किष्किन्धाकाण्ड: सुग्रीव से मैत्री
सीता की खोज का आरम्भ
सुग्रीव चारों दिशाओं में खोजी दल भेजते हैं और एक मास का समय देते हैं। राम अपनी अँगूठी हनुमान को देते हैं। दक्षिण का दल एक गुफा में भटककर समय खो देता है।
सुग्रीव ने सारी सेना को इकट्ठा किया और चार दल बनाए। उन्होंने पूरी पृथ्वी का भूगोल ऐसे सुनाया जैसे हथेली पर देख रहे हों, क्योंकि वालि के भय से वे हर देश में भाग चुके थे।
पूर्व दिशा में उन्होंने विनत को भेजा, पश्चिम में तारा के पिता सुषेण को, और उत्तर में शतबलि को। हर दल को नदियाँ, पर्वत, नगर और वन गिनाकर बताए।
पर सबसे अधिक ध्यान उन्होंने दक्षिण दिशा पर दिया, क्योंकि रावण उसी ओर गया था। उस दल का नेता युवराज अंगद को बनाया, और उसमें अपने सबसे अच्छे वीर रखे: हनुमान, वृद्ध ऋक्षराज जाम्बवान, नील, और अन्य। सबसे उन्होंने कहा, "एक मास में लौट आना। जो आकर कहेगा कि मैंने सीता को देखा, वह मेरे बराबर सुख पाएगा। और जो एक मास से अधिक लगाएगा, उसे मृत्यु-दण्ड मिलेगा।"
अँगूठी
फिर सुग्रीव हनुमान की ओर मुड़े: "हनुमान, पृथ्वी, आकाश, जल, कहीं भी तुम्हारी गति नहीं रुकती। बल, बुद्धि, देश-काल की समझ और नीति, ये सब तुममें हैं। मुझे सबसे अधिक भरोसा तुम्हीं पर है।"
राम ने यह सुना, और उन्हें भी लगा कि काम इसी के हाथों होगा। उन्होंने अपने नाम से अंकित अँगूठी उतारी और हनुमान को दी: "इसे देखकर जानकी पहचान लेंगी कि तुम मेरे पास से आए हो, और डरेंगी नहीं। तुम्हारा उत्साह और सुग्रीव का विश्वास कह रहे हैं कि तुम सफल होगे।"
हनुमान ने अँगूठी सिर से लगाई, राम के चरण छुए और चल पड़े।
एक मास
पूर्व, पश्चिम और उत्तर के दल एक महीने में ख़ाली हाथ लौट आए। अब सबकी आशा दक्षिण पर थी।
अंगद का दल विन्ध्य पर्वत के वनों, गुफाओं और घाटियों में खोजता रहा। दिन बीतते गए। एक जगह वन ऐसा सूखा मिला जहाँ न पत्ता था, न जल। भूख और प्यास से सबके प्राण सूखने लगे।
तभी उन्होंने एक गुफा के मुँह से हंस और सारस निकलते देखे, जिनके पंख भीगे थे। हनुमान ने कहा, "भीतर अवश्य जल है।" एक-दूसरे का हाथ पकड़कर वे अँधेरी गुफा में उतरे। बहुत दूर चलने पर अचानक उजाला हुआ। सामने सोने के वृक्ष थे, मणियों के महल, निर्मल सरोवर और फलों के ढेर। वहाँ स्वयंप्रभा नाम की एक तपस्विनी बैठी थीं।
उन्होंने सबको भोजन और जल दिया। जब वानरों ने अपनी कथा कही, तो वे बोलीं, "जो इस गुफा में आता है, वह जीवित बाहर नहीं निकल पाता। पर तुम राम के काम से निकले हो। आँखें बन्द करो।" आँखें खोलीं तो वे समुद्र के किनारे खड़े थे।
निराशा
पर वसन्त आ चुका था। गुफा की माया में उनका पूरा महीना बीत गया था।
अंगद भूमि पर बैठ गया। "समय निकल गया और सीता नहीं मिलीं। सुग्रीव का दण्ड कठोर है, और मैं तो वालि का पुत्र हूँ; वे मुझे वैसे ही नहीं चाहते। किष्किन्धा लौटकर मरने से अच्छा है यहीं अन्न-जल त्यागकर मर जाऊँ।"
हनुमान ने उसे समझाया: "अंगद, सुग्रीव धर्मात्मा हैं और तुम्हें पुत्र मानते हैं। और यह भी सोचो कि लक्ष्मण के बाण तुम्हें किस गुफा में नहीं ढूँढ लेंगे।" पर अंगद का मन टूट चुका था। उसने कुश बिछाया और दक्षिण की ओर मुँह करके बैठ गया। एक-एक करके सब वानर उसके पास बैठ गए।
वे आपस में राम की कथा कहने लगे: वनवास, सीता-हरण, और वह गिद्धराज जटायु, जिसने सीता के लिए रावण से लड़ते हुए प्राण दे दिए।
पास की एक चट्टान पर एक बहुत बूढ़ा गिद्ध बैठा था। उसके पंख नहीं थे। 'जटायु' का नाम सुनते ही उसने सिर उठाया।
अंतिम अद्यतन:
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