सहायता और पूछताछ: ☎ +91 7309990011 WhatsApp ✉ info@websofy.com
श्रीराम जन्मभूमि प्रतीकश्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

ग्रन्थ अध्याय

श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग — शरीर और आत्मा, सरल अर्थ

गीता का तेरहवाँ अध्याय, सभी 34 श्लोकों का भाव क्रम से: शरीर क्षेत्र और आत्मा क्षेत्रज्ञ, सच्चे ज्ञान के बीस लक्षण, जानने योग्य परमात्मा, तथा प्रकृति और पुरुष।

चित्रण: भगवद गीता अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग — शरीर और आत्मा, सरल अर्थ
अपनी भाषा में पढ़ें

English · বাংলা · मराठी · ગુજરાતી · ਪੰਜਾਬੀ · தமிழ் · తెలుగు · ಕನ್ನಡ · മലയാളം · ଓଡ଼ିଆ · नेपाली · اردو

अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।

तेरहवें अध्याय से गीता का तीसरा भाग (ज्ञान षट्क) आरम्भ होता है। यहाँ भगवान एक सरल उपमा से बात शुरू करते हैं: शरीर एक खेत (क्षेत्र) है, जिसमें कर्मों के बीज बोए और फल काटे जाते हैं; और जो इस खेत को जानता है, वह क्षेत्रज्ञ (आत्मा) है। हम खेत नहीं, खेत को जानने वाले हैं।

(कुछ संस्करणों में इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन का एक प्रश्न-श्लोक भी मिलता है, जिससे श्लोक संख्या 35 हो जाती है। गीता प्रेस के पाठ में 34 श्लोक हैं, और यहाँ वही क्रम है।)

श्लोक 1 और 2: क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ

श्रीकृष्ण कहते हैं: हे कौन्तेय, यह शरीर क्षेत्र कहलाता है, और जो इसे जानता है, उसे ज्ञानी क्षेत्रज्ञ कहते हैं। हे भारत, सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है।

श्लोक 3 से 6: क्षेत्र किससे बना है

वह क्षेत्र क्या है, कैसा है, किन विकारों वाला है, किससे उत्पन्न है, और क्षेत्रज्ञ कौन है और उसका प्रभाव क्या है, यह संक्षेप में सुनो। ऋषियों ने इसे अनेक प्रकार से गाया है, वेदों के छन्दों ने और युक्ति से भरे ब्रह्मसूत्र के पदों ने भी।

पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), अहंकार, बुद्धि, मूल प्रकृति, दस इन्द्रियाँ (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ), एक मन, और इन्द्रियों के पाँच विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध); तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, शरीर का समूह, चेतना और धृति, यह विकारों सहित क्षेत्र संक्षेप में कहा गया।

श्लोक 7 से 11: ज्ञान के लक्षण

भगवान बताते हैं कि "ज्ञान" किताबें पढ़ना नहीं, इन गुणों का जीवन में होना है:

  • अभिमान का अभाव, दम्भ (दिखावे) का अभाव, अहिंसा, क्षमा और सरलता।
  • गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, स्थिरता और मन का संयम।
  • इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, और जन्म, मृत्यु, बुढ़ापे और रोग के दुःख और दोषों पर बार-बार विचार।
  • पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति और ममता का अभाव, और प्रिय-अप्रिय की प्राप्ति में सदा सम चित्त रहना।
  • मुझमें अनन्य योग से अटल भक्ति, एकान्त और शुद्ध स्थान में रहने का स्वभाव, और भीड़ भरी (विषयी) सभाओं में रुचि न होना।
  • अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्व-ज्ञान के अर्थ रूप परमात्मा को देखना।

यह सब ज्ञान है; इसके विपरीत जो है, वह अज्ञान है (13.11)।

श्लोक 12 से 18: जानने योग्य परमात्मा

अब जानने योग्य को बताता हूँ, जिसे जानकर अमृत मिलता है: वह अनादि परम ब्रह्म है, जिसे न सत् कहा जा सकता है, न असत्। उसके हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुँह सब ओर हैं, कान सब ओर हैं; वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। वह सब इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, पर सब इन्द्रियों से रहित है; आसक्ति रहित होकर भी सबका धारण-पोषण करने वाला है; गुणों से परे होकर भी गुणों का भोक्ता है।

वह सब प्राणियों के बाहर और भीतर है, चर और अचर भी वही है; सूक्ष्म होने से जानने में नहीं आता; वह अत्यन्त दूर भी है और अत्यन्त पास भी। वह अविभाजित होकर भी प्राणियों में बँटा हुआ-सा स्थित है; वही प्राणियों का पालन करने वाला, संहार करने वाला और उत्पन्न करने वाला है। वह ज्योतियों की भी ज्योति और अन्धकार से परे कहा जाता है; वह ज्ञान, जानने योग्य और ज्ञान से पाने योग्य है, और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है। इस प्रकार क्षेत्र, ज्ञान और ज्ञेय संक्षेप में कहे गए; इसे जानकर मेरा भक्त मेरे भाव को पाता है।

श्लोक 19 से 23: प्रकृति और पुरुष

प्रकृति और पुरुष, दोनों को अनादि जानो; विकार और गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। कार्य और करण (शरीर और इन्द्रियों) को उत्पन्न करने में प्रकृति कारण कही जाती है, और सुख-दुःख के भोगने में पुरुष कारण कहा जाता है। प्रकृति में स्थित पुरुष ही प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है, और गुणों का संग ही उसके अच्छी-बुरी योनियों में जन्म का कारण है।

इस शरीर में स्थित पुरुष ही परम पुरुष है: वही साक्षी (उपद्रष्टा), अनुमति देने वाला, भरण करने वाला, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा कहलाता है। जो पुरुष को और गुणों सहित प्रकृति को इस प्रकार जानता है, वह हर तरह से बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता।

श्लोक 24 और 25: अनेक मार्ग

कुछ लोग ध्यान से अपने भीतर परमात्मा को देखते हैं, कुछ सांख्य योग (ज्ञान) से, और कुछ कर्मयोग से। कुछ, जो स्वयं ऐसा नहीं जानते, दूसरों (ज्ञानियों) से सुनकर उपासना करते हैं; सुनने में तत्पर वे भी मृत्यु को पार कर जाते हैं।

श्लोक 26 से 30: सबमें एक ईश्वर

जितने भी चर-अचर प्राणी उत्पन्न होते हैं, वे सब क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से होते हैं। जो नाशवान सब प्राणियों में अविनाशी परमेश्वर को समान रूप से स्थित देखता है, वही ठीक देखता है (13.27)। सबमें समान रूप से स्थित ईश्वर को देखने वाला अपने द्वारा अपना नाश नहीं करता (अपने आत्मा की हिंसा नहीं करता), इसलिए परम गति पाता है। जो देखता है कि सब कर्म प्रकृति द्वारा ही होते हैं और आत्मा अकर्ता है, वही ठीक देखता है। जब वह प्राणियों के अलग-अलग भावों को एक में स्थित और उसी से विस्तार पाते देखता है, तब ब्रह्म को प्राप्त होता है।

श्लोक 31 से 34: अलिप्त आत्मा

यह अविनाशी परमात्मा अनादि और गुणों से परे होने के कारण शरीर में रहकर भी न कुछ करता है, न लिप्त होता है। जैसे सर्वव्यापी आकाश सूक्ष्म होने से लिप्त नहीं होता, वैसे ही सब शरीरों में स्थित आत्मा लिप्त नहीं होता।

"यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः। क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥" — हे भारत, जैसे एक सूर्य इस सारे संसार को प्रकाशित करता है, वैसे ही एक क्षेत्रज्ञ (आत्मा) सारे क्षेत्र को प्रकाशित करता है (13.33)। जो ज्ञान के नेत्रों से क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को और प्रकृति से छूटने के उपाय को जानते हैं, वे परम को प्राप्त होते हैं (13.34)।

इस अध्याय की सीख

  • हम शरीर नहीं, शरीर को जानने वाले हैं; शरीर साधन है, स्वामी नहीं।
  • ज्ञान का प्रमाण डिग्री नहीं, स्वभाव है: विनम्रता, सरलता, क्षमा, सेवा और सन्तुलन।
  • एक ही ईश्वर सबमें है; यह देखने वाला किसी को हानि नहीं पहुँचा सकता।
  • जैसे आकाश सब में होकर भी किसी से गन्दा नहीं होता, वैसे ही भीतर का आत्मा हर परिस्थिति में शुद्ध है।

अंतिम अद्यतन:

आगे पढ़ें

अध्यात्म

शिव पुराण: सम्पूर्ण कथा संहिता-दर-संहिता सरल हिन्दी में

शिव पुराण अपनी सात संहिताओं में, क्रम से: शिव महिमा, अग्नि-स्तम्भ की कथा, सती और पार्वती, कार्तिकेय और गणेश का जन्म, द्वादश ज्योतिर्लिंग, शिव के अवतार और शिव पूजा की विध…

अध्यात्म

श्रीमद्भागवत महापुराण: सभी 12 स्कन्ध सरल हिन्दी में

शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को सात दिनों में सुनाई गई श्रीमद्भागवत: अवतारों, ध्रुव, प्रह्लाद और गजेन्द्र से लेकर सम्पूर्ण कृष्ण लीला और उद्धव गीता तक, सभी बारह स्कन्ध…

अध्यात्म

श्री दुर्गा सप्तशती: सभी 13 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

मार्कण्डेय पुराण की दुर्गा सप्तशती (देवी माहात्म्य): मधु-कैटभ, महिषासुर, शुम्भ-निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड और रक्तबीज की कथा सहित सभी 13 अध्याय क्रम से, और नवरात्रि में पाठ की व…