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श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग — अन्तकाल का स्मरण, सरल अर्थ

गीता का आठवाँ अध्याय, सभी 28 श्लोकों का भाव क्रम से: अर्जुन के सात प्रश्न, अन्त समय का स्मरण, ओंकार और ध्यान, ब्रह्मा का दिन और रात, तथा शुक्ल और कृष्ण मार्ग।

चित्रण: भगवद गीता अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग — अन्तकाल का स्मरण, सरल अर्थ
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आठवाँ अध्याय मृत्यु के क्षण के बारे में है, पर इसका सन्देश जीवन के लिए है: अन्त में वही याद आता है जो जीवन भर याद किया गया हो। इसलिए "हर समय मुझे याद करो और अपना काम भी करो" इस अध्याय का केन्द्र है। यह अध्याय परम्परा में दिवंगत की शान्ति के लिए भी पढ़ा जाता है।

श्लोक 1 और 2: अर्जुन के सात प्रश्न

अर्जुन पूछते हैं: हे पुरुषोत्तम, (1) ब्रह्म क्या है? (2) अध्यात्म क्या है? (3) कर्म क्या है? (4) अधिभूत किसे कहते हैं? (5) अधिदैव किसे कहते हैं? (6) इस शरीर में अधियज्ञ कौन है और कैसे? (7) और मन को वश में रखने वाले अन्त समय में आपको कैसे जानते हैं?

श्लोक 3 और 4: उत्तर

श्रीकृष्ण कहते हैं: परम अक्षर (अविनाशी) ब्रह्म है; अपना स्वभाव (जीवात्मा) अध्यात्म कहलाता है; प्राणियों के भाव को उत्पन्न करने वाला त्याग (सृष्टि का व्यापार) कर्म कहलाता है। नाशवान पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यगर्भ पुरुष अधिदैव है, और इस शरीर में मैं स्वयं अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ।

श्लोक 5 से 8: अन्तकाल का स्मरण

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ (8.5)

अर्थ: जो अन्त समय में मुझे ही स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, वह मेरे भाव को प्राप्त होता है; इसमें कोई संशय नहीं।

मनुष्य अन्त समय में जिस-जिस भाव को स्मरण करता हुआ शरीर छोड़ता है, उसी को प्राप्त होता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव में रँगा रहता था (8.6)।

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥ (8.7)

अर्थ: इसलिए तुम हर समय मेरा स्मरण करो और युद्ध (अपना कर्तव्य) भी करो। मन और बुद्धि मुझे अर्पित करने से तुम निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होगे।

अभ्यास रूपी योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करने वाला परम दिव्य पुरुष को पाता है।

श्लोक 9 से 13: ध्यान और ओंकार

जो सर्वज्ञ, अनादि, सबके शासक, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म, सबके धारण करने वाले, अचिन्त्य स्वरूप, सूर्य के समान प्रकाशमान और अज्ञान से परे परमात्मा का स्मरण करता है, और अन्त समय भक्ति और योगबल से प्राण को भौंहों के बीच स्थिर करके शरीर छोड़ता है, वह उस परम दिव्य पुरुष को पाता है। वेद के ज्ञाता जिसे अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसमें प्रवेश करते हैं, और जिसकी इच्छा से ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद मैं संक्षेप में कहता हूँ। सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर, मन को हृदय में स्थिर करके, प्राण को मस्तक में स्थापित करके, "ॐ" इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए और मेरा स्मरण करते हुए जो शरीर छोड़ता है, वह परम गति पाता है।

श्लोक 14 से 16: अनन्य स्मरण से सरल प्राप्ति

जो अनन्य चित्त से सदा मुझे स्मरण करता है, उस नित्य युक्त योगी के लिए मैं सुलभ हूँ (8.14)। मुझे पाकर महात्मा फिर दुःखों के घर, अनित्य पुनर्जन्म को नहीं पाते, क्योंकि वे परम सिद्धि पा चुके हैं (8.15)। ब्रह्मलोक तक के सब लोक पुनरावर्ती हैं (वहाँ से लौटना पड़ता है), पर हे कौन्तेय, मुझे पाकर पुनर्जन्म नहीं होता।

श्लोक 17 से 22: ब्रह्मा का दिन और रात

ब्रह्मा का एक दिन एक हज़ार चतुर्युग का और रात भी एक हज़ार चतुर्युग की होती है; जो यह जानते हैं, वे काल के तत्त्व को जानते हैं। ब्रह्मा का दिन आरम्भ होने पर सब प्राणी अव्यक्त से प्रकट होते हैं और रात आने पर उसी अव्यक्त में लीन हो जाते हैं। यही प्राणी-समुदाय बार-बार उत्पन्न होकर विवश होकर लीन होता है। उस अव्यक्त से भी परे एक दूसरा सनातन अव्यक्त भाव है, जो सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। उसे अक्षर और परम गति कहा गया है; वही मेरा परम धाम है, जिसे पाकर कोई लौटता नहीं। वह परम पुरुष, जिसके भीतर सब प्राणी हैं और जिससे यह सब व्याप्त है, अनन्य भक्ति से प्राप्त होता है।

श्लोक 23 से 28: दो मार्ग

हे भरतश्रेष्ठ, अब मैं वह काल (मार्ग) बताता हूँ जिसमें शरीर छोड़कर योगी लौटते नहीं, और जिसमें लौटते हैं।

  • शुक्ल मार्ग (देवयान): अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्ल पक्ष और उत्तरायण के छह महीने; इस मार्ग से गए ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म को पाते हैं और लौटते नहीं।
  • कृष्ण मार्ग (पितृयान): धुआँ, रात, कृष्ण पक्ष और दक्षिणायन के छह महीने; इस मार्ग से गया योगी चन्द्रमा की ज्योति पाकर (स्वर्ग भोगकर) लौट आता है।

ये दोनों मार्ग सनातन माने गए हैं। इन दोनों को जानने वाला योगी मोहित नहीं होता, इसलिए हे अर्जुन, हर समय योग से युक्त रहो। वेद पढ़ने, यज्ञ, तप और दान के जो पुण्य फल बताए गए हैं, इस रहस्य को जानने वाला योगी उन सबको पार करके आदि परम स्थान को पाता है (8.28)।

इस अध्याय की सीख

  • अन्त समय का विचार अचानक नहीं बनता; जीवन भर का अभ्यास ही उस क्षण सामने आता है।
  • ईश्वर का स्मरण और अपना काम, दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।
  • संसार के सबसे ऊँचे सुख भी स्थायी नहीं; केवल ईश्वर का धाम अपरिवर्तनशील है।
  • अनन्य भाव से याद करने वाले के लिए ईश्वर "सुलभ" हैं, कठिन नहीं।

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