श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

किष्किन्धाकाण्ड: सुग्रीव से मैत्री

हनुमान से भेंट और सुग्रीव से मित्रता

पम्पा सरोवर पर हनुमान दोनों राजकुमारों से मिलते हैं और राम की प्रशंसा पाते हैं। वे उन्हें सुग्रीव के पास ले जाते हैं, और अग्नि के सामने मित्रता की शपथ होती है।

पम्पा सरोवर पर वसन्त उतरा हुआ था। कमल खिले थे, भौंरे गूँज रहे थे, कोयल बोल रही थी। जो दृश्य किसी और दिन मन को भा जाता, उसने आज राम का घाव हरा कर दिया। "लक्ष्मण, यह वसन्त मुझे जलाता है। सीता साथ होतीं तो यही सरोवर स्वर्ग लगता।" लक्ष्मण ने धीरज बँधाया: "भैया, उत्साह से बड़ा कोई बल नहीं। उत्साही के लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं।"

ऋष्यमूक पर भय

पास के ऋष्यमूक पर्वत पर वानरराज सुग्रीव अपने चार मंत्रियों के साथ छिपकर रहते थे। उनका बड़ा भाई वालि उनके प्राणों का शत्रु था। एक शाप के कारण वालि इस पर्वत पर नहीं आ सकता था, इसीलिए सुग्रीव यहाँ सुरक्षित थे।

सुग्रीव ने दो धनुषधारी युवकों को देखा और काँप उठे: "ये अवश्य वालि के भेजे हुए हैं।" उनके मंत्री हनुमान ने कहा, "राजन्, आप वानरों के राजा हैं, पर चंचलता नहीं छोड़ते। बिना जाने भय कैसा?" सुग्रीव बोले, "तो तुम ही जाकर पता करो। इनकी बातों और चेहरे से इनका मन पढ़ना।"

हनुमान की वाणी

हनुमान ने भिक्षु का रूप धरा और दोनों भाइयों के पास पहुँचे। प्रणाम करके मधुर वाणी में बोले, "आप दोनों तपस्वी के वेश में हैं, पर आपके कन्धे सिंह जैसे हैं और भुजाएँ राज्य की रक्षा के योग्य। आप इस वन में कैसे? मैं वानरराज सुग्रीव का मंत्री हूँ, पवन का पुत्र, मेरा नाम हनुमान है। सुग्रीव धर्मात्मा हैं, भाई के सताए हुए हैं, और आपसे मित्रता चाहते हैं।"

राम का मुख खिल उठा। वे लक्ष्मण की ओर मुड़े: "लक्ष्मण, इन्होंने जो कहा उसे सुना? जिसने ऋग्वेद नहीं सीखा, यजुर्वेद नहीं पढ़ा, सामवेद नहीं जाना, वह ऐसे नहीं बोल सकता। इन्होंने इतना कहा और एक भी शब्द अशुद्ध नहीं निकला। न बोलते समय मुख पर विकार आया, न भौंह टेढ़ी हुई। जिस राजा के पास ऐसा दूत हो, उसके सब काम अपने आप सिद्ध हो जाते हैं।"

यह प्रभु और उनके सबसे बड़े भक्त की पहली भेंट थी। लक्ष्मण ने अपनी पूरी कथा सुनाई। हनुमान ने अपना असली रूप धारण किया, दोनों भाइयों को कन्धों पर बैठाया और पर्वत पर चढ़ गए।

अग्नि की साक्षी

सुग्रीव ने हाथ बढ़ाया: "राम, यदि आपको मुझ वानर की मित्रता स्वीकार हो, तो यह मेरा हाथ है।" राम ने हाथ थामा और उन्हें गले लगा लिया। हनुमान ने लकड़ियाँ रगड़कर अग्नि जलाई। राम और सुग्रीव ने उसकी परिक्रमा की। सुग्रीव ने कहा, "आज से हमारा सुख और दुःख एक है।" फिर उन्होंने एक डाल तोड़कर बिछाई और दोनों उस पर बैठे।

आभूषण

सुग्रीव बोले, "राम, एक दिन हम यहाँ बैठे थे। एक राक्षस एक स्त्री को आकाश-मार्ग से ले जा रहा था। वह 'राम, राम' और 'लक्ष्मण' पुकार रही थी। उसने हमें देखकर अपना उत्तरीय और कुछ आभूषण गिराए। मैंने उन्हें सँभालकर रखा है।"

वे गुफा से एक पोटली ले आए। राम ने उसे हाथ में लिया और उनकी आँखें आँसुओं से ऐसी भर गईं जैसे चन्द्रमा कोहरे से ढक जाए। वे उसे छाती से लगाकर भूमि पर बैठ गए। फिर बोले, "लक्ष्मण, देखो, ये वैदेही के ही हैं न?"

लक्ष्मण ने जो उत्तर दिया, वह उनका पूरा चरित्र है:

नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले।
नूपुरे त्वभिजानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्॥

"मैं न बाजूबन्द पहचानता हूँ, न कुण्डल। मैं केवल नूपुर पहचानता हूँ, क्योंकि मैं प्रतिदिन उनके चरणों में प्रणाम करता था।"

सुग्रीव ने राम के आँसू पोंछे: "मैं नहीं जानता वह राक्षस कहाँ रहता है। पर मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि सीता को आपके पास लौटा लाऊँगा। मेरी भी पत्नी छीनी गई है, मैं तो नहीं रोता। शोक मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।"

राम ने आँखें पोंछीं। "मित्र, तुमने वही कहा जो एक सच्चा मित्र कहता है। अब बताओ, मुझे तुम्हारे लिए क्या करना है। मैंने आज तक झूठ नहीं कहा, और कभी कहूँगा भी नहीं।"

अंतिम अद्यतन:

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