श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

अरण्यकाण्ड: वन के वर्ष

राम का विलाप, जटायु के अन्तिम वचन और कबन्ध

राम कुटिया सूनी पाते हैं और व्याकुल होकर वन में खोजते हैं। मरणासन्न जटायु रावण का नाम बताते हैं, राम उनका संस्कार करते हैं, और कबन्ध सुग्रीव का मार्ग बताता है।

लौटते हुए राम को हर ओर अपशकुन दिखे। पीछे सियार रो रहा था। तभी सामने से लक्ष्मण आते दिखे, अकेले। राम का मुँह सूख गया: "लक्ष्मण, तुम सीता को छोड़कर क्यों आए? मेरा बायाँ नेत्र फड़क रहा है। वह जीवित नहीं होगी।"

लक्ष्मण ने सिर झुकाकर सब बताया, सीता के कठोर वचन भी। राम ने कहा, "क्रोध में कही स्त्री की बात पर तुम्हें नहीं आना चाहिए था।" दोनों दौड़ते हुए आश्रम पहुँचे।

सूनी कुटिया

कुटिया ऐसी थी जैसे हेमन्त में बिना कमल का सरोवर। आसन बिखरे थे, कुश उड़ रहा था। राम ने पुकारा। फिर सोचा, वह छिपकर हँसी कर रही है। फिर सोचा, फूल लेने गई होगी, या नदी पर। वे गोदावरी तक दौड़े, लौटे, फिर दौड़े।

फिर उन्होंने वृक्षों से पूछना शुरू किया। "हे कदम्ब, तुमने मेरी प्रिया को देखा? हे अशोक, तुम शोक हरने वाले हो, बताओ वह कहाँ है। हे हिरनो, वह तुम्हारी जैसी आँखों वाली थी, तुमने उसे देखा?" हिरन उठे, आकाश की ओर देखा और दक्षिण की ओर मुँह करके चल दिए। लक्ष्मण ने कहा, "भैया, ये हमें दिशा बता रहे हैं।"

दक्षिण की ओर उन्हें भूमि पर गिरे फूल मिले। राम ने पहचाना: "ये मैंने ही आज सुबह उसके केशों में लगाए थे।" आगे टूटा हुआ रथ, टूटा धनुष, मरे हुए खच्चर, बड़े-बड़े पैरों के निशान, और रक्त की बूँदें मिलीं।

राम का शोक क्रोध में बदल गया। उनकी आँखें लाल हो गईं: "देवता चुपचाप देखते रहे! आज यदि वे मेरी सीता नहीं लौटाते, तो मैं अपने बाणों से आकाश भर दूँगा, समुद्र सुखा दूँगा, तीनों लोक नष्ट कर दूँगा।" उन्होंने धनुष उठा लिया।

लक्ष्मण ने हाथ जोड़े। "भैया, आप सदा सबका भला चाहते रहे हैं। एक के अपराध के लिए सारे संसार को दण्ड मत दीजिए। दुःख किस पर नहीं आता? सूर्य और चन्द्रमा को भी ग्रहण लगता है। आप ही धैर्य खो देंगे, तो साधारण मनुष्य क्या करेगा? हम खोजेंगे। न मिलीं, तब जो जी चाहे कीजिएगा।" राम ने धनुष नीचे कर लिया।

जटायु

थोड़ा आगे रक्त में सना एक विशाल पक्षी पड़ा था। राम ने धनुष तान लिया: "इसी ने सीता को खाया है।" तब एक क्षीण स्वर आया: "वत्स, जिसे तुम औषधि की तरह वन में खोज रहे हो, उस देवी को और मेरे प्राणों को रावण ले गया। मैंने उसका रथ तोड़ा, सारथी मारा। मैं थक गया था, उसने मेरे पंख काट दिए। वह उसे दक्षिण की ओर ले गया।"

राम धनुष फेंककर जटायु से लिपट गए। "लक्ष्मण, मेरा दुर्भाग्य देखो। राज्य गया, पिता गए, सीता गई, और अब मेरे लिए प्राण देने वाला यह पक्षी भी जा रहा है।" जटायु कुछ और कहना चाहते थे: "वह विश्रवा का पुत्र है, कुबेर का भाई..." और उनका सिर एक ओर लुढ़क गया।

राम ने कहा, "लक्ष्मण, लकड़ियाँ लाओ। मेरे लिए यह वैसे ही पूज्य हैं जैसे महाराज दशरथ।" उन्होंने स्वयं चिता सजाई, स्वयं अग्नि दी, गोदावरी में जाकर उन्हें जल दिया, और कहा, "गृध्रराज, जो गति यज्ञ करने वालों को और भूमि-दान करने वालों को मिलती है, वह तुम्हें मिले।" जिस पुत्र को पिता का संस्कार करने का अवसर नहीं मिला था, उसने वह एक पक्षी के लिए किया।

कबन्ध

दोनों भाई दक्षिण की ओर बढ़े। एक घने वन में अचानक दो विशाल भुजाओं ने उन्हें जकड़ लिया। सामने एक विचित्र राक्षस था: न सिर, न गर्दन, पेट में मुँह, छाती में एक आँख, और एक-एक योजन लम्बी भुजाएँ। वह कबन्ध था।

लक्ष्मण क्षण भर को घबराए। राम ने कहा, "इसका बल इसकी भुजाओं में है।" दोनों ने तलवार से एक-एक भुजा काट डाली। कबन्ध ने गिरकर पूछा, "तुम कौन हो?" नाम सुनकर वह प्रसन्न हो उठा: "मैं शाप से ऐसा बना था, और मुझे कहा गया था कि राम तुम्हारी भुजाएँ काटेंगे तब मुक्ति होगी। मेरा दाह कर दो, फिर मैं तुम्हें मार्ग बताऊँगा।"

चिता से एक दिव्य पुरुष निकला। उसने कहा, "राम, संकट में मनुष्य को मित्र की आवश्यकता होती है, और मित्र वही बनता है जो स्वयं संकट में हो। पम्पा सरोवर के पास ऋष्यमूक पर्वत पर सुग्रीव नाम का वानर रहता है। उसके भाई ने उसे राज्य से निकाल दिया है। उससे अग्नि के सामने मित्रता करो। वह तुम्हारी सीता को खोज निकालेगा। मार्ग में मतंग ऋषि का आश्रम है। वहाँ शबरी नाम की तपस्विनी तुम्हारी राह देख रही है।"

इतना कहकर वह आकाश में चला गया। बहुत दिनों बाद राम के मन में आशा की एक किरण जगी।

अंतिम अद्यतन:

आगे पढ़ें

पात्र

हनुमान: जीवन, कथाएँ और राम-भक्ति

अंजना और केसरी के पुत्र हनुमान: जन्म, लंका-यात्रा, संजीवनी पर्वत, अयोध्या में उनके दर्शन पहले क्यों होते हैं, और उनसे मिलने वाली सीख।

पात्र

लक्ष्मण: समर्पित भ्राता

सुमित्रानन्दन लक्ष्मण श्रीराम के साथ वन गए, चौदह वर्ष उनकी रक्षा की और मेघनाद का वध किया। उनका जीवन, स्वभाव और निष्ठा।

जीवन-शिक्षा

अहंकार पर विजय: रावण की सीख

रावण के पास विद्या, बल और स्वर्ण-नगरी थी, और अहंकार व वासना में उसने सब खो दिया। रामायण ने खलनायक को विद्वान क्यों बनाया, और यह किससे सावधान करता है।