बालकाण्ड: श्रीराम का जन्म और बाल्यकाल
श्रीराम का जन्म
चैत्र शुक्ल नवमी को मध्याह्न में अयोध्या में कौशल्या के यहाँ राम का जन्म होता है। फिर भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न जन्म लेते हैं और वसिष्ठ नामकरण करते हैं।
यज्ञ को बारह महीने बीत गए। चैत्र का महीना आया। शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी, पुनर्वसु नक्षत्र था, और सूर्य ठीक सिर के ऊपर था। न अधिक गर्मी थी, न सर्दी। शीतल, मन्द और सुगन्धित हवा चल रही थी। उसी घड़ी महारानी कौशल्या ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसके लक्षण देखकर ज्योतिषी चकित रह गए।
गोस्वामी तुलसीदास इस क्षण को इन शब्दों में गाते हैं:
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
रामचरितमानस कहती है कि माता ने पहले प्रभु का चतुर्भुज रूप देखा, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म। कौशल्या ने हाथ जोड़कर कहा, "यह रूप छोड़िए, और वह बाल-लीला कीजिए जो माँ को प्रिय होती है।" तब भगवान शिशु बनकर रोने लगे।
इसके बाद कैकेयी ने भरत को जन्म दिया, और सुमित्रा के यहाँ दो पुत्र हुए, लक्ष्मण और शत्रुघ्न।
अयोध्या का उत्सव
समाचार फैलते ही नगरी नाच उठी। गलियों में इतनी भीड़ हो गई कि निकलना कठिन हो गया। गन्धर्वों ने गाया, अप्सराओं ने नृत्य किया, आकाश से फूल बरसे और देवताओं की दुन्दुभियाँ बजीं। महाराज ने ब्राह्मणों को गायें, सोना और रत्न दिए, और सूत-मागधों को मुँह-माँगा पुरस्कार। जिस राजा ने जीवन भर पुत्र का मुख देखने की राह देखी थी, उसके आँगन में आज चार बालक थे।
नामकरण
ग्यारह दिन बीतने पर कुलगुरु वसिष्ठ ने नामकरण किया। कौशल्या के पुत्र का नाम रखा गया राम, क्योंकि वे सबको आनन्द देने वाले थे। कैकेयी के पुत्र भरत कहलाए, सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न।
चार भाई
चारों बालक साथ खेलते, साथ खाते और साथ पढ़ते। पर बचपन से ही एक बात सबने देखी। लक्ष्मण राम के बिना न सोते थे और न भोजन करते थे। राम घोड़े पर निकलते तो लक्ष्मण धनुष लेकर पीछे चलते। वाल्मीकि कहते हैं कि लक्ष्मण राम के लिए बाहर विचरने वाला दूसरा प्राण थे। उसी तरह शत्रुघ्न भरत से जुड़े रहे।
गुरु वसिष्ठ से चारों ने वेद पढ़े, धनुर्विद्या सीखी, और हाथी, घोड़े तथा रथ चलाना सीखा। वे पिता की सेवा में तत्पर रहते थे। चारों में राम सबसे तेजस्वी थे, फिर भी सबसे विनम्र। प्रजा उन्हें देखती तो उसका मन भर आता।
धीरे-धीरे राजकुमार किशोर हुए। एक दिन महाराज दशरथ मंत्रियों के साथ उनके विवाह की बात कर ही रहे थे कि द्वारपाल ने आकर सूचना दी: "महाराज, द्वार पर महर्षि विश्वामित्र पधारे हैं।"
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