श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
भगवद गीता अध्याय 3: कर्मयोग — सरल हिन्दी अर्थ और सार
गीता का तीसरा अध्याय, सभी 43 श्लोकों का भाव क्रम से: कोई कर्म क्यों नहीं छोड़ सकता, यज्ञ भाव से कर्म, लोकसंग्रह, स्वधर्म, और काम ही असली शत्रु क्यों है।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने ज्ञान (बुद्धि) की प्रशंसा भी की और कर्म करने को भी कहा। अर्जुन उलझ गए कि आखिर करना क्या है। तीसरा अध्याय इसी उलझन का उत्तर है: कर्म छोड़ना न सम्भव है, न उचित; कर्म को ही यज्ञ बना देना मुक्ति का मार्ग है।
श्लोक 1 और 2: अर्जुन का प्रश्न
अर्जुन पूछते हैं: हे जनार्दन, यदि आप कर्म से बुद्धि (ज्ञान) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो मुझे इस भयानक कर्म (युद्ध) में क्यों लगाते हैं? मिली-जुली बातों से मेरी बुद्धि मोहित हो रही है; एक बात निश्चित करके बताइए जिससे मेरा कल्याण हो।
श्लोक 3 से 8: कर्म छोड़ा नहीं जा सकता
श्रीकृष्ण कहते हैं: इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा मैंने पहले कही है: ज्ञानियों के लिए ज्ञानयोग और योगियों के लिए कर्मयोग। कर्मों को आरम्भ न करने से कोई निष्कर्मता नहीं पाता, और केवल त्याग देने से सिद्धि नहीं मिलती। कोई भी व्यक्ति क्षण भर भी बिना कर्म किए नहीं रहता; प्रकृति के गुण सबसे विवश करके कर्म करवाते हैं। जो कर्मेन्द्रियों को रोककर मन से विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी (पाखण्डी) है। पर जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, अनासक्त होकर कर्मेन्द्रियों से कर्मयोग करता है, वह श्रेष्ठ है।
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥ (3.8)
अर्थ: तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म न करने से तो तुम्हारा शरीर-निर्वाह भी नहीं हो सकेगा।
श्लोक 9 से 16: यज्ञ का चक्र
यज्ञ (परमार्थ) के लिए किए कर्मों के अतिरिक्त अन्य कर्मों से मनुष्य बँधता है; इसलिए आसक्ति छोड़कर यज्ञ भाव से कर्म करो। सृष्टि के आरम्भ में प्रजापति ने यज्ञ सहित प्रजा रचकर कहा: इस यज्ञ से तुम बढ़ो, यह तुम्हारी इच्छित वस्तुएँ देने वाला हो। तुम यज्ञ से देवताओं को प्रसन्न करो और देवता तुम्हें; इस तरह परस्पर एक-दूसरे को उन्नत करते हुए परम कल्याण पाओगे। जो देवताओं के दिए भोगों को उन्हें अर्पित किए बिना स्वयं भोगता है, वह चोर है। यज्ञ से बचा अन्न खाने वाले सब पापों से छूटते हैं, पर जो केवल अपने लिए पकाते हैं, वे पाप ही खाते हैं।
प्राणी अन्न से होते हैं, अन्न वर्षा से, वर्षा यज्ञ से और यज्ञ कर्म से। कर्म वेद से उत्पन्न है और वेद अविनाशी परमात्मा से; इसलिए सर्वव्यापी परमात्मा सदा यज्ञ में स्थित है। जो इस चक्र के अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियों में रमने वाला व्यर्थ ही जीता है।
सरल अर्थ: प्रकृति, समाज और परिवार से हम लगातार पाते हैं; बदले में कुछ देना ही यज्ञ है। केवल लेने वाला जीवन चक्र को तोड़ता है।
श्लोक 17 से 19: अनासक्त कर्म
जो आत्मा में ही रमा है, आत्मा में तृप्त और सन्तुष्ट है, उसके लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं; उसका कुछ करने या न करने से कोई प्रयोजन नहीं। फिर भी तुम आसक्ति रहित होकर सदा कर्तव्य कर्म करो, क्योंकि अनासक्त होकर कर्म करने वाला परमात्मा को पाता है।
श्लोक 20 से 26: लोकसंग्रह और श्रीकृष्ण का उदाहरण
जनक जैसे ज्ञानी भी कर्म से ही सिद्धि को प्राप्त हुए। लोकसंग्रह (संसार के कल्याण और मार्गदर्शन) को देखते हुए भी तुम्हें कर्म करना चाहिए।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (3.21)
अर्थ: श्रेष्ठ व्यक्ति जो-जो आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो प्रमाण स्थापित करता है, संसार उसी के अनुसार चलता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं: हे पार्थ, तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्तव्य नहीं, न कोई अप्राप्त वस्तु पानी है, फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ। यदि मैं सावधान होकर कर्म न करूँ तो लोग मेरा ही अनुसरण करेंगे और नष्ट हो जाएँगे। अज्ञानी लोग आसक्त होकर कर्म करते हैं; ज्ञानी को लोकसंग्रह के लिए अनासक्त होकर वैसे ही कर्म करने चाहिए। ज्ञानी को चाहिए कि कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम न पैदा करे, बल्कि स्वयं अच्छी तरह कर्म करते हुए उनसे भी करवाए।
श्लोक 27 से 29: करने वाला कौन?
सारे कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं, पर अहंकार से मोहित व्यक्ति सोचता है "मैं कर्ता हूँ"। जो गुण और कर्म के विभाग का तत्त्व जानता है, वह समझता है कि गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, और आसक्त नहीं होता।
श्लोक 30 से 32: सब कुछ ईश्वर को अर्पित
मुझमें चित्त लगाकर सब कर्मों को मुझे अर्पित कर दो, आशा, ममता और शोक रूपी ज्वर छोड़कर युद्ध करो। जो श्रद्धा से, दोष न देखकर मेरे इस मत का पालन करते हैं, वे कर्म-बन्धन से छूट जाते हैं। जो इसमें दोष देखकर पालन नहीं करते, वे मूढ़ नष्ट होते हैं।
श्लोक 33 से 35: स्वभाव और स्वधर्म
ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार ही चेष्टा करता है; सब प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार चलते हैं, निग्रह क्या करेगा? हर इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे रहते हैं; उनके वश में मत होओ, वे कल्याण के मार्ग में लुटेरे हैं।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥ (3.35)
अर्थ: अच्छी तरह आचरण किए गए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है; दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
श्लोक 36 से 43: काम ही शत्रु है
अर्जुन पूछते हैं: हे कृष्ण, मनुष्य न चाहते हुए भी, मानो बलपूर्वक लगाया गया, किसकी प्रेरणा से पाप करता है?
श्रीकृष्ण कहते हैं: रजोगुण से उत्पन्न यह काम ही क्रोध है। यह कभी तृप्त नहीं होता, बड़ा पापी है; इसे ही इस संसार में शत्रु जानो (3.37)। जैसे धुएँ से आग, धूल से दर्पण और झिल्ली से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही काम से ज्ञान ढका रहता है। यह कभी न बुझने वाली आग की तरह है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके निवास स्थान हैं; इनके द्वारा यह ज्ञान को ढककर मनुष्य को मोहित करता है।
इसलिए पहले इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले इस पापी काम को मार डालो। इन्द्रियाँ शरीर से श्रेष्ठ हैं, इन्द्रियों से मन, मन से बुद्धि, और बुद्धि से भी श्रेष्ठ आत्मा है। इस प्रकार आत्मा को बुद्धि से श्रेष्ठ जानकर, बुद्धि से मन को वश में करके, हे महाबाहो, इस दुर्जय काम रूपी शत्रु को मार डालो (3.43)।
इस अध्याय की सीख
- काम छोड़कर भाग जाना त्याग नहीं है; काम करते हुए स्वार्थ छोड़ना त्याग है।
- जो हमें मिला है, उसके बदले समाज, प्रकृति और परिवार को कुछ लौटाना ही यज्ञ है।
- बड़े पद पर बैठे व्यक्ति का आचरण दूसरों के लिए उदाहरण बनता है; इसलिए उसकी ज़िम्मेदारी अधिक है।
- दूसरों की नकल से अपना स्वाभाविक कर्तव्य श्रेष्ठ है।
- पाप की जड़ बाहर नहीं, भीतर की अनियन्त्रित इच्छा है।
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