श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

अयोध्याकाण्ड: वचन और वनवास

भरत की वापसी और राज्य का त्याग

भरत सूनी अयोध्या में लौटते हैं, जानते हैं कि उनके नाम पर क्या हुआ, शोक में माता को धिक्कारते हैं, मुकुट ठुकराते हैं और राम को लौटाने चल पड़ते हैं।

जिस रात दूत केकय देश पहुँचे, उसी रात भरत ने एक बुरा स्वप्न देखा था। उन्होंने देखा कि पिता मैले वस्त्र पहने पहाड़ की चोटी से गिर रहे हैं, चन्द्रमा भूमि पर गिर पड़ा है और समुद्र सूख गया है। सुबह वे मित्रों के बीच भी उदास बैठे थे। तभी दूत आए: "राजकुमार, गुरु वसिष्ठ ने आपको तुरन्त बुलाया है।"

भरत ने पूछा, "पिताजी कुशल हैं? राम और लक्ष्मण? मेरी माताएँ?" दूतों ने सिर झुकाकर बस इतना कहा, "जिनकी कुशल आप चाहते हैं, वे कुशल हैं।" भरत और शत्रुघ्न उसी दिन चल पड़े और सात रातें मार्ग में बिताकर आठवें दिन अयोध्या पहुँचे।

सूनी नगरी

नगर को देखते ही भरत का मन बैठ गया। उन्होंने सारथी से कहा, "यह अयोध्या नहीं लगती। न वेद-पाठ सुनाई देता है, न बाजे। घरों के द्वार खुले हैं पर भीतर कोई नहीं दिखता। लोग मुझे देखकर मुँह क्यों फेर लेते हैं?"

पिता को उनके महल में न पाकर वे माता कैकेयी के पास गए। कैकेयी ने प्रसन्न होकर उन्हें गले लगाया। भरत ने पूछा, "माँ, पिताजी कहाँ हैं?"

कैकेयी ने सहज भाव से कहा, "जो गति सब प्राणियों की होती है, वही तुम्हारे पिता की हुई।" भरत पछाड़ खाकर गिर पड़े। कुछ सँभले तो बोले, "उन्होंने अन्त समय में मेरे लिए क्या कहा? और राम कहाँ हैं? अब वे ही मेरे पिता हैं, मैं उनके चरणों में सिर रखूँगा।"

तब कैकेयी ने सब कुछ कह दिया, और ऐसे कहा जैसे कोई शुभ समाचार दे रही हों: "बेटा, मैंने तुम्हारे लिए राज्य माँग लिया। राम, सीता और लक्ष्मण वन चले गए। अब शोक छोड़ो और सिंहासन पर बैठो।"

भरत का क्रोध

भरत कुछ देर बोल न सके। फिर जो बोले, वह किसी पुत्र ने अपनी माता से कभी नहीं कहा होगा। "तूने मेरे पिता को मार डाला और मेरे भाई को वन भेज दिया, और समझती है कि मैं प्रसन्न होऊँगा? राम के बिना मैं किस बल पर राज्य सँभालूँगा? जो राम तुझे अपनी माँ की तरह पूजते थे, उनसे तूने यह बदला लिया? तू माता के रूप में मेरी शत्रु है। मैं तेरी इच्छा कभी पूरी नहीं होने दूँगा। मैं राम को लौटा लाऊँगा और स्वयं उनका दास बनकर रहूँगा।"

शत्रुघ्न ने द्वार पर गहनों से लदी मन्थरा को देखा। उन्होंने उसे पकड़कर भूमि पर घसीट लिया। भरत ने रोका: "छोड़ दो। स्त्री अवध्य है। और यदि राम को पता चला कि हमने इसे मारा, तो वे हमसे कभी बात नहीं करेंगे।"

भरत कौशल्या के पास गए। कौशल्या ने दुःख में कह दिया, "लो, तुम्हारी माँ ने तुम्हारे लिए निष्कण्टक राज्य ले लिया।" भरत उनके चरणों में गिरकर बच्चे की तरह रो पड़े: "माँ, जिसकी सम्मति से राम वन गए हों, उसे संसार के सब पाप लगें।" कौशल्या ने उन्हें गोद में खींच लिया। वे जान गईं कि यह निर्दोष है।

मुकुट ठुकराया

भरत ने पिता का अन्तिम संस्कार किया। चौदहवें दिन मंत्री और प्रजा के प्रमुख लोग आए: "राजकुमार, राज्य बिना राजा के है। अभिषेक की सामग्री तैयार है। सिंहासन सँभालिए।"

भरत ने सामग्री की परिक्रमा की और कहा, "हमारे कुल में सदा ज्येष्ठ पुत्र राजा होता है। राज्य राम का है, और मैं भी राम का हूँ। जो वनवास उन्हें मिला, वह मैं काटूँगा। यह सारी सामग्री उठाकर वन ले चलो, मैं वहीं राम का अभिषेक करूँगा। मार्ग बनाने वालों को आगे भेजो।"

लोगों की आँखों से हर्ष के आँसू गिरे। कारीगरों ने मार्ग समतल किए, कुएँ खोदे, नदियों पर पुल बाँधे। और एक सुबह भरत सेना, गुरुओं, तीनों माताओं और आधी अयोध्या के साथ चित्रकूट की ओर चल पड़े।

अंतिम अद्यतन:

आगे पढ़ें

पात्र

हनुमान: जीवन, कथाएँ और राम-भक्ति

अंजना और केसरी के पुत्र हनुमान: जन्म, लंका-यात्रा, संजीवनी पर्वत, अयोध्या में उनके दर्शन पहले क्यों होते हैं, और उनसे मिलने वाली सीख।

पात्र

शबरी: जीवन भर की प्रतीक्षा

वृद्धा वनवासी भक्त शबरी ने दशकों अपने आश्रम में श्रीराम की प्रतीक्षा की और उन्हें बेर अर्पित किए। उनकी कथा और नवधा भक्ति।

जीवन-शिक्षा

समता और करुणा: शबरी, केवट और जटायु

श्रीराम ने वनवासी स्त्री के बेर खाए, केवट को गले लगाया और एक पक्षी का पिता की तरह संस्कार किया। गरिमा और जन्म पर इन प्रसंगों की सीख।

जीवन-शिक्षा

विपत्ति में साहस और धैर्य

वनवास, सीता का वियोग, युद्ध में मूर्छित भाई: श्रीराम ने अपने सबसे कठिन दिनों का सामना कैसे किया, और हम अपने दिनों का कैसे करें।