उत्तरकाण्ड: रामराज्य और उसके बाद
श्रीराम का महाप्रस्थान
वर्षों के शासन के बाद काल राम के पास आता है। लक्ष्मण नगर को बचाने के लिए स्वयं को अर्पित करते हैं, पुत्रों का अभिषेक होता है, और राम पूरी अयोध्या के साथ सरयू में प्रवेश करते हैं।
इसके बाद राम ने बहुत वर्षों तक राज्य किया। उन्होंने अनेक यज्ञ किए, और हर यज्ञ में उनके पास सीता की वही स्वर्ण-प्रतिमा बैठी। धीरे-धीरे माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी एक-एक करके स्वर्ग चली गईं। भरत के पुत्रों ने सिन्धु के किनारे तक्षशिला और पुष्कलावती नगर बसाए, और लक्ष्मण के पुत्रों ने अपने-अपने राज्य पाए।
काल का आना
एक दिन राजभवन के द्वार पर एक तपस्वी आया। उसने लक्ष्मण से कहा, "मैं एक महर्षि का दूत हूँ। मुझे राम से मिलना है।"
राम ने उसका सत्कार किया। तपस्वी ने कहा, "मेरी बात केवल आपके सुनने योग्य है। हम दोनों की बातचीत के बीच जो कोई आए या उसे सुने, उसे आपको मृत्यु-दण्ड देना होगा।" राम ने वचन दे दिया और लक्ष्मण से कहा, "द्वारपाल को हटा दो। तुम स्वयं द्वार पर खड़े रहो।"
भीतर तपस्वी ने अपना असली रूप बताया: "मैं काल हूँ। मुझे ब्रह्मा ने भेजा है। उनका संदेश है: आपने रावण के वध के लिए मनुष्य का शरीर लिया था और कहा था कि इतने वर्ष पृथ्वी पर रहूँगा। वह समय पूरा हो गया। यदि आप और रहना चाहें, तो रहिए। यदि अपने लोक में लौटना चाहें, तो देवता आपकी राह देख रहे हैं।"
राम हँसे: "मैं इसी के लिए आया था। मेरा काम पूरा हुआ। मैं लौटूँगा।"
दुर्वासा
ठीक उसी समय द्वार पर दुर्वासा ऋषि आ पहुँचे, जिनका क्रोध प्रसिद्ध था। "लक्ष्मण, मुझे अभी राम से मिलना है।"
लक्ष्मण ने हाथ जोड़े: "मुनिवर, वे किसी काम में हैं। थोड़ी देर रुकिए।"
दुर्वासा की आँखें जल उठीं: "इसी क्षण भीतर जाकर मेरा आना बताओ, नहीं तो मैं तुम्हें, राम को, भरत को, इस नगर को और पूरे राज्य को शाप दे दूँगा।"
लक्ष्मण ने एक क्षण सोचा: "यदि मैं भीतर जाता हूँ, तो मेरी मृत्यु होगी। यदि नहीं जाता, तो सब नष्ट होंगे। सबका नाश होने से अच्छा है कि केवल मैं मरूँ।" वे भीतर चले गए।
राम ने काल को विदा किया और बाहर आकर दुर्वासा का सत्कार किया। ऋषि को बस भोजन चाहिए था; उनका हज़ार वर्ष का उपवास उसी दिन पूरा हुआ था। वे भोजन करके चले गए।
लक्ष्मण
राम सिर झुकाए बैठे रहे। उन्हें अपना वचन याद था, और उनके मुँह से कुछ नहीं निकला।
लक्ष्मण ने प्रसन्न मुख से कहा, "भैया, मेरे लिए दुःख मत कीजिए। यह सब काल का रचा हुआ है। आप अपनी प्रतिज्ञा निभाइए। जो वचन तोड़ता है, वह नरक में जाता है। यदि आपको मुझसे प्रेम है, तो धर्म की रक्षा के लिए मुझे दण्ड दीजिए।"
राम ने मंत्रियों और गुरु को बुलाया। वसिष्ठ ने कहा, "राम, वचन मत तोड़ो। वचन टूटा तो धर्म टूटेगा, और धर्म टूटा तो तीनों लोक नष्ट होंगे। सज्जन के लिए त्याग देना और वध करना, दोनों बराबर हैं। लक्ष्मण का त्याग कर दो।"
राम ने भरी सभा में कहा, "लक्ष्मण, मैं तुम्हारा त्याग करता हूँ।"
लक्ष्मण की आँखों में आँसू आ गए। वे अपने घर भी नहीं गए। सीधे सरयू के किनारे पहुँचे, आचमन किया, हाथ जोड़े और साँस रोक ली। इन्द्र उन्हें सशरीर स्वर्ग ले गए।
जिस भाई ने चौदह वर्ष पहरा दिया था, उसने अन्तिम पहरा भी दिया, और उसी द्वार पर।
निश्चय
राम ने कहा, "लक्ष्मण के बिना मैं एक क्षण नहीं रह सकता। आज मैं भरत का अभिषेक करके वन को जाऊँगा।"
भरत ने सिर हिलाया: "मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ, आपके बिना मुझे न राज्य चाहिए, न स्वर्ग। कुश और लव का अभिषेक कीजिए।" प्रजा भूमि पर गिर पड़ी: "जहाँ आप जाएँगे, वहाँ हम जाएँगे। हमें स्त्री-पुत्रों के साथ अपने पीछे चलने दीजिए।" राम ने कहा, "ऐसा ही हो।"
उन्होंने कुश को कोसल का राज्य दिया, जिसकी राजधानी कुशावती बनी, और लव को उत्तर कोसल का, जिसकी राजधानी श्रावस्ती बनी। दोनों को गोद में बैठाकर गले लगाया और विदा किया। शत्रुघ्न मथुरा से दौड़े आए: "मुझे छोड़कर मत जाइए।"
सुग्रीव वानरों के साथ आए, विभीषण राक्षसों के साथ। राम ने विभीषण से कहा, "जब तक प्रजा है, तुम लंका पर राज्य करो।" जाम्बवान से भी रुकने को कहा।
फिर वे हनुमान की ओर मुड़े: "तुमने जीवित रहने का निश्चय किया है। अपनी प्रतिज्ञा मत तोड़ना। जब तक संसार में मेरी कथा रहे, तुम प्रसन्न होकर विचरना।" हनुमान ने सिर झुकाया: "जब तक आपकी पवित्र कथा रहेगी, मैं आपकी आज्ञा मानकर पृथ्वी पर रहूँगा।"
सरयू
अगली सुबह राम ने महीन वस्त्र पहने और हाथ में कुश लिया। वे बिना बोले घर से निकले, जैसे सूर्य अस्त होने को चलता है। उनके दाहिने लक्ष्मी थीं और बाएँ भूदेवी। उनके पीछे भरत और शत्रुघ्न चले, फिर मंत्री, फिर पूरी अयोध्या: स्त्रियाँ, बच्चे, बूढ़े, पशु और पक्षी तक। वानर और भालू भी साथ थे। वाल्मीकि कहते हैं कि नगर में साँस लेने वाला कोई प्राणी पीछे नहीं रहा, और कोई दुखी नहीं था। सब ऐसे चल रहे थे जैसे उत्सव में जा रहे हों।
आधे योजन चलकर वे सरयू के उस घाट पर पहुँचे जिसे आज गुप्तार घाट कहते हैं। ब्रह्मा देवताओं के साथ आकाश में खड़े थे। उन्होंने कहा, "विष्णु, आइए। अपने भाइयों के साथ अपने स्वरूप में प्रवेश कीजिए।"
राम ने सरयू के जल में पाँव रखा। वे भाइयों सहित विष्णु के तेज में समा गए। जो उनके पीछे आए थे, उन्होंने भी उसी जल में डुबकी लगाई, और राम के कहने पर सबको वह लोक मिला जहाँ दुःख नहीं है।
कथा रहती है
अयोध्या ख़ाली हो गई। कथाएँ कहती हैं कि बाद में कुश लौटे और उन्होंने नगरी को फिर बसाया।
राम चले गए, पर एक वचन पृथ्वी पर रह गया। ब्रह्मा ने वाल्मीकि से कहा था कि जब तक पर्वत खड़े हैं और नदियाँ बहती हैं, रामकथा लोगों में चलती रहेगी। और राम ने हनुमान से कहा था कि जब तक कथा रहेगी, तुम रहोगे।
इसलिए जब भी यह कथा कही जाती है, जैसे अभी कही गई, तो माना जाता है कि सुनने वालों में एक और भी बैठा है, हाथ जोड़े हुए।
यहाँ रामायण पूरी होती है। जय सिया राम।
अंतिम अद्यतन:
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