श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

युद्धकाण्ड (लंकाकाण्ड): लंका का युद्ध

अंगद का दूत-कर्म: शान्ति का अन्तिम प्रस्ताव

रावण राम के मायावी सिर से सीता का मनोबल तोड़ना चाहता है। पहले प्रहार से पूर्व राम अंगद को सन्धि का प्रस्ताव लेकर भेजते हैं। रावण नहीं मानता और घेरा आरम्भ होता है।

रावण ने सुना कि समुद्र पर सेतु बँध गया, और उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने अपने दो मंत्रियों, शुक और सारण, को वानर का रूप धरकर सेना गिनने भेजा। विभीषण ने उन्हें पहचानकर पकड़ लिया। वे काँपते हुए राम के सामने लाए गए।

राम हँसे: "यदि तुमने सेना देख ली हो, तो जाओ। और कुछ देखना शेष हो तो विभीषण स्वयं तुम्हें दिखा देंगे। बँधे हुए दूत को मारा नहीं जाता। रावण से मेरी ओर से कहना: जिस बल के भरोसे तुमने सीता को चुराया, वह बल कल सूर्योदय पर मुझे दिखा देना।"

दोनों ने लौटकर रावण से कहा, "महाराज, राम, लक्ष्मण, विभीषण और सुग्रीव, ये चार ही लंका को उखाड़ने के लिए बहुत हैं। सीता को लौटा दीजिए।" रावण ने उन्हें धिक्कारकर सभा से निकाल दिया।

मायावी सिर

तब रावण को एक नीच उपाय सूझा। उसने विद्युज्जिह्व नाम के मायावी राक्षस से राम का कटा हुआ सिर और धनुष बनवाया, ठीक वैसा ही। फिर वह अशोक वाटिका गया।

"सीते, जिसके भरोसे तुम मुझे ठुकराती थीं, वह रात को सोते हुए मारा गया। लक्ष्मण भाग गया। यह देखो।" उसने वह सिर सीता के सामने रखवा दिया।

सीता ने वही मुख देखा, वही आँखें, वही चूड़ामणि। वे कटी हुई लता की तरह गिर पड़ीं। होश आया तो वे उस सिर के पास बैठकर रोईं: "आप तो कहते थे कि हम साथ-साथ लौटेंगे। मुझे भी वहीं ले चलो, रावण। अपनी तलवार से मुझे भी मार और मेरा शरीर इनके शरीर के पास रख दे।"

तभी एक सेवक ने आकर रावण को किसी आवश्यक काम से बुलाया। वह गया, और उसके जाते ही सिर और धनुष ग़ायब हो गए।

विभीषण की पत्नी सरमा सीता की रखवाली में थीं, और वे सीता से स्नेह करती थीं। उन्होंने सीता को उठाया: "देवी, यह माया थी। राम सकुशल हैं। वे सेना के साथ समुद्र पार कर चुके हैं। सुनो, यह भेरी का शब्द है। राक्षस युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं।" सीता के प्राण लौट आए।

अंगद का जाना

राम सुवेल पर्वत पर चढ़े और वहाँ से लंका को देखा: चार द्वार, हर द्वार पर लाखों राक्षस। उन्होंने भी चार दल बनाए। पूर्व द्वार पर नील, दक्षिण पर अंगद, पश्चिम पर हनुमान, और उत्तर द्वार पर, जहाँ स्वयं रावण था, राम और लक्ष्मण।

सब तैयार था। पर राम ने आक्रमण की आज्ञा नहीं दी। उन्होंने कहा, "राजा का धर्म है कि युद्ध से पहले शान्ति का एक अवसर और दे। अंगद, तुम जाओ। रावण से कहो: तुमने ऋषियों, देवताओं और स्त्रियों पर जो अत्याचार किए, उनका घड़ा भर गया है। फिर भी, यदि तुम सीता को आदर के साथ लौटाकर मेरी शरण में आ जाओ, तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा। नहीं तो मैं पृथ्वी को राक्षसों से ख़ाली कर दूँगा, और लंका विभीषण की होगी।"

अंगद एक छलाँग में रावण की सभा में जा उतरा। उसने अपना परिचय दिया, "मैं वालि का पुत्र अंगद हूँ, राम का दूत," और संदेश शब्द-शब्द सुना दिया।

रावण क्रोध से चिल्लाया: "पकड़ो इस मूर्ख को! मार डालो!" चार राक्षसों ने अंगद को पकड़ लिया। अंगद ने उन्हें पकड़ने दिया, फिर चारों को बगल में दबाए महल की छत पर उछल गया। वहाँ से उसने उन्हें झटककर नीचे गिरा दिया, पाँव की ठोकर से महल का शिखर तोड़ डाला, अपना नाम पुकारा और राम के पास लौट आया।

रामचरितमानस में यह प्रसंग और भी रोचक है। वहाँ अंगद सभा में अपना पाँव जमा देता है और कहता है: "यदि कोई मेरा पाँव हिला दे, तो राम लौट जाएँगे और मैं सीता को हार जाऊँगा।" एक-एक करके सब योद्धा आते हैं, और कोई उसे हिला नहीं पाता। अन्त में रावण स्वयं उठता है। अंगद पाँव हटा लेता है: "मेरे चरण क्यों पकड़ते हो? राम के चरण पकड़ो।"

घेरा

शान्ति का द्वार बन्द हो गया। राम ने संकेत किया। वानर-सेना वृक्ष और शिलाएँ लिए लंका के परकोटे पर टूट पड़ी। खाइयाँ पाट दी गईं। सोने के तोरण गिरने लगे। "राम की जय! लक्ष्मण की जय! सुग्रीव की जय!"

भीतर से भेरियाँ बजीं, और चारों द्वार खुल गए।

जिसने युद्ध का कारण बनाया था, उसे भी अन्त तक लौटने का अवसर दिया गया। रामायण चाहती है कि हम यह बात याद रखें।

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