श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित
भगवद गीता अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग — यदा यदा हि धर्मस्य, सरल अर्थ
गीता का चौथा अध्याय, सभी 42 श्लोकों का भाव क्रम से: इस ज्ञान की प्राचीन परम्परा, भगवान कब और क्यों अवतार लेते हैं, कर्म-अकर्म का रहस्य, यज्ञ के प्रकार और ज्ञान की अग्नि।
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अन्य भाषाएँ गूगल अनुवाद से खुलती हैं; फिर आपका फ़ोन उस भाषा में पृष्ठ पढ़कर सुना सकता है।चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण पहली बार खुलकर बताते हैं कि वे कौन हैं। यहीं अवतार का प्रसिद्ध श्लोक "यदा यदा हि धर्मस्य" आता है। साथ ही वे समझाते हैं कि कौन-सा कर्म बाँधता है और कौन-सा मुक्त करता है, और ज्ञान को सबसे पवित्र क्यों कहा गया है।
श्लोक 1 से 3: इस ज्ञान की परम्परा
श्रीकृष्ण कहते हैं: यह अविनाशी योग मैंने सृष्टि के आरम्भ में सूर्य (विवस्वान्) को बताया था; सूर्य ने अपने पुत्र मनु को, और मनु ने राजा इक्ष्वाकु को। इस प्रकार परम्परा से राजर्षियों ने इसे जाना, पर बहुत समय बीतने से यह योग लुप्त हो गया। वही पुराना योग आज मैंने तुम्हें बताया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो; यह उत्तम रहस्य है।
(ध्यान दें: इक्ष्वाकु वही राजा हैं जिनके वंश में अयोध्या के श्रीराम हुए। गीता का ज्ञान रघुकुल की परम्परा से भी जुड़ा है।)
श्लोक 4 से 8: अवतार का रहस्य
अर्जुन पूछते हैं: आपका जन्म तो अभी हुआ और सूर्य का बहुत पहले; मैं कैसे मानूँ कि आपने आरम्भ में उन्हें यह बताया? श्रीकृष्ण कहते हैं: मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं; मैं उन सबको जानता हूँ, तुम नहीं जानते। मैं अजन्मा, अविनाशी और सब प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को वश में करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (4.7)
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥ (4.8)
अर्थ: हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। साधुओं की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
श्लोक 9 से 15: दिव्य जन्म और कर्म
जो मेरे जन्म और कर्म को दिव्य रूप से तत्त्व से जान लेता है, वह शरीर छोड़कर फिर जन्म नहीं लेता, मुझे पाता है। राग, भय और क्रोध से रहित, मुझमें मन लगाए, मेरी शरण में आए बहुत से लोग ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर मेरे भाव को प्राप्त हुए।
"ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्" — जो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन्हें वैसे ही भजता हूँ; सब मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं (4.11)। कर्मों के फल चाहने वाले देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों का फल शीघ्र मिलता है।
चारों वर्ण मैंने गुण और कर्म के विभाग से रचे हैं; इनका कर्ता होकर भी मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो। कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, न मुझे कर्मफल की इच्छा है; जो मुझे ऐसे जानता है, वह कर्मों से नहीं बँधता। पूर्व के मुमुक्षुओं ने भी यह जानकर कर्म किए; इसलिए तुम भी कर्म करो।
श्लोक 16 से 23: कर्म, अकर्म और विकर्म
कर्म क्या है और अकर्म क्या, इस विषय में बुद्धिमान भी मोहित हो जाते हैं। कर्म की गति गहन है: कर्म, विकर्म (निषिद्ध कर्म) और अकर्म, तीनों को जानना चाहिए। जो कर्म में अकर्म देखता है और अकर्म में कर्म, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है, वही योगी है और सब कर्म करने वाला है (4.18)।
जिसके सारे कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, जिसके कर्म ज्ञान की अग्नि में जल गए हैं, उसे ज्ञानी पण्डित कहते हैं। जो कर्मफल की आसक्ति छोड़कर सदा तृप्त और आश्रय-रहित है, वह कर्म में लगा हुआ भी कुछ नहीं करता। जो बिना इच्छा के मिला उसमें सन्तुष्ट, द्वन्द्वों से परे, ईर्ष्या रहित और सफलता-असफलता में सम है, वह कर्म करके भी नहीं बँधता। ऐसे मुक्त व्यक्ति के यज्ञ के लिए किए सब कर्म विलीन हो जाते हैं।
श्लोक 24: ब्रह्मार्पण
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ (4.24)
अर्थ: अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्म रूपी अग्नि में ब्रह्म रूपी कर्ता द्वारा आहुति दी गई; ब्रह्म रूपी कर्म में स्थित व्यक्ति ब्रह्म को ही प्राप्त होता है। (यह श्लोक भोजन से पहले भी पढ़ा जाता है।)
श्लोक 25 से 33: यज्ञ के अनेक प्रकार
कुछ योगी देवताओं का यज्ञ करते हैं, कुछ ब्रह्म रूपी अग्नि में यज्ञ द्वारा यज्ञ की आहुति देते हैं। कुछ श्रोत्र आदि इन्द्रियों को संयम की अग्नि में, कुछ शब्द आदि विषयों को इन्द्रियों की अग्नि में होमते हैं। कुछ सारी इन्द्रियों और प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रकाशित आत्म-संयम योग की अग्नि में होमते हैं। कुछ द्रव्य यज्ञ (दान), कुछ तप यज्ञ, कुछ योग यज्ञ करते हैं, और कुछ कठोर व्रत वाले स्वाध्याय और ज्ञान यज्ञ करते हैं। कुछ प्राणायाम में प्राण को अपान में और अपान को प्राण में होमते हैं, और कुछ नियमित आहार करके प्राणों को प्राणों में होमते हैं। ये सभी यज्ञ जानने वाले हैं और यज्ञ से उनके पाप नष्ट होते हैं। यज्ञ से बचा अमृत खाने वाले सनातन ब्रह्म को पाते हैं; यज्ञ न करने वाले के लिए यह लोक भी सुखद नहीं, फिर परलोक कैसे?
ये सब यज्ञ कर्म से उत्पन्न हैं। हे परन्तप, द्रव्य से होने वाले यज्ञ से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि सारे कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं (4.33)।
श्लोक 34: गुरु से ज्ञान कैसे लें
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥ (4.34)
अर्थ: उस ज्ञान को तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझो: उन्हें प्रणाम करके, सेवा करके और निष्कपट भाव से प्रश्न करके। वे तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे।
श्लोक 35 से 42: ज्ञान की अग्नि
उसे जानकर तुम फिर मोह में नहीं पड़ोगे, और सब प्राणियों को अपने में और फिर मुझमें देखोगे। यदि तुम सब पापियों से भी अधिक पापी हो, तब भी ज्ञान रूपी नौका से सब पापों के समुद्र को पार कर जाओगे। जैसे जलती आग ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सब कर्मों को भस्म कर देती है।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥ (4.38)
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ (4.39)
अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ नहीं। योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय आने पर उसे अपने भीतर स्वयं पा लेता है। श्रद्धावान, तत्पर और इन्द्रियों को वश में रखने वाला ज्ञान पाता है, और ज्ञान पाकर शीघ्र ही परम शान्ति प्राप्त करता है।
अज्ञानी, श्रद्धा रहित और संशय करने वाला नष्ट हो जाता है: "संशयात्मा विनश्यति"; संशय वाले के लिए न यह लोक है, न परलोक, न सुख (4.40)। जिसने योग से कर्मों को त्याग दिया और ज्ञान से संशय काट दिया, उस आत्मवान को कर्म नहीं बाँधते। इसलिए हे भारत, हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न इस संशय को ज्ञान की तलवार से काटकर योग में स्थित होओ और खड़े हो जाओ (4.42)।
इस अध्याय की सीख
- जब संसार में अन्याय बढ़ता है, ईश्वर किसी न किसी रूप में धर्म की रक्षा करते हैं; यह आशा का सन्देश है।
- ईश्वर हर व्यक्ति से उसी भाव से मिलते हैं जिस भाव से वह उन्हें पुकारता है।
- हर काम, भोजन तक, पूजा बन सकता है यदि उसे अर्पण भाव से किया जाए।
- ज्ञान विनम्रता, सेवा और सच्चे प्रश्नों से मिलता है, अहंकार से नहीं।
- संशय में जीने वाला कुछ नहीं कर पाता; विवेक से संशय मिटाकर कर्म में लगो।
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