भरत-मिलाप और सिंहासन पर पादुकाएँ
चित्रकूट में भाइयों का मिलन होता है। राम पिता का वचन नहीं तोड़ते, तो भरत उनकी पादुकाएँ ले आते हैं और नन्दीग्राम से उनके सेवक बनकर राज्य चलाते हैं।
गंगा तट पर निषादराज गुह ने इतनी बड़ी सेना देखी तो उन्हें सन्देह हुआ: कहीं भरत राम को मारने तो नहीं जा रहा? उन्होंने अपने लोगों को नावों पर तैयार रहने को कहा और स्वयं भेंट लेकर भरत से मिले। भरत ने उनसे पूछा, "राम कहाँ सोए थे? मुझे वह स्थान दिखाओ।" गुह ने इंगुदी के नीचे की दबी हुई घास दिखाई। भरत उसे देखकर फूट-फूटकर रो पड़े: "जिसने कभी रेशम के बिना शयन नहीं किया, वह यहाँ सोया, और वह भी मेरे कारण।" गुह ने जान लिया कि इस हृदय में कपट नहीं है। उस दिन से भरत ने भी वल्कल पहन लिया और भूमि पर सोने लगे।
लक्ष्मण का सन्देह
चित्रकूट में अचानक वन के पशु भागने लगे और आकाश में धूल छा गई। लक्ष्मण एक ऊँचे शाल वृक्ष पर चढ़े। उन्होंने सेना देखी और रथ पर कोविदार के चिह्न वाली ध्वजा पहचान ली। वे क्रोध में नीचे उतरे: "भैया, अग्नि बुझा दीजिए और सीता को गुफा में भेज दीजिए। भरत राज्य पाकर भी तृप्त नहीं हुआ, हमें मारने आ रहा है। आज मैं उसे नहीं छोड़ूँगा।"
राम ने शान्त स्वर में कहा, "लक्ष्मण, भरत ने कब तुम्हारा बुरा किया है? वह मुझे प्राणों से प्रिय है। मुझे लगता है कि वह हमें लौटाने आया है। और यदि तुम्हें राज्य की इतनी चाह है, तो मैं भरत से कह दूँगा कि राज्य लक्ष्मण को दे दो। वह तुरन्त 'हाँ' कह देगा।" लक्ष्मण लज्जा से सिकुड़ गए।
मिलाप
भरत ने सेना दूर रोक दी और पैदल आगे बढ़े। उन्होंने कुटिया के बाहर राम को देखा: जटाएँ, वल्कल, भूमि पर कुश का आसन। "आर्य!" इससे आगे वे बोल न सके, और दौड़कर चरणों में गिर पड़े। राम ने उन्हें उठाकर छाती से लगा लिया। पहचानना कठिन था, इतने दुर्बल हो गए थे।
राम ने पहले राज्य की कुशल पूछी, फिर पूछा, "पिताजी कैसे हैं?" भरत ने रोते हुए बताया कि वे अब नहीं रहे। राम मूर्छित होकर गिर पड़े। फिर चारों भाई मन्दाकिनी पर गए और राम ने पिता को जल दिया, और उसी इंगुदी के फल का पिण्ड दिया जो वे स्वयं खाते थे: "पिताजी, मनुष्य जो खाता है, वही अपने देवताओं को अर्पित करता है।"
राम अडिग रहे
अगले दिन सभा बैठी। भरत ने हाथ जोड़कर कहा, "मेरी माता ने जो किया, वह मेरी इच्छा से नहीं हुआ। राज्य आपका है, लौट चलिए। या मुझे अपने स्थान पर वन में रहने दीजिए।" माताओं ने कहा, गुरु वसिष्ठ ने कहा, प्रजा ने कहा। जाबालि ऋषि ने यहाँ तक तर्क दिया कि मरे हुए पिता के वचन का अब क्या बन्धन।
राम ने सबको एक ही उत्तर दिया: "पिताजी ने जीते-जी जो कहा, उसे मैं उनके जाने के बाद झूठा नहीं कर सकता। चन्द्रमा अपनी शोभा छोड़ दे, हिमालय हिम छोड़ दे, पर मैं पिता की प्रतिज्ञा नहीं छोड़ूँगा। भरत, उन्होंने तुम्हें राज्य दिया है और मुझे वन। हम दोनों अपना-अपना भाग निभाएँ।"
भरत समझ गए कि राम नहीं लौटेंगे। तब उन्होंने सोने से मढ़ी एक जोड़ी खड़ाऊँ आगे रखीं: "आर्य, इन पर अपने चरण रख दीजिए। अब यही अयोध्या का राज चलाएँगी।" राम ने उन पर पाँव रखे और उतारकर भरत को दे दीं।
भरत ने उन्हें सिर पर रखकर प्रतिज्ञा की: "मैं चौदह वर्ष जटा और वल्कल धारण करके, फल-मूल खाकर, नगर के बाहर रहूँगा और राज्य का भार इन पादुकाओं को सौंपकर आपकी राह देखूँगा। चौदहवाँ वर्ष पूरा होने के अगले दिन यदि आपके दर्शन न हुए, तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।"
राम ने उन्हें गले लगाया और जाते-जाते एक बात कही: "माता कैकेयी की रक्षा करना। उन पर कभी क्रोध मत करना। तुम्हें मेरी और सीता की सौगन्ध है।"
नन्दीग्राम
भरत अयोध्या लौटे, पर महल में नहीं गए। नगर के बाहर नन्दीग्राम में उन्होंने पादुकाओं को सिंहासन पर रखा और स्वयं नीचे बैठे। राज्य का हर काम पहले पादुकाओं के सामने रखा जाता, फिर उस पर निर्णय होता।
उधर चित्रकूट में राम को हर वृक्ष के नीचे भरत और माताओं की याद आती थी, और अयोध्या के लोग भी आने-जाने लगे थे। वे सीता और लक्ष्मण को लेकर आगे चल दिए। अत्रि ऋषि के आश्रम में ऋषि-पत्नी अनसूया ने सीता को पुत्री की तरह प्यार किया और दिव्य वस्त्र, माला और अंगराग दिए। अगली सुबह तीनों ने दण्डक के घने वन में प्रवेश किया।
यहाँ अयोध्याकाण्ड पूरा होता है। आगे अरण्यकाण्ड की कथा है।
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