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श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग — विराट रूप का दर्शन, सरल अर्थ

गीता का ग्यारहवाँ अध्याय, सभी 55 श्लोकों का भाव क्रम से: अर्जुन विराट रूप देखना चाहते हैं, दिव्य दृष्टि पाते हैं, सारे लोक और काल में समाते योद्धा देखते हैं, स्तुति और क्षमा-प्रार्थना करते हैं, और फिर सौम्य रूप के दर्शन।

चित्रण: भगवद गीता अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग — विराट रूप का दर्शन, सरल अर्थ
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दसवें अध्याय में अर्जुन ने भगवान की विभूतियों के बारे में सुना। ग्यारहवें अध्याय में वे उन्हें अपनी आँखों से देखने की प्रार्थना करते हैं, और भगवान उन्हें अपना विराट (विश्व) रूप दिखाते हैं, जिसमें सारा ब्रह्माण्ड, सारा काल और सारे प्राणी एक साथ दिखाई देते हैं।

श्लोक 1 से 4: अर्जुन की प्रार्थना

अर्जुन कहते हैं: मुझ पर कृपा करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन कहे, उनसे मेरा मोह नष्ट हो गया। हे कमलनयन, मैंने आपसे प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय तथा आपकी अविनाशी महिमा विस्तार से सुनी। हे परमेश्वर, आप जैसा अपने को बताते हैं, वैसा ही है; पर हे पुरुषोत्तम, मैं आपके ईश्वरीय रूप को देखना चाहता हूँ। यदि आप मुझे उसे देखने योग्य समझते हैं, तो हे योगेश्वर, मुझे अपना अविनाशी रूप दिखाइए।

श्लोक 5 से 8: दिव्य दृष्टि

श्रीकृष्ण कहते हैं: हे पार्थ, मेरे सैकड़ों और हज़ारों नाना प्रकार के, नाना वर्ण और आकृति वाले दिव्य रूप देखो। आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनी कुमारों और मरुतों को देखो; पहले कभी न देखे बहुत से आश्चर्य देखो। आज मेरे इस शरीर में एक जगह स्थित सारे चर-अचर जगत को और जो कुछ और देखना चाहते हो, वह देखो।

"न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्॥" — पर तुम मुझे इन अपनी आँखों से नहीं देख सकते; मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूँ, मेरी ईश्वरीय योग-शक्ति को देखो (11.8)।

श्लोक 9 से 14: संजय का वर्णन

संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं: ऐसा कहकर महायोगेश्वर हरि ने अर्जुन को परम ईश्वरीय रूप दिखाया: अनेक मुख और नेत्रों वाला, अनेक अद्भुत दर्शनों वाला, अनेक दिव्य आभूषणों और दिव्य शस्त्रों वाला, दिव्य माला और वस्त्र धारण किए, दिव्य गन्ध का लेप लगाए, सब आश्चर्यों से युक्त, अनन्त और सब ओर मुख वाला।

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥ (11.12)

अर्थ: यदि आकाश में हज़ार सूर्य एक साथ उदित हों, तो उनका प्रकाश शायद उस महात्मा (विराट रूप) के प्रकाश के समान हो।

अर्जुन ने उस देवों के देव के शरीर में अनेक भागों में बँटे सारे जगत को एक जगह स्थित देखा। तब आश्चर्य से भरे, रोमांचित अर्जुन ने सिर झुकाकर, हाथ जोड़कर भगवान से कहा।

श्लोक 15 से 31: अर्जुन ने क्या देखा

अर्जुन कहते हैं: हे देव, मैं आपके शरीर में सब देवताओं, प्राणियों के समुदायों, कमल के आसन पर बैठे ब्रह्मा, महादेव, सब ऋषियों और दिव्य सर्पों को देखता हूँ। मैं आपको अनेक भुजाओं, पेटों, मुखों और नेत्रों वाला, सब ओर से अनन्त रूप वाला देखता हूँ; हे विश्वरूप, मुझे आपका न अन्त दिखता है, न मध्य, न आदि। मुकुट, गदा और चक्र धारण किए, सब ओर प्रकाशमान तेज के पुंज, जलती आग और सूर्य के समान, जिसे देखना कठिन है, ऐसा आपको देखता हूँ। आप जानने योग्य परम अक्षर हैं, जगत के परम आश्रय हैं, सनातन धर्म के रक्षक हैं और सनातन पुरुष हैं।

आपका न आदि है, न मध्य, न अन्त; अनन्त शक्ति, अनन्त भुजाएँ, चन्द्र-सूर्य रूपी नेत्र, जलती आग जैसा मुख, और अपने तेज से इस जगत को तपाते हुए आपको मैं देखता हूँ। आकाश और पृथ्वी के बीच का सारा स्थान और सब दिशाएँ आपसे ही भरी हैं; आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हैं। देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं, कुछ डरकर हाथ जोड़े स्तुति कर रहे हैं, महर्षि और सिद्ध "स्वस्ति" कहकर उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति कर रहे हैं। रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनी कुमार, मरुत, पितर, गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्ध, सब विस्मित होकर आपको देख रहे हैं।

आपके अनेक मुख, नेत्र, भुजाएँ और भयंकर दाढ़ों वाले विकराल रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हैं और मैं भी। आकाश को छूते, अनेक वर्णों वाले, फैले मुख और विशाल जलते नेत्रों वाले आपको देखकर मेरा धैर्य और शान्ति छूट गई है। हे देवेश, प्रसन्न होइए।

धृतराष्ट्र के सब पुत्र राजाओं के समूहों सहित, भीष्म, द्रोण, कर्ण और हमारे पक्ष के प्रधान योद्धा भी बड़े वेग से आपके भयानक दाढ़ों वाले मुखों में प्रवेश कर रहे हैं; कुछ के सिर चूर्ण होकर दाँतों के बीच फँसे दिख रहे हैं। जैसे नदियों के अनेक प्रवाह समुद्र की ओर दौड़ते हैं, और जैसे पतंगे नाश के लिए जलती आग में बड़े वेग से प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये वीर आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। आप कौन हैं? हे देवश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है; प्रसन्न होइए। मैं आपकी प्रवृत्ति नहीं जानता, आपको जानना चाहता हूँ।

श्लोक 32 से 34: मैं काल हूँ

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ (11.32)

अर्थ: मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय लोकों का संहार करने में लगा हूँ। तुम्हारे बिना भी विरोधी सेनाओं में खड़े ये सब योद्धा नहीं बचेंगे।

इसलिए तुम उठो, यश पाओ, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य भोगो। ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं; "निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्" — हे सव्यसाची (दोनों हाथों से बाण चलाने वाले), तुम केवल निमित्त बन जाओ (11.33)। द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य वीर मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं, तुम उन्हें मारो, व्याकुल मत हो; युद्ध करो, तुम निश्चय ही जीतोगे।

श्लोक 35 से 46: अर्जुन की स्तुति और क्षमा-प्रार्थना

संजय कहते हैं: केशव के ये वचन सुनकर काँपते हुए अर्जुन ने हाथ जोड़कर नमस्कार किया और भयभीत होकर गद्गद वाणी में कहा: हे हृषीकेश, उचित है कि आपके कीर्तन से जगत हर्षित होता है, राक्षस डरकर दिशाओं में भागते हैं और सिद्ध नमस्कार करते हैं। आप ब्रह्मा के भी आदिकर्ता हैं; आपको नमस्कार क्यों न करें? आप आदिदेव, सनातन पुरुष, जगत के परम आश्रय, जानने वाले और जानने योग्य, और परम धाम हैं। आप वायु, यम, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजापति और प्रपितामह हैं। आपको हज़ार बार नमस्कार, फिर-फिर नमस्कार। आगे से, पीछे से, सब ओर से आपको नमस्कार।

आपकी इस महिमा को न जानकर, मित्र मानकर, प्रेम या असावधानी से मैंने "हे कृष्ण, हे यादव, हे सखा" जो कुछ हठपूर्वक कहा, और हँसी में, विहार, शय्या, आसन और भोजन के समय, अकेले या दूसरों के सामने जो अपमान किया, हे अप्रमेय, उसके लिए मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ। जैसे पिता पुत्र के, मित्र मित्र के और प्रिय पति प्रिया के अपराध सहता है, वैसे ही आप मेरे अपराध सहन करें। पहले न देखे इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ, पर मेरा मन भय से व्याकुल है; मुझे अपना वही देव रूप (चतुर्भुज) दिखाइए। मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किए उसी रूप में देखना चाहता हूँ।

श्लोक 47 से 50: सौम्य रूप

श्रीकृष्ण कहते हैं: मैंने प्रसन्न होकर अपनी योग-शक्ति से तुम्हें यह परम तेजोमय, अनन्त और आदि विश्वरूप दिखाया, जो तुम्हारे अतिरिक्त किसी ने पहले नहीं देखा। मनुष्य लोक में इस रूप में मैं न वेदों के अध्ययन से, न यज्ञ से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से तुम्हारे अतिरिक्त किसी के द्वारा देखा जा सकता हूँ। मेरे इस विकराल रूप को देखकर व्याकुल और मूढ़ मत होओ; भय रहित और प्रसन्न मन से फिर मेरा वह रूप देखो।

संजय कहते हैं: ऐसा कहकर वासुदेव ने फिर अपना चतुर्भुज रूप दिखाया, और फिर सौम्य मनुष्य रूप धारण करके भयभीत अर्जुन को धीरज बँधाया।

श्लोक 51 से 55: केवल अनन्य भक्ति से

अर्जुन कहते हैं: हे जनार्दन, आपके इस सौम्य मनुष्य रूप को देखकर अब मैं शान्त चित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति में आ गया हूँ।

श्रीकृष्ण कहते हैं: मेरा यह रूप देखना अत्यन्त दुर्लभ है; देवता भी सदा इसके दर्शन की इच्छा रखते हैं। "भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन" — हे अर्जुन, केवल अनन्य भक्ति से ही मैं इस प्रकार तत्त्व से जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता हूँ (11.54)।

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥ (11.55)

अर्थ: हे पाण्डव, जो मेरे लिए कर्म करता है, मुझे परम लक्ष्य मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति रहित है और सब प्राणियों में वैर भाव से रहित है, वह मुझे प्राप्त होता है।

इस अध्याय की सीख

  • ईश्वर का पूरा रूप साधारण आँखों से नहीं, कृपा और भक्ति की दृष्टि से दिखता है।
  • समय (काल) अपना काम करता है; हम केवल निमित्त हैं। यह समझ अहंकार भी मिटाती है और भय भी।
  • निकटता में भी आदर न भूलें: अर्जुन ने अपने मित्र को कभी साधारण समझकर जो कहा, उसके लिए क्षमा माँगी।
  • सबसे बड़े दर्शन का मार्ग भी सरल है: ईश्वर के लिए काम, अनासक्ति और किसी से वैर नहीं।

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