैं (क्योंकि सबमें एक ही आत्मा है)।
जिनका मन समता में स्थित है, उन्होंने यहीं संसार को जीत लिया, क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है। प्रिय पाकर हर्षित न होने वाला और अप्रिय पाकर उद्विग्न न होने वाला, स्थिर बुद्धि और मोह रहित व्यक्ति ब्रह्म में स्थित है। बाहर के विषयों में आसक्ति न रखने वाला अपने भीतर के सुख को पाता है और ब्रह्म से जुड़कर अक्षय आनन्द भोगता है।
श्लोक 22 से 26: भोग दुःख की जड़ हैं
इन्द्रियों और विषयों के संयोग से होने वाले भोग दुःख के ही कारण हैं, क्योंकि उनका आदि और अन्त है; बुद्धिमान उनमें नहीं रमते (5.22)। जो शरीर छूटने से पहले ही काम और क्रोध के वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही योगी और सुखी है (5.23)। जो भीतर ही सुखी, भीतर ही रमने वाला और भीतर ही प्रकाशित है, वह योगी ब्रह्मनिर्वाण पाता है। जिनके पाप नष्ट हो गए, संशय मिट गए, मन वश में है और जो सब प्राणियों के हित में लगे हैं, वे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण पाते हैं। काम-क्रोध से रहित, संयमित मन वाले आत्मज्ञानियों के लिए सब ओर ब्रह्मनिर्वाण है।
श्लोक 27 से 29: ध्यान की झलक और परम शान्ति
बाहर के विषयों को बाहर ही छोड़कर, दृष्टि को भौंहों के बीच स्थिर करके, नाक में चलने वाले प्राण और अपान को सम करके, इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में करके, इच्छा, भय और क्रोध से रहित, मोक्ष में लगा मुनि सदा मुक्त ही है। (ध्यान की पूरी विधि अगले अध्याय में है।)
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥ (5.29)
अर्थ: मुझे सब यज्ञों और तपों का भोक्ता, सब लोकों का महान ईश्वर और सब प्राणियों का सुहृद (निःस्वार्थ मित्र) जानकर मनुष्य शान्ति प्राप्त करता है।
इस अध्याय की सीख
- घर-परिवार और काम छोड़ना ज़रूरी नहीं; मन से आसक्ति छोड़ना ही सच्चा संन्यास है।
- कमल कीचड़ और पानी में रहकर भी साफ़ रहता है; संसार में रहकर भी मन शुद्ध रखा जा सकता है।
- हर जीव में एक ही ईश्वर को देखना भेदभाव मिटाता है।
- जो सुख इन्द्रियों से आता है वह चला भी जाता है; भीतर का सुख स्थायी है।
- ईश्वर सब प्राणियों के मित्र हैं; यह जानने भर से मन को शान्ति मिलती है।
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