महाराज दशरथ का देहान्त
सुमन्त्र ख़ाली रथ लेकर लौटते हैं। दशरथ को वह तपस्वी बालक याद आता है जिसे उन्होंने भूल से मारा था, और वह शाप, और वे राम को पुकारते हुए प्राण त्याग देते हैं।
सुमन्त्र तीसरे दिन संध्या को अयोध्या लौटे। रथ ख़ाली था। जिन लोगों ने आशा लगाई थी कि राम लौट आएँगे, उन्होंने रथ को देखा और मुँह फेर लिया। नगर में न कोई हँसता था, न दुकानें खुली थीं।
महाराज दशरथ कौशल्या के भवन में थे। उन्होंने काँपती वाणी से पूछा, "सुमन्त्र, मेरा राम कहाँ सोता है? क्या खाता है? सीता ने क्या कहा? मुझे सब सुनाओ।" सुमन्त्र ने एक-एक बात बताई: राम ने प्रणाम कहा है और कहा है कि हम प्रसन्न हैं; सीता वन में ऐसे निर्भय चलती हैं जैसे उपवन में। राजा सुनते रहे और आँसू बहते रहे।
कौशल्या का धैर्य टूट गया। उनके मुँह से कड़वी बात निकल गई: "आपने एक स्त्री के कहने पर मेरे निर्दोष पुत्र को निकाल दिया।" वृद्ध राजा ने काँपते हाथ जोड़ दिए: "कौशल्या, तुम तो शत्रुओं पर भी दया करती हो। मुझ दुखी पर दया करो।" कौशल्या ने रोते हुए उनके हाथ अपने सिर पर रख लिए: "शोक ने मेरी बुद्धि हर ली थी। मुझे क्षमा कीजिए।"
पुराना पाप
राम के जाने के बाद छठी रात थी। आधी रात को दशरथ ने कौशल्या को जगाया। "देवी, मनुष्य जैसा करता है वैसा भरता है। आज मुझे अपना किया हुआ याद आ रहा है।" और उन्होंने वह बात कही जो वर्षों से मन में दबी थी।
"मैं तब युवा था, विवाह भी नहीं हुआ था। मुझे गर्व था कि मैं केवल शब्द सुनकर अँधेरे में लक्ष्य भेद सकता हूँ। वर्षा की एक रात मैं सरयू के तट पर शिकार को गया। अँधेरे में मैंने जल भरने का शब्द सुना और समझा कि कोई हाथी पानी पी रहा है। मैंने बाण छोड़ दिया।"
"तभी किसी मनुष्य की चीख़ सुनाई दी: 'मुझ तपस्वी को किसने मारा? मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था?' मैं दौड़कर पहुँचा। एक युवा तपस्वी बाण से बिंधा पड़ा था, और घड़ा पास में लुढ़का था। उसने कहा, 'राजन्, मुझे अपने मरने का दुःख नहीं। मेरे माता-पिता बूढ़े और अन्धे हैं। वे प्यासे बैठे मेरी राह देख रहे हैं। यह जल उन्हें दे आओ, और यह बाण निकाल दो, बहुत पीड़ा है।' मैंने बाण निकाला, और उसके प्राण निकल गए।" लोक में यही बालक श्रवण कुमार के नाम से जाना जाता है।
"मैं घड़ा लेकर उसके माता-पिता के पास गया। पाँवों की आहट सुनकर वृद्ध बोले, 'बेटा, इतनी देर क्यों लगा दी? तुम बोलते क्यों नहीं?' मैंने काँपते हुए सब सच कह दिया। वे मुझे लेकर पुत्र के पास गए और उससे लिपटकर रोए। फिर उसके पिता ने कहा, 'तुमने अनजाने में किया और स्वयं आकर बता दिया, इसलिए तुम्हें अभी भस्म नहीं करता। पर जैसे मैं पुत्र के वियोग में मर रहा हूँ, वैसे ही तुम भी पुत्र के वियोग में मरोगे।' और दोनों ने वहीं चिता पर प्राण त्याग दिए।"
अन्त
दशरथ ने कहा, "कौशल्या, वह शाप आज फल रहा है। मुझे अब तुम दिखाई नहीं देतीं। मुझे छुओ। जो लोग चौदह वर्ष बाद राम का लौटा हुआ मुख देखेंगे, वे मनुष्य नहीं, देवता हैं। हा राम! हा सीता! हा मेरे पुत्र!"
इतना कहते-कहते आधी रात के बाद उनके प्राण निकल गए। चार पुत्रों के पिता के पास उस समय एक भी पुत्र नहीं था।
सुबह वन्दीजन जगाने आए, तो महल में कोई हलचल न हुई। फिर स्त्रियों का विलाप उठा। राम और लक्ष्मण वन में थे, भरत और शत्रुघ्न ननिहाल में; अन्तिम संस्कार करने वाला कोई न था। वसिष्ठ ने शरीर को तेल से भरी नौका में रखवाया, और तेज़ घोड़ों पर दूत केकय देश की ओर दौड़ा दिए। उन्हें आज्ञा थी: भरत से कुछ मत कहना। बस इतना कहना कि गुरु ने तुरन्त बुलाया है।
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