श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

अयोध्याकाण्ड: वचन और वनवास

कैकेयी के दो वर

कोप-भवन में कैकेयी अपने दो वर माँगती हैं: भरत के लिए राज्य और राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास। राम बिना क्षण भर क्रोध किए स्वीकार कर लेते हैं।

राज्याभिषेक की तैयारी का आदेश देकर महाराज दशरथ प्रसन्न मन से कैकेयी के महल में गए, यह शुभ समाचार स्वयं सुनाने। पलंग सूना था। दासी ने डरते-डरते बताया, "देवी कोप-भवन में हैं।"

राजा ने वहाँ कैकेयी को भूमि पर पड़ा देखा, मैले वस्त्र, बिखरे केश, गहने इधर-उधर फेंके हुए। वृद्ध राजा घबरा गए। उन्होंने उनका सिर सहलाया: "तुम्हें किसने दुःख दिया? बताओ, किस निर्दोष को दण्ड दूँ, किस दोषी को छोड़ दूँ? मैं और मेरा सब कुछ तुम्हारे अधीन है। मुझे राम से अधिक कोई प्रिय नहीं, उसी राम की शपथ खाकर कहता हूँ, जो माँगोगी वही दूँगा।"

कैकेयी इसी शपथ की प्रतीक्षा में थीं। वे उठ बैठीं। "देवता साक्षी रहें। आपने दो वर देने को कहा था। आज मैं उन्हें माँगती हूँ। पहला: जो तैयारी राम के लिए हुई है, उसी से मेरे भरत का अभिषेक हो। दूसरा: राम वल्कल और जटा धारण करके चौदह वर्ष के लिए दण्डक वन को जाएँ, आज ही।"

दशरथ को लगा जैसे उन्होंने कोई बुरा स्वप्न देखा हो। फिर वे कटे वृक्ष की तरह भूमि पर गिर पड़े। होश आने पर उन्होंने हाथ जोड़े, पाँव पकड़े: "राम ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? भरत को राज्य दे दूँगा, पर राम को वन मत भेजो। सूर्य के बिना संसार रह सकता है, जल के बिना खेती रह सकती है, पर राम के बिना मेरे प्राण नहीं रहेंगे।"

कैकेयी पत्थर की तरह अडिग रहीं। "रघुकुल में वचन तोड़ने की रीति नहीं है। या तो वचन निभाइए, या मैं आपके सामने विष पी लूँगी।" रात भर राजा विलाप करते रहे। वचन तोड़ नहीं सकते थे, और पुत्र से यह बात कह नहीं सकते थे।

राम का उत्तर

सुबह हुई। सब कुछ तैयार था, केवल राजा नहीं आए। सुमन्त्र बुलाने गए तो कैकेयी ने कहा, "राम को यहाँ भेजो।"

राम आए। उन्होंने पिता को देखा, जो सूखे मुख से आसन पर बैठे थे और जिनके मुँह से केवल "राम" निकला, फिर आँसू। राम घबरा गए: "माता, क्या मुझसे कोई अपराध हुआ है? पिताजी मुझसे बोलते क्यों नहीं?"

कैकेयी ने बिना संकोच सारी बात कह दी, और यह भी जोड़ा: "राजा तुमसे कह नहीं पा रहे। जब तक तुम वन को नहीं चले जाते, ये न स्नान करेंगे, न भोजन।"

वाल्मीकि लिखते हैं कि यह सुनकर राम के मुख पर कोई विकार नहीं आया, जैसे चन्द्रमा की शोभा रात में घटती नहीं। उन्होंने कहा, "बस इतनी-सी बात? माता, मैं पिता के कहने पर अग्नि में कूद सकता हूँ, विष पी सकता हूँ, समुद्र में डूब सकता हूँ। आपने भरत के लिए राज्य माँगा है; मैं तो भरत को अपने प्राण भी हँसकर दे दूँ। मुझे केवल इस बात का खेद है कि पिताजी ने यह मुझसे स्वयं क्यों नहीं कहा। दूत भेजकर भरत को बुलवा लीजिए। मैं आज ही वन जाता हूँ।"

फिर उन्होंने कहा, "मुझे धन का लोभ नहीं। मुझे ऋषियों की तरह केवल धर्म में स्थित समझिए।" पिता और माता कैकेयी की परिक्रमा करके वे बाहर निकल आए। राजछत्र और चँवर उन्होंने लौटा दिए। लोगों ने उनके मुख को देखा। उस पर वही शान्ति थी जो कल थी।

एक रात में सब कुछ बदल गया था। पर जिस पर सबसे बड़ी चोट पड़ी, वही सबसे स्थिर रहा।

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