श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

बालकाण्ड: श्रीराम का जन्म और बाल्यकाल

विश्वामित्र का आगमन, ताड़का वध और यज्ञ-रक्षा

विश्वामित्र दशरथ से यज्ञ की रक्षा के लिए किशोर राम को माँगते हैं। राम ताड़का का वध करते हैं, दिव्यास्त्र पाते हैं और मारीच-सुबाहु को परास्त करते हैं।

महाराज दशरथ स्वयं द्वार तक गए और विश्वामित्र को आदर से भीतर ले आए। चरण धोए, आसन दिया और बोले, "मुनिवर, आपके आने से मेरा घर पवित्र हो गया। आज्ञा दीजिए, जो आप कहेंगे वह मैं करूँगा।"

विश्वामित्र ने कहा, "राजन्, मैं एक यज्ञ कर रहा हूँ। जब वह पूरा होने को आता है, मारीच और सुबाहु नाम के दो राक्षस वेदी पर रक्त और मांस बरसा देते हैं। यज्ञ में बैठकर मैं क्रोध नहीं कर सकता, शाप नहीं दे सकता। इसलिए दस रातों के लिए अपना ज्येष्ठ पुत्र राम मुझे दे दो।"

यह सुनकर दशरथ काँप उठे। बोले, "मुनिवर, मेरा राम अभी सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ। वह राक्षसों से कैसे लड़ेगा? मैं अपनी पूरी सेना लेकर स्वयं चलता हूँ। पर राम को मत माँगिए। साठ हज़ार वर्ष की आयु में मैंने उसे पाया है, उसके बिना मैं पल भर नहीं जी सकता।"

विश्वामित्र की भौंहें तन गईं। "पहले वचन दिया और अब मुकर रहे हो? यह रघुवंशियों की रीति नहीं है।" तब गुरु वसिष्ठ ने राजा को समझाया: "राजन्, विश्वामित्र स्वयं उन राक्षसों को मार सकते हैं। वे तुम्हारे पुत्र के भले के लिए ही उसे माँग रहे हैं। जिसके रक्षक विश्वामित्र हों, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" दशरथ ने भारी मन से राम को बुलाया, और लक्ष्मण अपने आप साथ हो लिए।

बला और अतिबला

तीनों पैदल चले। सरयू के तट पर विश्वामित्र ने राम को बला और अतिबला नाम की दो विद्याएँ दीं, जिनसे न थकान होती है, न भूख-प्यास सताती है। रात को दोनों राजकुमार घास के बिछौने पर सोए, और भोर में ऋषि ने उन्हें यह कहकर जगाया: "कौशल्या के सुपुत्र राम, पूर्व में उषा हो रही है, उठो।"

ताड़का

आगे एक घना, डरावना वन मिला, जहाँ न पक्षी बोलते थे, न कोई मनुष्य जाता था। विश्वामित्र ने बताया, "यहाँ कभी दो समृद्ध जनपद थे। ताड़का नाम की यक्षिणी ने इन्हें उजाड़ दिया। उसमें हज़ार हाथियों का बल है। राम, उसे मार डालो।"

राम ठिठके। स्त्री पर बाण चलाना उन्हें उचित नहीं लगा। विश्वामित्र बोले, "प्रजा की रक्षा राजा का धर्म है। जो निर्दोषों को खाती हो, उस पर दया करना अधर्म है।" राम ने कहा, "पिता ने कहा था कि आपकी आज्ञा मानूँ। मैं वही करूँगा।" उन्होंने धनुष की टंकार की। ताड़का धूल उड़ाती, पत्थर बरसाती दौड़ी आई। संध्या होने को थी और अँधेरे में राक्षसों का बल बढ़ जाता है, इसलिए राम ने देर न की और एक ही बाण से उसका अन्त कर दिया।

प्रसन्न होकर विश्वामित्र ने उसी रात राम को अनेक दिव्य अस्त्र दिए और उन्हें चलाने तथा लौटाने के मंत्र सिखाए।

यज्ञ की रक्षा

सिद्धाश्रम पहुँचकर विश्वामित्र मौन होकर यज्ञ में बैठे। दोनों भाई छह दिन और छह रात बिना सोए पहरा देते रहे। छठे दिन आकाश में गर्जना हुई। मारीच और सुबाहु सेना लेकर आए। राम ने मारीच पर मानवास्त्र चलाया, जिसने उसे मारा नहीं, पर सौ योजन दूर समुद्र में फेंक दिया। आग्नेयास्त्र से सुबाहु का अन्त हुआ, और शेष राक्षस भाग गए।

यज्ञ पूरा हुआ। ऋषियों ने राम को आशीर्वाद दिया। अगली सुबह राम ने हाथ जोड़कर पूछा, "मुनिवर, अब क्या आज्ञा है?" विश्वामित्र ने कहा, "मिथिला के राजा जनक के यहाँ एक यज्ञ है। वहाँ एक अद्भुत धनुष रखा है। चलो, तुम्हें दिखाऊँ।"

अंतिम अद्यतन:

आगे पढ़ें

पात्र

लक्ष्मण: समर्पित भ्राता

सुमित्रानन्दन लक्ष्मण श्रीराम के साथ वन गए, चौदह वर्ष उनकी रक्षा की और मेघनाद का वध किया। उनका जीवन, स्वभाव और निष्ठा।

पात्र

शत्रुघ्न: मौन सेवक भ्राता

दशरथ के सबसे छोटे पुत्र शत्रुघ्न ने भरत की सेवा की, वनवास काल में अयोध्या सँभाली, लवणासुर का वध किया और मथुरा नगरी बसाई।

पात्र

महर्षि वाल्मीकि: आदिकवि

रामायण के रचयिता और आदिकवि महर्षि वाल्मीकि: शोक से पहला श्लोक कैसे जन्मा, और कथा के भीतर उनकी अपनी भूमिका।

जीवन-शिक्षा

विपत्ति में साहस और धैर्य

वनवास, सीता का वियोग, युद्ध में मूर्छित भाई: श्रीराम ने अपने सबसे कठिन दिनों का सामना कैसे किया, और हम अपने दिनों का कैसे करें।

जीवन-शिक्षा

अहंकार पर विजय: रावण की सीख

रावण के पास विद्या, बल और स्वर्ण-नगरी थी, और अहंकार व वासना में उसने सब खो दिया। रामायण ने खलनायक को विद्वान क्यों बनाया, और यह किससे सावधान करता है।