श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
भगवद गीता अध्याय 6: आत्मसंयमयोग (ध्यानयोग) — ध्यान की विधि और मन का निग्रह
गीता का छठा अध्याय, सभी 47 श्लोकों का भाव क्रम से: मनुष्य स्वयं अपना मित्र और शत्रु, ध्यान में कैसे बैठें, संयमित जीवन, चंचल मन को अभ्यास और वैराग्य से वश में करना, और अधूरे योगी की गति।
अपनी भाषा में पढ़ें
English · বাংলা · मराठी · ગુજરાતી · ਪੰਜਾਬੀ · தமிழ் · తెలుగు · ಕನ್ನಡ · മലയാളം · ଓଡ଼ିଆ · नेपाली · اردو
अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।छठा अध्याय गीता का ध्यान-अध्याय है। इसमें श्रीकृष्ण व्यावहारिक रूप से बताते हैं कि ध्यान के लिए कहाँ और कैसे बैठें, कितना खाएँ और सोएँ, और चंचल मन को कैसे वश में करें। कर्म षट्क (अध्याय 1 से 6) का यह अन्तिम अध्याय है।
श्लोक 1 से 4: सच्चा संन्यासी और योगी
जो कर्मफल का आश्रय लिए बिना करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी और योगी है; केवल अग्नि या कर्म छोड़ देने वाला नहीं। जिसे संन्यास कहते हैं, उसी को योग जानो, क्योंकि संकल्पों को त्यागे बिना कोई योगी नहीं बनता। योग में चढ़ना चाहने वाले मुनि के लिए कर्म साधन है, और योग पर चढ़ जाने पर शान्ति (कर्मों का शमन) साधन है। जब व्यक्ति न इन्द्रियों के विषयों में, न कर्मों में आसक्त होता है और सब संकल्पों को त्याग देता है, तब वह योगारूढ़ कहलाता है।
श्लोक 5 से 9: मनुष्य स्वयं अपना मित्र और शत्रु
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ (6.5)
अर्थ: मनुष्य अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपने को नीचे न गिराए। मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।
जिसने अपने मन को जीत लिया, उसके लिए मन मित्र है; जिसने नहीं जीता, उसके लिए मन शत्रु की तरह बर्ताव करता है। जिसने मन जीत लिया और जो शान्त है, उसकी आत्मा सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में परमात्मा में स्थित रहती है। ज्ञान-विज्ञान से तृप्त, अविचल, जितेन्द्रिय योगी के लिए मिट्टी, पत्थर और सोना समान हैं। जो सुहृद, मित्र, शत्रु, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष करने योग्य, बन्धु, साधु और पापी, सबमें समान बुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।
श्लोक 10 से 17: ध्यान की विधि
योगी अकेले एकान्त स्थान में रहकर, मन और शरीर को वश में करके, आशा और संग्रह से रहित होकर, निरन्तर मन को परमात्मा में लगाए।
- स्थान: शुद्ध भूमि पर, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा आसन; नीचे कुशा, उस पर मृगछाला या कपड़ा।
- बैठना: आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखकर, आत्म-शुद्धि के लिए अभ्यास करे।
- शरीर: काया, सिर और गर्दन को सीधा और स्थिर रखे, इधर-उधर न देखे, दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर टिकाए।
- मन: शान्त, निर्भय, ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थित, मन को संयमित करके, मुझमें चित्त लगाकर, मेरे परायण होकर बैठे।
इस प्रकार निरन्तर मन को लगाने वाला योगी मुझमें स्थित परम शान्ति (निर्वाण) पाता है।
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥ (6.16)
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥ (6.17)
अर्थ: हे अर्जुन, यह योग न बहुत खाने वाले का सिद्ध होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का, न बहुत सोने वाले का और न सदा जागने वाले का। जिसका आहार-विहार, कर्मों में चेष्टा, सोना और जागना सन्तुलित है, उसी का योग दुःखों का नाश करता है।
श्लोक 18 से 23: वायु रहित स्थान का दीपक
जब वश में किया चित्त आत्मा में ही स्थित हो जाता है और सब कामनाओं से निःस्पृह हो जाता है, तब वह योगयुक्त कहलाता है। "यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता" — जैसे वायु रहित स्थान में रखा दीपक हिलता नहीं, वैसी ही उपमा मन जीते हुए योगी के चित्त की है (6.19)।
जिस अवस्था में योग के अभ्यास से रुका हुआ चित्त शान्त हो जाता है, जिसमें आत्मा से आत्मा को देखकर वह सन्तुष्ट होता है, जिसमें वह बुद्धि से ग्रहण होने योग्य, इन्द्रियों से परे अनन्त आनन्द को जानता है और उसमें स्थित होकर तत्त्व से नहीं हटता, जिसे पाकर वह उससे बड़ा कोई लाभ नहीं मानता और जिसमें स्थित होकर बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता, उस दुःख के संयोग से वियोग को ही योग जानो। इस योग का अभ्यास निश्चय के साथ, बिना ऊबे करना चाहिए।
श्लोक 24 से 28: धीरे-धीरे मन को रोकना
संकल्प से उत्पन्न सब कामनाओं को पूरी तरह छोड़कर, मन से इन्द्रियों को सब ओर से रोककर, धैर्य वाली बुद्धि से धीरे-धीरे उपराम हो; मन को आत्मा में स्थित करके कुछ भी न सोचे। चंचल और अस्थिर मन जिस-जिस कारण से बाहर भागे, उस-उस से रोककर उसे बार-बार आत्मा में ही लगाए (6.26)। जिसका मन शान्त है, रजोगुण शान्त है, जो पाप रहित और ब्रह्म रूप हो गया, उस योगी को उत्तम सुख मिलता है।
श्लोक 29 से 32: सबमें ईश्वर, ईश्वर में सब
योगी आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है। जो मुझे सबमें और सबको मुझमें देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता (6.30)। जो सबके सुख और दुःख को अपने जैसा देखता है, वह परम योगी है (6.32)।
श्लोक 33 से 36: चंचल मन
अर्जुन कहते हैं: हे मधुसूदन, आपने जो समता का योग बताया, मन की चंचलता के कारण मैं उसकी स्थिर स्थिति नहीं देखता। मन बड़ा चंचल, प्रमथन करने वाला, बलवान और दृढ़ है; इसे रोकना मुझे वायु को रोकने की तरह अत्यन्त कठिन लगता है।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ (6.35)
अर्थ: हे महाबाहो, निःसन्देह मन चंचल है और कठिनता से वश में होता है, पर हे कौन्तेय, यह अभ्यास और वैराग्य से वश में हो जाता है।
जिसका मन वश में नहीं, उसके लिए योग पाना कठिन है; पर प्रयत्नशील और मन को वश में रखने वाला उचित उपाय से इसे पा सकता है।
श्लोक 37 से 45: अधूरे योगी की गति
अर्जुन पूछते हैं: जो श्रद्धा से योग में लगा पर मन के विचलित होने से सिद्धि तक नहीं पहुँचा, उसकी क्या गति होती है? क्या वह छिन्न-भिन्न बादल की तरह दोनों ओर से नष्ट तो नहीं हो जाता? आपके अतिरिक्त कोई मेरा यह संशय नहीं मिटा सकता।
श्रीकृष्ण कहते हैं: हे पार्थ, उसका न इस लोक में नाश होता है, न परलोक में। "न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति" — हे प्रिय, कल्याण का काम करने वाला कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता (6.40)। योग से भ्रष्ट व्यक्ति पुण्य लोकों में बहुत समय रहकर पवित्र और श्रीमान लोगों के घर जन्म लेता है, या ज्ञानी योगियों के कुल में जन्म लेता है, जो संसार में और भी दुर्लभ है। वहाँ उसे पिछले जन्म की बुद्धि का संस्कार मिल जाता है और वह फिर सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है। पूर्व अभ्यास से वह अपने आप योग की ओर खिंचता है। प्रयत्न से अभ्यास करता हुआ योगी पापों से शुद्ध होकर, अनेक जन्मों में सिद्ध होकर परम गति पाता है।
श्लोक 46 और 47: सबसे श्रेष्ठ योगी
योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और कर्मकाण्डियों से भी; इसलिए हे अर्जुन, तुम योगी बनो। और सब योगियों में भी जो श्रद्धा से मुझमें लगे मन से मुझे भजता है, वह मेरे मत में सबसे श्रेष्ठ है (6.47)।
इस अध्याय की सीख
- अपनी उन्नति की ज़िम्मेदारी अपनी है; दूसरों को दोष देने से उद्धार नहीं होता।
- ध्यान के लिए न भूखा रहना ज़रूरी है न घर छोड़ना; सन्तुलित भोजन, नींद और काम ही योग की नींव है।
- मन का भटकना स्वाभाविक है; हर बार प्रेम से उसे वापस लाना ही अभ्यास है।
- अच्छे मार्ग पर किया कोई प्रयास व्यर्थ नहीं जाता, भले इस जीवन में पूरा न हो।
- दूसरे के दुःख को अपना दुःख समझना सबसे बड़ा योग है।
अंतिम अद्यतन:
आगे पढ़ें
शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में
शिव पुराण अपनी सात संहिताओं में, क्रम से: शिव महिमा, अग्नि-स्तम्भ की कथा, सती और पार्वती, कार्तिकेय और गणेश का जन्म, द्वादश ज्योतिर्लिंग, शिव के अवतार और शिव पूजा की विध…
श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में
शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को सात दिनों में सुनाई गई श्रीमद्भागवत: अवतारों, ध्रुव, प्रह्लाद और गजेन्द्र से लेकर सम्पूर्ण कृष्ण लीला और उद्धव गीता तक, सभी बारह स्कन्ध…
श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
मार्कण्डेय पुराण की दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य): मधु-कैटभ, महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज की कथा सहित सभी 13 अध्याय क्रम से, और नवरात्रि में पाठ की व…
हनुमान चालीसा: सम्पूर्ण पाठ अर्थ सहित
गोस्वामी तुलसीदास रचित सम्पूर्ण हनुमान चालीसा, हर चौपाई के सरल अर्थ के साथ: कब पढ़ी जाती है और क्या सिखाती है।
श्रीराम स्तुति: श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन
गोस्वामी तुलसीदास रचित श्रीराम स्तुति "श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन": सम्पूर्ण पाठ, हर पद का सरल अर्थ, और यह कब गाई जाती है।