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श्रीमद्भगवद्गीता: सभी 18 अध्याय सरल हिन्दी अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग — दैवी और आसुरी गुण, सरल अर्थ

गीता का सोलहवाँ अध्याय, सभी 24 श्लोकों का भाव क्रम से: 26 दैवी गुण, आसुरी स्वभाव के लक्षण, उसकी अन्तहीन कामनाएँ और परिणाम, नरक के तीन द्वार, और शास्त्र का मार्गदर्शन।

चित्रण: भगवद गीता अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग — दैवी और आसुरी गुण, सरल अर्थ
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सोलहवाँ अध्याय एक दर्पण है: इसमें भगवान दो प्रकार के स्वभावों का वर्णन करते हैं, दैवी (जो मुक्ति की ओर ले जाता है) और आसुरी (जो बन्धन और पतन की ओर)। यह किसी जाति या व्यक्ति के लिए नहीं, हम सबके भीतर चलने वाले दो स्वभावों के बारे में है।

श्लोक 1 से 3: दैवी सम्पत्ति (26 गुण)

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥ (16.1)

श्रीकृष्ण दैवी गुण गिनाते हैं:

  • श्लोक 1: निर्भयता, अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञान और योग में दृढ़ स्थिति, दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता।
  • श्लोक 2: अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, शान्ति, किसी की निन्दा न करना (अपैशुन), सब प्राणियों पर दया, लोभ का अभाव, कोमलता, लज्जा (बुरे काम से संकोच) और चंचलता का अभाव।
  • श्लोक 3: तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, किसी से द्रोह न करना और अत्यधिक मान न चाहना।

हे भारत, ये दैवी सम्पत्ति के साथ जन्मे व्यक्ति के लक्षण हैं।

श्लोक 4 और 5: आसुरी सम्पत्ति

हे पार्थ, दम्भ (दिखावा), घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोर वाणी और अज्ञान, ये आसुरी सम्पत्ति के साथ जन्मे व्यक्ति के लक्षण हैं (16.4)। दैवी सम्पत्ति मुक्ति के लिए और आसुरी बन्धन के लिए मानी गई है। हे पाण्डव, शोक मत करो, तुम दैवी सम्पत्ति के साथ जन्मे हो।

श्लोक 6 से 18: आसुरी स्वभाव का विस्तार

इस संसार में दो प्रकार के प्राणी हैं: दैवी और आसुरी। दैवी का वर्णन हो चुका, अब आसुरी के बारे में सुनो।

आसुरी स्वभाव वाले न जानते हैं कि क्या करना चाहिए, न यह कि क्या नहीं करना चाहिए; उनमें न शुद्धि है, न आचार, न सत्य। वे कहते हैं: यह संसार असत्य है, इसका कोई आधार नहीं, कोई ईश्वर नहीं; यह केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से, काम के कारण उत्पन्न हुआ है। इस दृष्टि को पकड़कर, नष्ट आत्मा वाले, मन्द बुद्धि वाले, उग्र कर्म करने वाले लोग संसार के अहित और नाश के लिए ही उत्पन्न होते हैं।

वे कभी न भरने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से भरे हुए, मोह से गलत विचार पकड़कर, अशुद्ध व्रतों के साथ चलते हैं। वे मृत्यु तक रहने वाली अनगिनत चिन्ताओं में डूबे रहते हैं, भोग भोगना ही परम लक्ष्य मानते हैं और यही सब कुछ है, ऐसा निश्चय रखते हैं। आशा की सैकड़ों रस्सियों से बँधे, काम और क्रोध के परायण होकर वे भोगों के लिए अन्याय से धन इकट्ठा करना चाहते हैं।

उनकी सोच ऐसी होती है: "आज मैंने यह पा लिया, अब यह मनोरथ पूरा करूँगा; इतना धन मेरे पास है, यह और हो जाएगा। उस शत्रु को मैंने मार दिया, दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर (स्वामी) हूँ, मैं भोगने वाला हूँ, मैं सिद्ध, बलवान और सुखी हूँ। मैं धनवान और कुलीन हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, मौज करूँगा।" इस प्रकार अज्ञान से मोहित, अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले, मोह के जाल में फँसे, भोगों में आसक्त वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।

अपने को ही श्रेष्ठ मानने वाले, घमण्डी, धन और मान के मद में चूर वे केवल नाम के लिए, दिखावे से, शास्त्र-विधि के बिना यज्ञ करते हैं। अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध के आश्रित, दूसरों की निन्दा करने वाले वे अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं।

श्लोक 19 और 20: आसुरी स्वभाव का परिणाम

उन द्वेष करने वाले, क्रूर, अशुभ कर्म करने वाले अधम मनुष्यों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ। हे कौन्तेय, वे मूढ़ जन्म-जन्म में आसुरी योनि पाते हैं और मुझे न पाकर उससे भी नीची गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 21 और 22: नरक के तीन द्वार

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ (16.21)

अर्थ: काम, क्रोध और लोभ, ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

हे कौन्तेय, इन तीनों अन्धकार के द्वारों से छूटा हुआ मनुष्य अपने कल्याण का आचरण करता है और परम गति पाता है।

श्लोक 23 और 24: शास्त्र ही प्रमाण

जो शास्त्र की विधि को छोड़कर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति। इसलिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसकी व्यवस्था में शास्त्र ही तुम्हारे लिए प्रमाण है; शास्त्र-विधि को जानकर तुम्हें यहाँ कर्म करना चाहिए (16.24)।

इस अध्याय की सीख

  • दैवी गुणों की सूची रोज़ पढ़ने और अपने को परखने के लिए एक उत्तम आत्म-परीक्षा है।
  • "आज यह मिला, कल वह पाऊँगा" वाली अन्तहीन दौड़ ही आसुरी स्वभाव की पहचान है।
  • काम, क्रोध और लोभ, ये तीनों नरक के द्वार हैं; इनसे बचना ही स्वर्ग का मार्ग है।
  • मनमानी के स्थान पर शास्त्र और सज्जनों के मार्गदर्शन में चलना सुरक्षित है।

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