किष्किन्धाकाण्ड: सुग्रीव से मैत्री
सम्पाती का समाचार और जाम्बवान का स्मरण
जटायु के भाई सम्पाती बताते हैं कि सीता सौ योजन समुद्र पार लंका में हैं। जाम्बवान हनुमान को उनकी भूली हुई शक्ति का स्मरण कराते हैं।
बूढ़े गिद्ध ने पहले तो सोचा था कि आज भोजन अपने आप चलकर आ गया है: इतने वानर एक-एक करके भूख से मरेंगे। पर 'जटायु' का नाम सुनकर उसका मन काँप गया। उसने पुकारा, "यह कौन है जो मेरे प्राणों से प्यारे भाई के मरने की बात कहता है? मैंने बहुत दिनों बाद उसका नाम सुना है। मुझे इस चट्टान से नीचे उतारो। सूर्य की किरणों से मेरे पंख जल गए हैं, मैं उड़ नहीं सकता।"
वानर पहले डरे, फिर अंगद ने उसे नीचे उतारा और जटायु की पूरी कथा सुनाई। गिद्ध की आँखों से आँसू बहने लगे।
सम्पाती की कथा
"मैं सम्पाती हूँ, जटायु का बड़ा भाई। युवावस्था में हम दोनों ने होड़ लगाई कि सूर्य तक उड़ेंगे। दोपहर होते-होते जटायु ताप से व्याकुल होने लगा। मैंने उसे अपने पंखों से ढक लिया। वह बच गया, पर मेरे पंख जल गए और मैं विन्ध्य पर्वत पर आ गिरा। तब से मुझे अपने भाई का कोई समाचार नहीं मिला था।"
फिर उसने वह कहा जिसके लिए वानरों ने महीने भर पृथ्वी छानी थी: "मैंने सीता को देखा है। एक युवती को रावण आकाश-मार्ग से ले जा रहा था। वह 'राम' और 'लक्ष्मण' पुकार रही थी और अपने आभूषण गिरा रही थी। रावण विश्रवा का पुत्र और कुबेर का भाई है। वह लंका में रहता है। यहाँ से समुद्र के पार, पूरे सौ योजन पर, एक द्वीप है। वहीं विश्वकर्मा की बनाई लंका नगरी है। हम गिद्ध बहुत दूर तक देख सकते हैं। मैं यहीं बैठा-बैठा देख रहा हूँ: सीता वहाँ राक्षसियों से घिरी बैठी हैं।"
उसने यह भी बताया कि एक ऋषि ने उससे कहा था कि जब तुम राम के दूतों को सीता का पता बताओगे, तुम्हारे पंख फिर उग आएँगे। और सबके देखते-देखते सम्पाती के नए लाल पंख निकल आए। वह प्रसन्न होकर आकाश में उड़ गया।
सौ योजन
वानर उछल पड़े। सीता का पता मिल गया था। पर जब वे समुद्र के किनारे पहुँचे, तो उनका उत्साह ठण्डा पड़ गया। सामने आकाश जैसा अपार जल था, जिसमें पहाड़ जैसी लहरें उठ रही थीं।
अंगद ने पूछा, "वीरो, तुममें से कौन सौ योजन लाँघ सकता है?"
एक ने कहा, "मैं दस योजन।" दूसरे ने कहा, "मैं बीस।" किसी ने तीस, किसी ने पचास, किसी ने अस्सी। वृद्ध जाम्बवान बोले, "युवावस्था में मैं इससे कहीं अधिक जा सकता था। अब बुढ़ापा है, फिर भी नब्बे योजन चला जाऊँगा। पर इससे काम नहीं बनेगा।" अंगद ने कहा, "मैं सौ योजन जा तो सकता हूँ, पर लौट पाऊँगा या नहीं, इसमें सन्देह है।" जाम्बवान ने उसे रोका: "तुम हमारे स्वामी हो। स्वामी को नहीं भेजा जाता।"
सब चुप हो गए।
जाम्बवान का स्मरण
एक ओर हनुमान चुपचाप बैठे थे, जैसे इस बात से उनका कोई सम्बन्ध ही न हो। जाम्बवान उनके पास गए।
"हनुमान, तुम अकेले चुप क्यों बैठे हो? तुम बल में, तेज में और बुद्धि में राम और लक्ष्मण के समान हो। क्या तुम्हें अपनी कथा याद नहीं? तुम्हारी माता अंजना हैं, और तुम पवनदेव के पुत्र हो। बचपन में तुमने उगते सूर्य को फल समझा और उसे पकड़ने तीन सौ योजन आकाश में उछल गए थे। इन्द्र ने वज्र मारा, तुम्हारी ठुड्डी टूटी, इसी से तुम्हारा नाम हनुमान पड़ा। तब तुम्हारे पिता ने क्रोध में बहना बन्द कर दिया और तीनों लोक घबरा उठे। देवताओं ने तुम्हें वर दिए: कोई अस्त्र तुम्हें मार नहीं सकता, और मृत्यु तुम्हारी इच्छा से ही आएगी।"
"उठो, वीर। यह सारी सेना तुम्हारा मुँह देख रही है। जैसे विष्णु ने तीन पग में तीनों लोक नाप लिए थे, वैसे ही इस समुद्र को लाँघ जाओ।"
जैसे-जैसे जाम्बवान बोलते गए, हनुमान का शरीर बढ़ता गया। उनका मुख जलती अग्नि जैसा चमकने लगा। उन्होंने पूँछ फटकारी और गरजकर कहा, "मैं पवन का पुत्र हूँ। मैं इस समुद्र को लाँघ सकता हूँ। मैं लंका को उखाड़कर ला सकता हूँ। मैं सीता को देखकर ही लौटूँगा।"
वानरों ने जयकार की। हनुमान महेन्द्र पर्वत की चोटी की ओर चल पड़े। उनके पाँवों के नीचे पर्वत काँप रहा था।
रामचरितमानस का सुन्दरकाण्ड इसी क्षण से आरम्भ होता है:
जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥
यहाँ किष्किन्धाकाण्ड पूरा होता है। जो शक्ति चाहिए थी, वह हनुमान में पहले से थी। उन्हें बस कोई याद दिलाने वाला चाहिए था।
अंतिम अद्यतन:
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