श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

सुन्दरकाण्ड: हनुमान की लंका-यात्रा

अशोक वाटिका में सीता

वृक्ष में छिपे हनुमान सीता को देखते हैं। भोर में रावण मनाने और धमकाने आता है, और सीता तिनके की ओट से उसे उत्तर देती हैं। त्रिजटा अपना स्वप्न सुनाती है।

अशोक वाटिका में वसन्त था। हनुमान एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर कूदते तो सोए हुए पक्षी उड़ जाते और फूल झड़कर उन पर गिर जाते। बीच में एक ऊँचा सफ़ेद मन्दिर था, और पास में एक घना शीशम का वृक्ष। हनुमान उसके पत्तों में छिपकर बैठ गए और नीचे देखने लगे।

पहला दर्शन

वृक्ष के नीचे एक स्त्री बैठी थी। वह एक ही मैला पीला वस्त्र पहने थी। उपवास से शरीर सूख गया था। केश की एक ही चोटी पीठ पर पड़ी थी। आँखों से आँसू बह रहे थे और वह बार-बार लम्बी साँस लेती थी। चारों ओर भयानक राक्षसियाँ बैठी थीं: किसी की एक आँख, किसी का एक कान, किसी का मुँह सूअर जैसा।

वाल्मीकि कहते हैं कि वह ऐसी दिखती थी जैसे धुएँ से ढकी अग्नि की लौ, जैसे कीचड़ में सना कमल, जैसे भूली हुई विद्या, जैसे टूटी हुई आशा।

हनुमान ने ध्यान से देखा। जो गहने राम ने बताए थे, उनमें से कुछ वृक्ष की डाल पर टँगे थे, और जो नहीं थे, वे वही थे जो ऋष्यमूक पर गिराए गए थे। वस्त्र का रंग भी वही था। "यही हैं। इन्हीं के लिए राम जीवित हैं, और राम के लिए ये।" उनकी आँखों से आँसू गिर पड़े। फिर उन्होंने सोचा, "रावण ने इस एक स्त्री के लिए जो किया है, उसके लिए राम सारी पृथ्वी को उलट दें, तो भी उचित होगा।"

रावण आता है

रात का अन्तिम पहर था। वेद-मंत्रों के शब्द से रावण जागा, और जागते ही उसका मन सीता की ओर गया। वह सैकड़ों स्त्रियों के साथ, जो हाथों में दीपक और चँवर लिए थीं, वाटिका में आया। हनुमान पत्तों में और सिमट गए।

सीता ने उसे आते देखा और काँप गईं, जैसे आँधी में केले का पेड़। उन्होंने घुटनों से पेट और भुजाओं से छाती ढक ली और भूमि पर बैठी रहीं।

रावण ने मीठे स्वर में कहा, "सीते, मुझसे डरो मत। मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छा के बिना नहीं छुऊँगा। पर यह मैला वस्त्र, यह भूमि पर सोना, यह उपवास छोड़ो। यौवन लौटकर नहीं आता। मेरी सब रानियों की स्वामिनी बनो। जो कुछ मैंने जीता है, वह सब तुम्हारा, और मैं भी। राम वल्कल पहनकर वन में भटक रहा है। वह जीवित है या नहीं, यह भी कौन जाने।"

तिनके की ओट

सीता ने अपने और उसके बीच एक तिनका रख लिया, और उसी से बात की।

"अपना मन मुझसे हटा और अपनी पत्नियों में लगा। जैसे पापी को सिद्धि नहीं मिलती, वैसे मैं तुझे नहीं मिल सकती। मैं राम की वैसे ही हूँ जैसे सूर्य की प्रभा। क्या यहाँ तुझे समझाने वाला कोई सज्जन नहीं है? राम से मित्रता कर ले। वे शरण में आए को क्षमा कर देते हैं। मुझे उन्हें लौटा दे, नहीं तो तू, तेरी लंका और तेरा कुल, कुछ नहीं बचेगा। तूने मुझे तब चुराया जब दोनों भाई वहाँ नहीं थे। कुत्ता बाघ के सामने नहीं ठहरता।"

रावण की आँखें जल उठीं। "मैंने जितना तुझसे मीठा कहा, तूने उतना ही मेरा अपमान किया। मैंने बारह महीने दिए थे। दस बीत गए। दो महीने और देता हूँ। फिर भी न मानी, तो तू मेरे सुबह के भोजन में परोसी जाएगी।" उसने राक्षसियों को आज्ञा दी, "जैसे भी हो, इसे मनाओ," और लौट गया।

राक्षसियाँ और त्रिजटा

राक्षसियों ने सीता को घेर लिया। कोई समझाती, "रावण देवताओं का स्वामी है।" कोई शूल दिखाती, "इसका कलेजा मैं खाऊँगी।" सीता रोती हुई बोलीं, "मनुष्य की स्त्री राक्षस की पत्नी नहीं बन सकती। तुम सब मुझे खा लो, मैं तुम्हारी बात नहीं मानूँगी।"

तभी त्रिजटा नाम की एक बूढ़ी राक्षसी नींद से उठी। "दुष्टाओ, अपने आप को खाओ, इसे मत छूना। मैंने अभी भोर का स्वप्न देखा है। मैंने राम को श्वेत वस्त्र पहने, हाथी-दाँत की पालकी में, सीता के साथ आकाश में जाते देखा। और रावण को देखा: सिर मुँड़ा हुआ, तेल में नहाया, लाल वस्त्र पहने, गधे पर बैठा दक्षिण दिशा की ओर जा रहा था। मैंने लंका को समुद्र में डूबते देखा। केवल विभीषण श्वेत छत्र के नीचे खड़े थे। इस देवी से क्षमा माँगो। यही तुम्हें बचा सकती है।"

राक्षसियाँ डर गईं और एक-एक करके सो गईं।

अन्तिम क्षण

पर सीता का धैर्य अब समाप्त हो चुका था। "दस महीने हो गए और राम नहीं आए। या तो वे अब नहीं रहे, या मुझे भूल गए। दो महीने बाद यह पापी मुझे मार डालेगा। उससे पहले मैं स्वयं प्राण दे दूँगी।" उनके पास न विष था, न शस्त्र। उन्होंने अपनी लम्बी चोटी हाथ में ली और शीशम की डाल पकड़कर खड़ी हो गईं।

उसी क्षण उनकी बाईं आँख फड़की, बाईं भुजा फड़की। ये शुभ शकुन थे। वे ठिठक गईं।

ऊपर पत्तों में हनुमान सब देख रहे थे। अब एक क्षण की भी देर नहीं की जा सकती थी।

अंतिम अद्यतन:

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