बालकाण्ड: श्रीराम का जन्म और बाल्यकाल
राम-सीता विवाह और परशुराम से भेंट
दशरथ मिथिला आते हैं, चारों भाइयों का विवाह चार राजकुमारियों से होता है, मार्ग में परशुराम राम को ललकारते हैं, और अयोध्या वधुओं का स्वागत करती है।
जनक के दूत तीन रातें मार्ग में बिताकर अयोध्या पहुँचे और सारा समाचार सुनाया: राम ने शिव का धनुष तोड़ दिया है, और राजा जनक अपनी पुत्री सीता का विवाह उनसे करना चाहते हैं। महाराज दशरथ की आँखें भर आईं। उन्होंने गुरु वसिष्ठ से पूछा, और अगले ही दिन बारात चल पड़ी। आगे-आगे ऋषि, पीछे धन से लदी गाड़ियाँ और चतुरंगिणी सेना। चार दिन में वे मिथिला पहुँचे।
जनक ने नगर के बाहर आकर उनका स्वागत किया। दशरथ ने हँसकर कहा, "राजन्, दान लेने वाला देने वाले के अधीन होता है। आप जैसा कहेंगे, हम वैसा करेंगे।"
दो कुलों का मिलन
अगले दिन सभा बैठी। रीति के अनुसार पहले वसिष्ठ ने वर के कुल का परिचय दिया, ब्रह्मा से आरम्भ करके मनु, इक्ष्वाकु, सगर, भगीरथ, रघु और अज से होते हुए दशरथ तक। फिर जनक ने अपने कुल की परम्परा सुनाई।
उसके बाद जनक बोले, "मैं अपनी पुत्री सीता राम को देता हूँ, और दूसरी पुत्री उर्मिला लक्ष्मण को।" तब वसिष्ठ और विश्वामित्र ने एक बात और रखी: "राजन्, आपके छोटे भाई कुशध्वज की भी दो कन्याएँ हैं। उन्हें भरत और शत्रुघ्न के लिए दे दीजिए।" जनक ने प्रसन्न होकर हाथ जोड़ दिए। इस तरह एक ही मण्डप में चार विवाह तय हुए: राम और सीता, लक्ष्मण और उर्मिला, भरत और माण्डवी, शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति।
पाणिग्रहण
शुभ मुहूर्त में वेदी सजी। अग्नि प्रज्वलित हुई। जनक सीता को लेकर आए, उन्हें अग्नि के सामने राम के सम्मुख खड़ा किया, और वे शब्द कहे जो आज भी विवाह में याद किए जाते हैं:
इयं सीता मम सुता सहधर्मचरी तव।
प्रतीच्छ चैनां भद्रं ते पाणिं गृह्णीष्व पाणिना॥
अर्थात्, यह मेरी पुत्री सीता है, जो धर्म के हर काम में तुम्हारे साथ चलेगी। इसे स्वीकार करो, तुम्हारा कल्याण हो। इसका हाथ अपने हाथ में लो। यह पतिव्रता और सौभाग्यवती होगी, और छाया की तरह सदा तुम्हारे साथ रहेगी।
चारों भाइयों ने चारों वधुओं का हाथ थामा और अग्नि की परिक्रमा की। आकाश से फूल बरसे। जनक ने बेटियों को विदा करते समय इतना धन दिया कि गिनना कठिन था, पर सबसे कठिन था बेटियों को जाते हुए देखना।
परशुराम
अगले दिन विश्वामित्र हिमालय की ओर चले गए और बारात अयोध्या को लौट चली। रास्ते में अचानक आँधी उठी, अँधेरा छा गया और पक्षी डरकर चिल्लाने लगे। सामने जमदग्नि के पुत्र परशुराम खड़े थे, कन्धे पर फरसा, हाथ में एक विशाल धनुष। यह वही थे जिन्होंने क्षत्रियों का इक्कीस बार संहार किया था।
उन्होंने कहा, "राम, मैंने सुना है तुमने शिव का धनुष तोड़ा। यह दूसरा धनुष विष्णु का है। इस पर बाण चढ़ाकर दिखाओ। तब मैं तुमसे द्वन्द्व युद्ध करूँगा।"
दशरथ काँप गए और विनती करने लगे। राम ने शान्त स्वर में कहा, "आप ब्राह्मण हैं और मेरे गुरु विश्वामित्र के सम्बन्धी हैं, इसलिए मैं आप पर प्राण लेने वाला बाण नहीं छोड़ूँगा।" उन्होंने धनुष ले लिया, बाण चढ़ाया और बोले, "पर यह बाण खाली नहीं जाता। बताइए, इससे आपकी चलने की शक्ति नष्ट करूँ, या तप से जीते हुए आपके लोक?"
परशुराम का तेज उतर गया। उन्होंने पहचान लिया कि सामने कौन खड़ा है। बोले, "मेरे लोक ले लो, पर चलने की शक्ति रहने दो, क्योंकि मुझे सूर्यास्त से पहले महेन्द्र पर्वत लौटना है। तुमसे हारने में मुझे कोई लज्जा नहीं।" वे राम की परिक्रमा करके चले गए।
घर वापसी
अयोध्या ध्वजाओं से सजी थी और मार्गों पर जल छिड़का गया था। कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी ने बहुओं की आरती उतारी और उन्हें महल में ले गईं। कुछ दिन बाद भरत अपने मामा युधाजित के साथ ननिहाल चले गए, और शत्रुघ्न उनके साथ गए।
राम और सीता के दिन आनन्द में बीतने लगे। वाल्मीकि कहते हैं कि सीता राम को प्रिय थीं क्योंकि पिता ने उन्हें चुना था, और उससे भी अधिक अपने गुणों और रूप के कारण। और राम के मन की बात सीता बिना कहे जान लेती थीं।
यहाँ बालकाण्ड पूरा होता है। आगे की कथा अयोध्याकाण्ड में है, जहाँ एक ही रात में सब कुछ बदल जाता है।
अंतिम अद्यतन:
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