श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

अयोध्याकाण्ड: वचन और वनवास

राम, सीता और लक्ष्मण का वन-गमन

कौशल्या का शोक, लक्ष्मण का क्रोध, वनवास में साथ चलने का सीता का आग्रह, सुमित्रा का आशीर्वाद, और रथ के पीछे तमसा तक चलती पूरी अयोध्या।

राम सबसे पहले माता कौशल्या के पास गए। वे पुत्र के अभिषेक के लिए पूजा कर रही थीं। राम ने धीरे से कहा, "माँ, पिताजी भरत को राज्य दे रहे हैं, और मुझे चौदह वर्ष वन में रहना है।" कौशल्या ऐसे गिर पड़ीं जैसे कुल्हाड़ी से कटी शाखा।

लक्ष्मण वहीं खड़े थे। उनकी आँखें लाल हो गईं। "भैया, बुढ़ापे में पिताजी की बुद्धि फिर गई है। आप आज्ञा दें, मैं अकेला इस धनुष से पूरी अयोध्या को रोक लूँगा। देखता हूँ कौन आपका अभिषेक रोकता है।"

राम ने उनका हाथ पकड़ा: "लक्ष्मण, मैं तुम्हारा प्रेम जानता हूँ। पर जो राज्य पिता के वचन को तोड़कर मिले, वह मुझे नहीं चाहिए। इसमें कैकेयी माता का भी दोष नहीं। जो होना होता है, वही हमसे ऐसे काम कराता है। क्रोध छोड़ो और धर्म में मन लगाओ।"

सीता

घर पहुँचकर राम ने सीता को सब बताया और कहा, "तुम यहीं रहो। मेरे माता-पिता की सेवा करना, और भरत के सामने कभी मेरी प्रशंसा मत करना।"

सीता, जो सदा मधुर बोलती थीं, आज तनकर खड़ी हो गईं। "आर्यपुत्र, यह आप क्या कह रहे हैं? पिता, माता, भाई, पुत्र, सब अपने-अपने भाग्य का फल पाते हैं। केवल पत्नी पति के भाग्य में भागी होती है। आपको वनवास मिला है, तो वह मुझे भी मिला है। मैं आपके आगे-आगे चलूँगी और काँटों को पैरों से कुचलती जाऊँगी। आपके साथ वन मेरे लिए स्वर्ग है, और आपके बिना महल भी नरक।"

राम ने वन के कष्ट गिनाए: सिंह, साँप, काँटे, भूमि पर सोना, कन्द-मूल खाना। सीता ने एक न सुनी। अन्त में उन्होंने आँसुओं के बीच कहा, "क्या मेरे पिता ने एक ऐसे पुरुष को जामाता बनाया जो अपनी पत्नी को साथ ले जाने से डरता है?" तब राम ने उन्हें हृदय से लगा लिया: "मैं तो केवल तुम्हारा मन जानना चाहता था। चलो।"

लक्ष्मण ने राम के चरण पकड़ लिए: "मुझे छोड़कर मत जाइए। आप सोएँगे तो मैं पहरा दूँगा।" राम ने उन्हें भी साथ ले लिया।

सुमित्रा का आशीर्वाद

लक्ष्मण माता सुमित्रा से विदा लेने गए। उस माँ ने, जिसका पुत्र बिना किसी कारण के चौदह वर्ष के लिए जा रहा था, एक आँसू नहीं गिराया। उन्होंने कहा:

रामं दशरथं विद्धि मां विद्धि जनकात्मजाम्।
अयोध्यामटवीं विद्धि गच्छ तात यथासुखम्॥

बेटा, राम को दशरथ समझना, सीता को मुझे समझना, और वन को अयोध्या समझना। जाओ, सुख से जाओ।

विदा

तीनों ने अपना धन ब्राह्मणों और सेवकों में बाँट दिया और पिता के पास पहुँचे। दशरथ ने कहा, "राम, मुझे बन्दी बना लो और राजा बन जाओ।" राम ने सिर झुकाकर मना कर दिया। कैकेयी स्वयं वल्कल वस्त्र ले आईं। राम और लक्ष्मण ने उन्हें पहन लिया। सीता, जिन्होंने कभी रेशम के सिवा कुछ नहीं पहना था, वल्कल हाथ में लिए खड़ी रह गईं; उन्हें बाँधना नहीं आता था। राम ने स्वयं उसे उनके रेशमी वस्त्र के ऊपर बाँध दिया। पूरा अन्तःपुर रो पड़ा।

सुमन्त्र रथ ले आए। रथ चला तो पूरी अयोध्या उसके पीछे दौड़ी, बूढ़े, बच्चे, स्त्रियाँ। लोग चिल्ला रहे थे, "सुमन्त्र, धीरे चलाओ, हमें राम का मुख देख लेने दो!" वृद्ध राजा और कौशल्या नंगे पाँव पीछे भागे। राम ने मुड़कर देखा और सह न सके: "सुमन्त्र, तेज़ चलाओ।" दशरथ धूल में गिर पड़े। जब तक रथ की धूल दिखती रही, वे देखते रहे।

संध्या को रथ तमसा नदी के तट पर रुका। नगरवासी भी वहीं पहुँच गए और थककर सो गए। राम ने केवल जल पिया। भोर से पहले उन्होंने लक्ष्मण से कहा, "ये लोग हमें छोड़ेंगे नहीं। इन्हें सोता छोड़कर निकल चलो।" रथ चुपचाप नदी पार कर गया। सुबह अयोध्यावासी जागे तो रथ के पहियों के निशान भी आगे जाकर खो गए थे।

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