श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
भगवद गीता अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग — पत्रं पुष्पं फलं तोयं, सरल अर्थ
गीता का नौवाँ अध्याय, सभी 34 श्लोकों का भाव क्रम से: राजविद्या, सब प्राणी ईश्वर में कैसे, ईश्वर जगत के माता-पिता, "योगक्षेमं वहाम्यहम्", पत्र-पुष्प का अर्पण और भगवान की प्रतिज्ञा।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।नौवाँ अध्याय गीता का सबसे मधुर अध्याय माना जाता है। इसे "राजविद्या" (विद्याओं का राजा) और "राजगुह्य" (रहस्यों का राजा) कहा गया, क्योंकि इसमें भगवान बताते हैं कि वे भक्त का सारा भार उठाते हैं, एक पत्ता या फूल भी प्रेम से दिया जाए तो स्वीकार करते हैं, और किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह कैसा भी रहा हो, लौटाते नहीं।
श्लोक 1 से 3: राजविद्या
श्रीकृष्ण कहते हैं: तुम दोष देखने वाले नहीं हो, इसलिए तुम्हें विज्ञान सहित यह परम गोपनीय ज्ञान बताता हूँ, जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे। यह सब विद्याओं का राजा, सब रहस्यों का राजा, अति पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष अनुभव होने वाला, धर्ममय, करने में सरल और अविनाशी है। इस धर्म में श्रद्धा न रखने वाले मुझे न पाकर मृत्यु रूपी संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं।
श्लोक 4 से 10: सब मुझमें, मैं सबमें नहीं
मुझ अव्यक्त से यह सारा जगत व्याप्त है। सब प्राणी मुझमें स्थित हैं, पर मैं उनमें स्थित नहीं; और देखो मेरी ईश्वरीय योग-शक्ति, प्राणी भी मुझमें स्थित नहीं; मैं प्राणियों को धारण और पोषण करने वाला होकर भी उनमें स्थित नहीं। जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र चलने वाली महान वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं।
कल्प के अन्त में सब प्राणी मेरी प्रकृति में लीन हो जाते हैं और कल्प के आरम्भ में मैं उन्हें फिर रचता हूँ। अपनी प्रकृति को वश में करके मैं प्रकृति के अधीन इस सारे प्राणी-समुदाय को बार-बार रचता हूँ। पर ये कर्म मुझे नहीं बाँधते, क्योंकि मैं उनमें उदासीन की तरह अनासक्त रहता हूँ। मेरी अध्यक्षता में प्रकृति चर-अचर जगत को रचती है, और इसी कारण संसार का चक्र घूमता है।
श्लोक 11 से 15: मूढ़ और महात्मा
मूढ़ लोग मेरे परम भाव को न जानकर, मनुष्य शरीर धारण किए मुझ सब प्राणियों के महान ईश्वर का अनादर करते हैं। उनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान व्यर्थ हैं; वे राक्षसी और आसुरी स्वभाव में बँधे हैं। पर दैवी प्रकृति के आश्रित महात्मा मुझे सब प्राणियों का आदि और अविनाशी जानकर अनन्य मन से भजते हैं। वे दृढ़ व्रत वाले भक्त निरन्तर मेरा कीर्तन करते हैं, यत्न करते हैं, नमस्कार करते हैं और नित्य युक्त होकर भक्ति से उपासना करते हैं। कुछ ज्ञान यज्ञ से मुझे एक रूप में, कुछ अलग-अलग रूपों में, और कुछ विश्वरूप में अनेक प्रकार से पूजते हैं।
श्लोक 16 से 19: सब कुछ मैं हूँ
मैं क्रतु (वैदिक यज्ञ) हूँ, यज्ञ हूँ, स्वधा (पितरों को अर्पण) हूँ, औषधि हूँ, मन्त्र हूँ, घी हूँ, अग्नि हूँ और हवन रूपी क्रिया भी मैं हूँ। इस जगत का पिता, माता, धारण करने वाला और पितामह मैं हूँ; जानने योग्य पवित्र ओंकार और ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद भी मैं हूँ। मैं गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सुहृद, उत्पत्ति, प्रलय, आधार, निधान और अविनाशी बीज हूँ। मैं ही तपता हूँ, वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ; मैं अमृत और मृत्यु हूँ, सत् और असत् भी मैं हूँ।
श्लोक 20 और 21: स्वर्ग का सुख भी अस्थायी
तीनों वेदों के कर्मकाण्ड करने वाले, सोमरस पीने वाले, पापों से शुद्ध लोग यज्ञ से मेरी पूजा करके स्वर्ग चाहते हैं और पुण्य से इन्द्रलोक पाकर दिव्य भोग भोगते हैं। उस विशाल स्वर्ग को भोगकर पुण्य समाप्त होने पर वे फिर मृत्युलोक में आते हैं। इस प्रकार भोगों की कामना वाले आते-जाते रहते हैं।
श्लोक 22: भगवान का वचन
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (9.22)
अर्थ: जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, उन नित्य मुझमें लगे भक्तों का योगक्षेम (जो नहीं है उसकी प्राप्ति और जो है उसकी रक्षा) मैं स्वयं वहन करता हूँ।
श्लोक 23 से 25: अन्य देवताओं की पूजा
जो भक्त श्रद्धा से अन्य देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, पर विधि रहित (अज्ञान से)। मैं ही सब यज्ञों का भोक्ता और स्वामी हूँ, पर वे मुझे तत्त्व से नहीं जानते, इसलिए गिरते हैं। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को, पितरों को पूजने वाले पितरों को, भूतों को पूजने वाले भूतों को पाते हैं, और मेरे भक्त मुझे पाते हैं।
श्लोक 26 से 28: प्रेम का अर्पण
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ (9.26)
अर्थ: जो मुझे प्रेम से पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, उस शुद्ध मन वाले भक्त का प्रेम से दिया वह उपहार मैं स्वीकार करता हूँ (प्रेम से खाता हूँ)।
यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥ (9.27)
अर्थ: हे कौन्तेय, तुम जो करते हो, जो खाते हो, जो हवन करते हो, जो दान देते हो और जो तप करते हो, वह सब मुझे अर्पित कर दो।
ऐसा करने से तुम शुभ-अशुभ फल देने वाले कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाओगे और संन्यास योग से युक्त होकर मुझे पाओगे।
श्लोक 29 से 33: कोई भी वंचित नहीं
मैं सब प्राणियों में सम हूँ; न कोई मेरा अप्रिय है, न प्रिय; पर जो प्रेम से मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें (9.29)।
यदि कोई अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मुझे भजता है, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने ठीक निश्चय कर लिया है (9.30)। वह शीघ्र धर्मात्मा बन जाता है और सदा रहने वाली शान्ति पाता है। "कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति" — हे कौन्तेय, तुम निश्चय के साथ घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता (9.31)।
हे पार्थ, स्त्री, वैश्य, शूद्र, या जिन्हें समाज नीचा मानता है, वे भी मेरी शरण लेकर परम गति पाते हैं। फिर पुण्यात्मा ब्राह्मणों और राजर्षि भक्तों का तो कहना ही क्या। इसलिए इस अनित्य और दुःख भरे मनुष्य शरीर को पाकर मुझे भजो।
श्लोक 34: सार
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥ (9.34)
अर्थ: मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो, मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार अपने को मुझमें लगाकर, मेरे परायण होकर तुम मुझे ही पाओगे।
इस अध्याय की सीख
- ईश्वर को धन या भव्य पूजा नहीं, प्रेम चाहिए: एक पत्ता या एक लोटा जल भी पर्याप्त है।
- रोज़ के हर काम को, भोजन तक को, ईश्वर को अर्पित करके पूजा बनाया जा सकता है।
- ईश्वर का द्वार हर व्यक्ति के लिए खुला है, चाहे उसका अतीत कैसा भी हो।
- जो पूरी तरह ईश्वर पर निर्भर है, उसकी आवश्यकताओं और रक्षा का भार ईश्वर स्वयं उठाते हैं।
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