बालकाण्ड: श्रीराम का जन्म और बाल्यकाल
रामायण की रचना कैसे हुई
वाल्मीकि नारद से पूछते हैं कि संसार में श्रेष्ठ पुरुष कौन है, क्रौंच पक्षी का वध देखते हैं और पहला श्लोक बोल उठते हैं। ब्रह्मा उन्हें रामकथा लिखने को कहते हैं।
तमसा नदी के किनारे महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था। एक दिन देवर्षि नारद वहाँ पधारे। वाल्मीकि के मन में बहुत दिनों से एक प्रश्न था। उन्होंने पूछा, "मुनिवर, इस समय संसार में ऐसा कौन है जो गुणवान भी हो और वीर भी, जो धर्म को जानता हो, किए हुए उपकार को न भूलता हो, सदा सच बोलता हो और अपने निश्चय पर अटल रहता हो? जिसने क्रोध को जीत लिया हो, जो किसी से ईर्ष्या न करता हो, और जिसके रुष्ट होने पर देवता भी डरते हों?"
नारद मुस्कुराए। बोले, "तुमने जितने गुण गिनाए, वे एक साथ मिलना कठिन हैं। फिर भी एक पुरुष ऐसा है। वह इक्ष्वाकु वंश में जन्मा है और लोग उसे राम कहते हैं।" फिर नारद ने थोड़े शब्दों में राम का पूरा जीवन सुना दिया: अयोध्या में जन्म, वनवास, सीता-हरण, रावण का वध और रामराज्य। यह कहकर वे चले गए।
क्रौंच पक्षी और पहला श्लोक
कुछ देर बाद वाल्मीकि अपने शिष्य भरद्वाज के साथ स्नान के लिए तमसा के तट पर गए। जल इतना निर्मल था कि उन्होंने कहा, "देखो भरद्वाज, यह जल सज्जन के मन जैसा स्वच्छ है।" पास ही एक वृक्ष पर क्रौंच पक्षियों का जोड़ा प्रेम से चहक रहा था। तभी एक बहेलिये का बाण आया और नर पक्षी लहूलुहान होकर भूमि पर गिर पड़ा। मादा उसके चारों ओर घूम-घूमकर विलाप करने लगी।
ऋषि का हृदय करुणा से भर गया, और उनके मुख से ये शब्द निकल पड़े:
मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥
अर्थात्, हे निषाद, तुझे कभी शान्ति न मिले, क्योंकि तूने प्रेम में डूबे इस जोड़े में से एक को मार डाला।
बोलने के बाद वाल्मीकि स्वयं चकित रह गए। यह तो साधारण वाणी नहीं थी। इसमें चार चरण थे, हर चरण में बराबर अक्षर, और इसे वीणा पर गाया जा सकता था। उन्होंने भरद्वाज से कहा, "शोक से निकला है, इसलिए इसका नाम श्लोक ही हो।"
ब्रह्मा का आदेश
आश्रम लौटकर भी वाल्मीकि उसी पक्षी के बारे में सोचते रहे। तभी सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा स्वयं वहाँ प्रकट हुए। उन्होंने कहा, "ऋषिवर, वह श्लोक मेरी ही इच्छा से तुम्हारे मुख से निकला है। अब इसी छन्द में राम का सम्पूर्ण चरित कहो। जो कुछ हुआ, प्रकट या गुप्त, वह सब तुम्हें दिखाई देगा, और तुम्हारे काव्य में एक भी बात असत्य नहीं होगी। जब तक पृथ्वी पर पर्वत और नदियाँ रहेंगी, तब तक रामायण की कथा लोगों में चलती रहेगी।"
वाल्मीकि ध्यान में बैठे। राम, सीता, लक्ष्मण, दशरथ, सबका हँसना, बोलना, चलना उन्हें ऐसे दिखा जैसे हथेली पर रखा आँवला। तब उन्होंने चौबीस हज़ार श्लोकों में, सात काण्डों में, रामायण की रचना की, और उसे सबसे पहले अपने आश्रम में पल रहे दो बालकों, लव और कुश, को सिखाया।
इस प्रकार संसार का पहला काव्य किसी राजा की प्रशंसा से नहीं, एक घायल पक्षी के लिए उठी करुणा से जन्मा। आगे की कथा उसी अयोध्या से आरम्भ होती है जहाँ राम का जन्म हुआ।
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