श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

उत्तरकाण्ड: रामराज्य और उसके बाद

सीता का वन-गमन

राम को पता चलता है कि कुछ नागरिक रानी के बारे में क्या कह रहे हैं। वे सिंहासन पर प्रजा के विश्वास को अपने सुख से ऊपर रखते हैं, और लक्ष्मण सीता को वन में छोड़ आते हैं।

यह प्रसंग रामायण का सबसे कठिन प्रसंग है। इसे पढ़ने से पहले दो बातें जान लेनी चाहिए। पहली, अनेक विद्वान मानते हैं कि उत्तरकाण्ड वाल्मीकि की मूल रचना में बाद में जुड़ा, और गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी रामचरितमानस में यह प्रसंग कहा ही नहीं; उनकी कथा रामराज्य पर पूरी हो जाती है। दूसरी, भारत में सदियों से इस पर प्रश्न उठते रहे हैं, और उठने चाहिए। यहाँ कथा वैसे ही कही गई है जैसी परम्परा में चली आई है।

शुभ समाचार

कई वर्ष सुख से बीते। एक दिन राम ने सीता में गर्भ के लक्षण देखे और उनका मन आनन्द से भर गया। उन्होंने पूछा, "वैदेही, तुम्हारी कोई इच्छा हो तो कहो।" सीता ने मुस्कुराकर कहा, "मेरा मन गंगा के किनारे के तपोवन देखने को करता है। वहाँ ऋषियों के पास एक रात रहना चाहती हूँ।" राम ने कहा, "कल ही जाना।"

नगर की बात

उसी शाम राम अपने मित्रों के बीच बैठे थे। उनमें भद्र नाम का एक व्यक्ति था जो नगर के समाचार लाता था। राम ने पूछा, "भद्र, प्रजा मेरे बारे में, सीता के बारे में, मेरे भाइयों के बारे में क्या कहती है? अच्छा और बुरा, दोनों बताओ।"

भद्र ने पहले अच्छा बताया: समुद्र पर सेतु, रावण का वध। राम ने कहा, "और?" भद्र ने सिर झुका लिया। "महाराज, चौराहों और बाज़ारों में लोग यह भी कहते हैं कि राम ने सब कुछ अद्भुत किया, पर जिस सीता को रावण गोद में उठाकर ले गया और जो इतने दिन लंका में उसके वश में रही, उसे वे घर कैसे ले आए? अब हमें भी अपनी स्त्रियों की ऐसी बातें सहनी पड़ेंगी, क्योंकि राजा जैसा करता है, प्रजा वैसा ही करती है।"

राम ने दूसरों से पूछा। सबने सिर झुकाकर कहा, "यह सच कहता है।"

निर्णय

राम ने सबको विदा किया और भाइयों को बुलवाया। तीनों आए तो उन्होंने देखा कि राम का मुख ग्रहण लगे चन्द्रमा जैसा है और आँखों में आँसू हैं।

"तुम तीनों मेरा सर्वस्व हो, इसलिए तुमसे कहता हूँ। लक्ष्मण, तुम जानते हो कि लंका में सीता ने तुम्हारे सामने अग्नि में प्रवेश किया था, और अग्नि, वायु, सूर्य और चन्द्रमा ने उन्हें निष्पाप कहा था। मेरा अपना मन जानता है कि वे पवित्र हैं। फिर भी नगर में यह निन्दा फैली है।"

"जिसकी निन्दा लोक में फैल जाती है, वह जब तक वह बात कही जाती है, तब तक नीचे गिरता रहता है। राजा का जीवन उसका अपना नहीं होता। यदि प्रजा का विश्वास सिंहासन से उठ गया, तो धर्म किसके बल पर चलेगा? मैं लोक-निन्दा के भय से अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, तुम्हें भी छोड़ सकता हूँ, फिर सीता की तो बात ही क्या।"

"लक्ष्मण, कल सुबह सुमन्त्र से रथ जुतवाओ। सीता को गंगा के उस पार तमसा के किनारे वाल्मीकि मुनि के आश्रम के पास छोड़ आओ। उन्होंने स्वयं वहाँ जाने की इच्छा की थी। और सुनो: इस बारे में मुझसे कोई कुछ न कहे। जो बीच में बोलेगा, वह मेरा शत्रु होगा।"

तीनों भाई पत्थर की तरह खड़े रह गए। राम उठकर भीतर चले गए।

गंगा का तट

सुबह लक्ष्मण ने सूखे मुख से कहा, "देवी, महाराज की आज्ञा है कि मैं आपको गंगा-तट के आश्रमों में ले चलूँ।" सीता प्रसन्न हो उठीं। उन्होंने ऋषि-पत्नियों को देने के लिए वस्त्र और आभूषण साथ रख लिए।

रास्ते में सीता ने कहा, "लक्ष्मण, आज मेरी दाहिनी आँख फड़क रही है और मन घबरा रहा है। तुम्हारे भाई कुशल तो हैं?" लक्ष्मण ने मुँह फेरकर कहा, "सब कुशल हैं।"

गंगा के किनारे पहुँचकर लक्ष्मण फूट-फूटकर रो पड़े। सीता चकित रह गईं: "तुम तो दो दिन के लिए भाई से दूर हुए हो। मैं भी तो उन्हें प्राणों से अधिक चाहती हूँ, मैं तो नहीं रोती।"

नाव से उस पार उतरकर लक्ष्मण हाथ जोड़कर खड़े हो गए। "देवी, मेरे हृदय में एक काँटा गड़ा है। अच्छा होता कि इस काम से पहले मुझे मृत्यु आ जाती।" और उन्होंने सब कह दिया।

सीता मूर्छित होकर गिर पड़ीं। होश आया तो उन्होंने कहा, "लक्ष्मण, विधाता ने यह शरीर दुःख के लिए ही बनाया है। मैंने पूर्वजन्म में किसी को उसके पति से अलग किया होगा। मैं अभी गंगा में प्राण दे देती, पर मेरे भीतर मेरे पति का वंश पल रहा है। वह नष्ट नहीं होना चाहिए।"

फिर उन्होंने राम के लिए जो संदेश दिया, उसमें क्रोध का एक शब्द नहीं था: "मेरी सासों को प्रणाम कहना। और महाराज से कहना: आप जानते हैं कि सीता शुद्ध है और सदा आपकी भलाई चाहती रही है। आपने लोक-निन्दा के भय से मुझे त्यागा है। वह निन्दा आपसे दूर रहे, इसकी चिन्ता मुझे भी है। अपनी प्रजा के साथ वैसा ही व्यवहार कीजिएगा जैसा अपने भाइयों के साथ करते हैं। यही आपका धर्म है, और इसी से आपकी कीर्ति है। मुझे अपने शरीर की चिन्ता नहीं।"

लक्ष्मण ने उनकी परिक्रमा की। उन्होंने कहा, "मैंने कभी आपके चरणों से ऊपर आपका रूप नहीं देखा। अब राम के बिना इस वन में आपको कैसे देखूँ?" और वे रोते हुए नाव पर चढ़ गए। सीता तब तक खड़ी देखती रहीं जब तक रथ आँखों से ओझल नहीं हो गया। फिर वे भूमि पर बैठकर रो पड़ीं।

वाल्मीकि

पास खेलते मुनि-कुमारों ने दौड़कर वाल्मीकि को बताया: "गुरुदेव, नदी के किनारे कोई देवी रो रही हैं, लक्ष्मी जैसी।"

वाल्मीकि तप के बल से सब जान गए। वे स्वयं चलकर आए: "पुत्री, तुम दशरथ की पुत्रवधू, राम की पत्नी और जनक की बेटी हो। मैं जानता हूँ कि तुम निष्पाप हो। मेरा आश्रम पास ही है। इसे अपने पिता का घर समझो।" वे उन्हें आश्रम की तपस्विनियों के पास ले गए।

उधर अयोध्या में राम चार दिन तक राजसभा में नहीं आए। लक्ष्मण ने लौटकर देखा कि वे सूने कक्ष में सिर झुकाए बैठे हैं और आँसू बह रहे हैं। राम ने फिर कभी विवाह नहीं किया।

अंतिम अद्यतन:

आगे पढ़ें

पात्र

सीता: भूमिजा, जनकनन्दिनी

राजा जनक को हल की रेखा में मिलीं, श्रीराम की पत्नी सीता: जन्म, विवाह, वनवास, लंका में बन्दी जीवन, पुत्र, और वे लक्ष्मी-स्वरूपा क्यों पूजी जाती हैं।

पात्र

विभीषण: कुल से ऊपर धर्म

रावण के भाई विभीषण ने सीता को लौटाने की सलाह दी, निकाले गए, श्रीराम की शरण ली और लंका के धर्मनिष्ठ राजा बने।

पात्र

जटायु: रावण से लड़ने वाले गिद्धराज

दशरथ के मित्र, वृद्ध गिद्धराज जटायु ने सीता को बचाने के लिए रावण से युद्ध किया और श्रीराम की गोद में प्राण त्यागे। असम्भव के विरुद्ध साहस की कथा।

जीवन-शिक्षा

विपत्ति में साहस और धैर्य

वनवास, सीता का वियोग, युद्ध में मूर्छित भाई: श्रीराम ने अपने सबसे कठिन दिनों का सामना कैसे किया, और हम अपने दिनों का कैसे करें।

जीवन-शिक्षा

रामराज्य: सेवा के रूप में नेतृत्व

रामायण में रामराज्य का अर्थ, उसके पीछे के सिद्धान्त, और वे परिवार, दल, व्यवसाय या शासन का नेतृत्व करने वाले हर व्यक्ति पर कैसे लागू होते हैं।

जीवन-शिक्षा

सीता की गरिमा और दृढ़ता

सीता ने वन चुना, वर्ष भर अकेले रावण का सामना किया, अकेले दो पुत्रों को पाला और अपनी शर्त पर विदा हुईं। आन्तरिक शक्ति पर उनके जीवन की सीख।