निषादराज गुह, केवट और चित्रकूट
गंगा तट पर निषादराज गुह रात भर पहरा देते हैं, केवट राम के चरण धोकर ही नाव में बैठाता है, और तीनों चित्रकूट में कुटिया बनाते हैं।
कोसल देश की सीमा पार करते समय राम ने रथ रुकवाया, अयोध्या की ओर मुँह किया और हाथ जोड़कर कहा, "हे नगरी, चौदह वर्ष बाद लौटकर तुम्हारे दर्शन करूँगा।" फिर रथ आगे बढ़ा और संध्या तक गंगा के तट पर शृंगवेरपुर पहुँच गया।
गुह
वहाँ निषादों के राजा गुह रहते थे। राम उन्हें अपना मित्र मानते थे। समाचार पाते ही गुह अपने लोगों के साथ दौड़े आए, तरह-तरह के भोजन और बिछौने लेकर। उन्होंने कहा, "यह पूरा देश आपका है। आप यहीं राजा बनकर रहिए।"
राम ने उन्हें गले लगा लिया। "तुम पैदल चलकर मुझसे मिलने आए, यही मेरा सत्कार हो गया। मैं अब तपस्वी हूँ, दूसरे का दिया नहीं लेता। बस मेरे घोड़ों को चारा दे दो, वे मेरे पिता को प्रिय हैं।"
उस रात राम और सीता एक इंगुदी के वृक्ष के नीचे घास पर सोए। लक्ष्मण धनुष लिए थोड़ी दूर खड़े रहे। गुह ने कहा, "राजकुमार, आप भी सो जाइए, पहरा मैं दूँगा।" लक्ष्मण बोले, "जिन्हें देवता भी नहीं जीत सकते, वे भूमि पर घास पर सो रहे हैं। यह देखकर मुझे नींद कैसे आएगी?" दोनों रात भर जागते रहे और राम की बातें करते रहे।
सुबह राम ने बरगद का दूध मँगवाया और उससे अपनी और लक्ष्मण की जटाएँ बाँधीं। सुमन्त्र रोने लगे। राम ने उन्हें समझाया, "आप लौट जाइए और पिताजी को सँभालिए। उनसे कहिएगा कि हम तीनों प्रसन्न हैं।"
केवट
रामचरितमानस में यहाँ वह प्रसंग है जिसे लोग सबसे अधिक प्रेम से गाते हैं। राम ने नदी पार करने के लिए नाव माँगी, पर केवट ने नाव नहीं लाई।
मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥
वह बोला, "मैं आपका भेद जानता हूँ। लोग कहते हैं कि आपके चरणों की धूल में कोई ऐसी जड़ी है जो पत्थर को भी स्त्री बना देती है। मेरी नाव तो लकड़ी की है, पत्थर से कहीं नरम। वह भी स्त्री बनकर उड़ गई तो मेरा परिवार क्या खाएगा? मेरे पास कमाई का यही एक साधन है। पार उतरना है तो पहले चरण धोने दीजिए।"
राम सीता और लक्ष्मण की ओर देखकर हँस पड़े। "भाई, वही करो जिससे तुम्हारी नाव बची रहे।" केवट कठौते में जल लाया, चरण धोए, और वह जल पूरे परिवार को पिलाया। तब उसने तीनों को पार उतारा।
उस पार राम को संकोच हुआ कि देने को कुछ नहीं है। सीता ने मन की बात जानकर अपनी अँगूठी उतार दी। केवट ने हाथ जोड़ लिए: "आज मुझे क्या नहीं मिला? और फिर, हम दोनों का काम एक ही है। नाई नाई से मज़दूरी नहीं लेता। मैं लोगों को गंगा पार कराता हूँ, आप भवसागर पार कराते हैं। जब मैं आपके घाट पर आऊँ, तो मुझे पार लगा दीजिएगा।"
चित्रकूट
नाव के बीच धारा में पहुँचने पर सीता ने गंगा से प्रार्थना की कि हम तीनों सकुशल लौटें। उस पार से वे पैदल चले। आगे-आगे लक्ष्मण, बीच में सीता, पीछे राम।
प्रयाग में, जहाँ गंगा और यमुना मिलती हैं, वे महर्षि भरद्वाज के आश्रम पहुँचे। ऋषि ने कहा, "यहाँ से दस कोस पर चित्रकूट पर्वत है। वहाँ वन सुन्दर है और मन्दाकिनी नदी बहती है। वहीं रहो।" दोनों भाइयों ने लकड़ियाँ बाँधकर बेड़ा बनाया और यमुना पार की।
चित्रकूट देखकर सीता बच्चों की तरह प्रसन्न हुईं। राम उन्हें खिले हुए वृक्ष, झरने और हिरनों के झुण्ड दिखाते चलते। लक्ष्मण ने लकड़ी और पत्तों से एक पक्की कुटिया बनाई। राम ने उसमें वास्तु-पूजन किया, और तीनों ने उसमें ऐसे प्रवेश किया जैसे देवता अपनी सभा में प्रवेश करते हैं। राम ने कहा, "लक्ष्मण, तुम साथ हो और सीता साथ हैं, तो मुझे अयोध्या की याद नहीं आती।"
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