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श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग — सर्वधर्मान्परित्यज्य, गीता का निष्कर्ष

गीता का अठारहवाँ अध्याय, सभी 78 श्लोकों का भाव क्रम से: सच्चा त्याग, कर्म के पाँच कारण, तीन प्रकार के ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख, स्वधर्म, पूर्ण शरणागति, और अर्जुन का उत्तर।

चित्रण: भगवद गीता अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग — सर्वधर्मान्परित्यज्य, गीता का निष्कर्ष
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अठारहवाँ अध्याय गीता का सबसे बड़ा अध्याय और पूरी गीता का निष्कर्ष है। इसमें श्रीकृष्ण पहले की सारी बातों को समेटते हैं: त्याग क्या है, कर्म कैसे होता है, मनुष्य का स्वभाव और कर्तव्य क्या है, और अन्त में अपना सबसे गोपनीय वचन देते हैं: "सब छोड़कर मेरी शरण आओ।" अर्जुन का मोह नष्ट हो जाता है और वे युद्ध के लिए तैयार होते हैं।

श्लोक 1 से 12: संन्यास और त्याग

अर्जुन पूछते हैं: हे महाबाहो, मैं संन्यास और त्याग का तत्त्व अलग-अलग जानना चाहता हूँ।

श्रीकृष्ण कहते हैं: विद्वान काम्य कर्मों (इच्छा से किए कर्मों) के त्याग को संन्यास कहते हैं, और सब कर्मों के फल के त्याग को त्याग कहते हैं। कुछ कहते हैं कि सब कर्म दोषयुक्त हैं इसलिए त्याग देने चाहिए, और कुछ कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप नहीं छोड़ने चाहिए। इस विषय में मेरा निश्चय सुनो: यज्ञ, दान और तप नहीं छोड़ने चाहिए, ये अवश्य करने चाहिए, क्योंकि ये बुद्धिमानों को पवित्र करते हैं। पर इन्हें भी आसक्ति और फल छोड़कर करना चाहिए, यह मेरा उत्तम मत है।

त्याग तीन प्रकार का है:

  • तामस त्याग: नियत कर्म का मोह से त्याग।
  • राजस त्याग: "कर्म दुःख रूप है" समझकर शरीर के कष्ट के डर से कर्म छोड़ना; इसका फल नहीं मिलता।
  • सात्त्विक त्याग: "करना कर्तव्य है" समझकर नियत कर्म करना और आसक्ति व फल छोड़ना।

सात्त्विक त्यागी न अप्रिय कर्म से द्वेष करता है, न प्रिय कर्म में आसक्त होता है। देहधारी के लिए सब कर्मों को पूरी तरह छोड़ना सम्भव नहीं, इसलिए जो कर्मफल का त्यागी है, वही त्यागी कहलाता है। फल न छोड़ने वालों को मृत्यु के बाद अच्छा, बुरा और मिला-जुला, तीन प्रकार का फल मिलता है, पर संन्यासियों (फल त्यागियों) को कभी नहीं।

श्लोक 13 से 18: कर्म के पाँच कारण

हे महाबाहो, सब कर्मों की सिद्धि के पाँच कारण सांख्य शास्त्र में बताए गए हैं: अधिष्ठान (शरीर), कर्ता, अलग-अलग करण (इन्द्रियाँ), अनेक प्रकार की चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव (प्रारब्ध)। शरीर, वाणी और मन से मनुष्य जो भी उचित या अनुचित कर्म करता है, उसके ये पाँच कारण हैं।

फिर भी जो अशुद्ध बुद्धि से केवल अपने को कर्ता देखता है, वह दुर्बुद्धि ठीक नहीं देखता। जिसमें "मैं करता हूँ" का भाव नहीं और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं, वह इन सब लोकों को मारकर भी न मारता है, न बँधता है (18.17)। ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता कर्म की प्रेरणा हैं, और करण, कर्म और कर्ता कर्म के अंग हैं।

श्लोक 19 से 40: गुणों के अनुसार सब कुछ तीन प्रकार का

ज्ञान: - सात्त्विक: जिस ज्ञान से मनुष्य अलग-अलग सब प्राणियों में एक अविनाशी, अविभक्त भाव को देखता है (18.20)। - राजस: जो ज्ञान सब प्राणियों में अलग-अलग अनेक भाव देखता है। - तामस: जो एक कार्य (शरीर) को ही सब कुछ मानकर उसमें आसक्त रहता है, जो तर्कहीन, तत्त्व से रहित और तुच्छ है।

कर्म: - सात्त्विक: शास्त्र-विधि से नियत, कर्तापन के अभिमान से रहित, राग-द्वेष के बिना, फल न चाहने वाले द्वारा किया कर्म। - राजस: फल की इच्छा से, अहंकार से और बहुत परिश्रम से किया कर्म। - तामस: परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी सामर्थ्य को न देखकर मोह से आरम्भ किया कर्म।

कर्ता: - सात्त्विक: आसक्ति रहित, अहंकार की बात न करने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त, सफलता-असफलता में विकार रहित। - राजस: आसक्त, फल चाहने वाला, लोभी, दूसरों को कष्ट देने वाला, अशुद्ध, हर्ष-शोक से भरा। - तामस: असावधान, अशिक्षित (असंस्कृत), जिद्दी, धूर्त, दूसरों की आजीविका नष्ट करने वाला, आलसी, उदास और काम को टालने वाला।

बुद्धि: - सात्त्विक: जो प्रवृत्ति और निवृत्ति, कर्तव्य और अकर्तव्य, भय और अभय, बन्धन और मोक्ष को ठीक-ठीक जानती है। - राजस: जो धर्म-अधर्म और कर्तव्य-अकर्तव्य को ठीक से नहीं जानती। - तामस: जो अन्धकार से ढकी, अधर्म को धर्म मानती है और सब बातों को उल्टा देखती है।

धृति (धैर्य, धारण शक्ति): - सात्त्विक: जो अटल धृति योग द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करती है। - राजस: जो फल की इच्छा से धर्म, अर्थ और काम को आसक्ति से पकड़े रहती है। - तामस: जिससे दुर्बुद्धि व्यक्ति नींद, भय, शोक, विषाद और घमण्ड को नहीं छोड़ता।

सुख: - सात्त्विक: "यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्" — जो आरम्भ में विष जैसा पर परिणाम में अमृत जैसा है, और आत्म-बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है (18.37)। - राजस: जो विषयों और इन्द्रियों के संयोग से होता है, आरम्भ में अमृत जैसा पर परिणाम में विष जैसा। - तामस: जो आरम्भ और अन्त दोनों में मोहित करने वाला है, नींद, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न।

पृथ्वी, आकाश या देवताओं में भी ऐसा कोई प्राणी नहीं जो प्रकृति के इन तीन गुणों से मुक्त हो।

श्लोक 41 से 48: स्वभाव और स्वकर्म

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म उनके स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार बाँटे गए हैं। शम, दम, तप, शुद्धि, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। शौर्य, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध से न भागना, दान और नेतृत्व क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। खेती, गोपालन और व्यापार वैश्य के, और सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।

अपने-अपने स्वाभाविक कर्म में लगा मनुष्य सिद्धि पाता है।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ (18.46)

अर्थ: जिस परमात्मा से सब प्राणियों की उत्पत्ति है और जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उसकी अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है।

अच्छी तरह आचरण किए गए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है; स्वभाव से नियत कर्म करते हुए मनुष्य पाप को प्राप्त नहीं होता (18.47)। हे कौन्तेय, दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि जैसे धुएँ से आग, वैसे ही सब कर्म किसी न किसी दोष से ढके हैं (18.48)।

श्लोक 49 से 56: ब्रह्म की प्राप्ति और परा भक्ति

सब जगह आसक्ति रहित बुद्धि वाला, मन को जीतने वाला, इच्छा रहित व्यक्ति संन्यास से परम नैष्कर्म्य सिद्धि पाता है। वह सिद्धि पाकर ब्रह्म को कैसे पाता है, यह संक्षेप में सुनो: शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्य से मन को वश में करके, शब्द आदि विषयों को त्यागकर, राग-द्वेष छोड़कर; एकान्त में रहने वाला, थोड़ा खाने वाला, वाणी, शरीर और मन को वश में रखने वाला, नित्य ध्यान योग में लगा, वैराग्य का आश्रय लिए; अहंकार, बल, घमण्ड, काम, क्रोध और संग्रह छोड़कर, ममता रहित और शान्त व्यक्ति ब्रह्म बनने योग्य होता है।

ब्रह्म में स्थित, प्रसन्न मन वाला व्यक्ति न शोक करता है, न कामना; सब प्राणियों में सम होकर वह मेरी परा भक्ति पाता है (18.54)। भक्ति से वह मुझे तत्त्व से जानता है कि मैं कौन हूँ और कितना हूँ, और फिर मुझमें प्रवेश करता है। मेरे आश्रित होकर सदा सब कर्म करता हुआ भी वह मेरी कृपा से शाश्वत अविनाशी पद पाता है।

श्लोक 57 से 62: शरणागति

मन से सब कर्म मुझे अर्पित करके, मेरे परायण होकर, बुद्धियोग का आश्रय लेकर निरन्तर मुझमें चित्त लगाओ। मुझमें चित्त लगाने से तुम मेरी कृपा से सब कठिनाइयों को पार कर जाओगे, पर यदि अहंकार से मेरी बात नहीं सुनोगे तो नष्ट हो जाओगे।

अहंकार से जो तुम सोचते हो "मैं युद्ध नहीं करूँगा", यह निश्चय व्यर्थ है; तुम्हारा स्वभाव तुम्हें युद्ध में लगा देगा (18.59)। हे कौन्तेय, मोह से जो काम तुम नहीं करना चाहते, उसे अपने स्वभाव से बँधे विवश होकर करोगे।

"ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥" — हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है और अपनी माया से सब प्राणियों को, मानो यन्त्र पर चढ़े हों, घुमाता है (18.61)। हे भारत, सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ; उसकी कृपा से तुम परम शान्ति और सनातन धाम पाओगे।

श्लोक 63: तुम स्वतन्त्र हो

"इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥" — इस प्रकार यह गोपनीय से भी गोपनीय ज्ञान मैंने तुम्हें कहा। इस पर पूरी तरह विचार करो, फिर जैसा चाहो वैसा करो (18.63)।

(भगवान अर्जुन पर कुछ थोपते नहीं; पूरा ज्ञान देकर निर्णय उन्हीं पर छोड़ते हैं।)

श्लोक 64 से 66: सबसे गोपनीय वचन

सबसे गोपनीय मेरा परम वचन फिर सुनो: तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो, इसलिए तुम्हारे हित की बात कहता हूँ। मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो; तुम मुझे ही पाओगे, यह मैं तुमसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो।

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ (18.66)

अर्थ: सब धर्मों (कर्तव्य-अकर्तव्य की चिन्ताओं और आश्रयों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत करो।

श्लोक 67 से 71: गीता का अधिकारी और फल

यह ज्ञान तप रहित, भक्ति रहित, सुनना न चाहने वाले और मुझमें दोष देखने वाले को कभी नहीं कहना चाहिए। जो इस परम रहस्य को मेरे भक्तों को सुनाएगा, वह मेरी परा भक्ति करके निःसन्देह मुझे पाएगा; मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय काम करने वाला कोई नहीं, और पृथ्वी पर उससे अधिक प्रिय मेरा कोई नहीं होगा। जो हम दोनों के इस धर्ममय संवाद को पढ़ेगा, उसने ज्ञान यज्ञ से मेरी पूजा की, ऐसा मेरा मत है। जो श्रद्धा से, दोष न देखकर इसे सुनेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यवानों के शुभ लोकों को पाएगा।

श्लोक 72 और 73: अर्जुन का उत्तर

श्रीकृष्ण पूछते हैं: हे पार्थ, क्या तुमने इसे एकाग्र मन से सुना? हे धनंजय, क्या तुम्हारा अज्ञान से उत्पन्न मोह नष्ट हुआ?

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥ (18.73)

अर्थ: अर्जुन कहते हैं: हे अच्युत, आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मुझे अपनी स्मृति (अपना स्वरूप और कर्तव्य) मिल गई। मैं सन्देह रहित होकर स्थित हूँ; आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।

श्लोक 74 से 78: संजय का समापन

संजय कहते हैं: इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा अर्जुन का यह अद्भुत, रोमांचकारी संवाद सुना। व्यास जी की कृपा से मैंने यह परम गोपनीय योग स्वयं योगेश्वर कृष्ण से साक्षात कहते हुए सुना। हे राजन, केशव और अर्जुन के इस पवित्र और अद्भुत संवाद को बार-बार याद करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ। हरि के उस अत्यन्त अद्भुत रूप को याद करके मुझे बड़ा आश्चर्य होता है और मैं बार-बार प्रसन्न होता हूँ।

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ (18.78)

अर्थ: जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहीं श्री (लक्ष्मी), विजय, ऐश्वर्य और अटल नीति है, ऐसा मेरा मत है।

इस अध्याय और पूरी गीता की सीख

  • सच्चा त्याग काम छोड़ना नहीं, काम के फल की आसक्ति छोड़ना है।
  • अपना स्वाभाविक कर्तव्य ही ईश्वर की पूजा है, चाहे वह कोई भी काम हो।
  • जो सुख आरम्भ में कठिन पर अन्त में मीठा है (अनुशासन, साधना), वही सच्चा सुख है।
  • भगवान निर्णय की स्वतन्त्रता देते हैं: "विचार करो, फिर जैसा चाहो करो।"
  • पूर्ण शरणागति में भय और शोक का अन्त है: "मा शुचः", शोक मत करो।
  • जहाँ ईश्वर का मार्गदर्शन (कृष्ण) और मनुष्य का पुरुषार्थ (अर्जुन) साथ हों, वहीं विजय है।

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