बालकाण्ड: श्रीराम का जन्म और बाल्यकाल
मिथिला की राह: गंगा की कथा और अहल्या उद्धार
मिथिला के मार्ग में विश्वामित्र गंगा के धरती पर आने की कथा सुनाते हैं, और गौतम के सूने आश्रम में राम अहल्या को शाप से मुक्त करते हैं।
विश्वामित्र के पीछे सौ बैलगाड़ियों में ऋषियों का दल चला। रास्ता लम्बा था, और हर पड़ाव पर राम कोई न कोई प्रश्न पूछते। विश्वामित्र उत्तर में पुरानी कथाएँ सुनाते। इसी तरह चलते-चलते वे गंगा के तट पर पहुँचे।
गंगा धरती पर कैसे आईं
राम ने पूछा, "मुनिवर, यह गंगा तीनों लोकों में कैसे बहती हैं?" तब विश्वामित्र ने राम के ही पूर्वजों की कथा सुनाई।
अयोध्या के राजा सगर के साठ हज़ार पुत्र थे। यज्ञ का घोड़ा खोजते हुए उन्होंने पृथ्वी खोद डाली और कपिल मुनि को चोर समझकर उन पर झपटे। मुनि की एक दृष्टि से वे सब भस्म हो गए। उनकी मुक्ति का एक ही उपाय था: स्वर्ग की नदी गंगा उनकी राख पर से बहे। सगर नहीं कर सके, उनके पौत्र अंशुमान नहीं कर सके, उनके पुत्र दिलीप भी नहीं कर सके।
तब भगीरथ ने राज्य मंत्रियों को सौंपा और वर्षों तप किया। ब्रह्मा प्रसन्न हुए, पर बोले, "गंगा के गिरने का वेग पृथ्वी नहीं सह पाएगी। उन्हें केवल शिव धारण कर सकते हैं।" भगीरथ ने शिव को प्रसन्न किया। शिव ने गंगा को अपनी जटाओं में ले लिया, और फिर एक धारा धरती पर छोड़ दी। गंगा भगीरथ के रथ के पीछे-पीछे चलीं, समुद्र तक गईं, और वहाँ सगर के पुत्रों को मुक्ति मिली।
विश्वामित्र बोले, "राम, इसीलिए गंगा को भागीरथी कहते हैं। और जब कोई कठिन काम बार-बार प्रयत्न करके पूरा करता है, तो लोग उसे भगीरथ प्रयत्न कहते हैं।" राम और लक्ष्मण रात भर इसी कथा के बारे में सोचते रहे। सुबह सबने गंगा पार की।
सूना आश्रम
मिथिला के पास एक पुराना आश्रम दिखा। सुन्दर था, पर एकदम सूना। न कोई ऋषि, न कोई शिष्य। राम ने पूछा, "यह किसका आश्रम है, और ऐसा उजाड़ क्यों है?"
विश्वामित्र ने बताया, "यह महर्षि गौतम का आश्रम है। वे अपनी पत्नी अहल्या के साथ यहाँ तप करते थे। एक दिन जब गौतम बाहर गए थे, इन्द्र उनका रूप धरकर यहाँ आया। लौटकर गौतम ने सब जान लिया। क्रोध में उन्होंने इन्द्र को शाप दिया, और अहल्या से कहा: तुम हज़ारों वर्ष यहीं रहोगी, केवल वायु पीकर, राख में पड़ी हुई, और किसी को दिखाई नहीं दोगी। जब दशरथ के पुत्र राम इस वन में आएँगे, तब तुम पवित्र होकर अपने रूप में लौटोगी। यह कहकर गौतम हिमालय चले गए।"
लोक में यह कथा इस रूप में अधिक प्रसिद्ध है कि अहल्या शिला बन गई थीं और राम के चरण के स्पर्श से फिर जीवित हुईं। रामचरितमानस भी यही कहती है।
उद्धार
"राम, भीतर चलो," विश्वामित्र ने कहा।
राम ने आश्रम में पाँव रखा। उसी क्षण शाप का अन्त हो गया। अहल्या दिखाई दीं, तप के तेज से ऐसी चमकती हुई जैसे धुएँ से घिरी अग्नि की लौ, या बादलों में से निकला चन्द्रमा। वाल्मीकि लिखते हैं कि राम और लक्ष्मण ने आगे बढ़कर उनके चरण छुए। अहल्या ने पति के वचन को याद किया और दोनों का अतिथि की तरह सत्कार किया। आकाश से फूल बरसे। उसी समय गौतम लौट आए और पति-पत्नी फिर साथ हो गए।
इस प्रसंग में राम कुछ कहते नहीं। वे केवल भीतर जाते हैं और झुककर प्रणाम करते हैं। जिसे सबने छोड़ दिया था, उसे उन्होंने आदर दिया, और आदर ने ही उसे लौटा दिया।
वहाँ से वे उत्तर-पूर्व की ओर चले और राजा जनक की यज्ञभूमि पर पहुँचे।
अंतिम अद्यतन:
आगे पढ़ें
भरत: जिन्होंने सिंहासन ठुकरा दिया
कैकेयी-पुत्र भरत को अयोध्या मिली और उन्होंने लौटा दी। चौदह वर्ष उन्होंने नन्दीग्राम से श्रीराम की पादुकाओं के नाम पर शासन किया।
विभीषण: कुल से ऊपर धर्म
रावण के भाई विभीषण ने सीता को लौटाने की सलाह दी, निकाले गए, श्रीराम की शरण ली और लंका के धर्मनिष्ठ राजा बने।
महर्षि वाल्मीकि: आदिकवि
रामायण के रचयिता और आदिकवि महर्षि वाल्मीकि: शोक से पहला श्लोक कैसे जन्मा, और कथा के भीतर उनकी अपनी भूमिका।
माता-पिता और गुरु का सम्मान
श्रीराम ने दशरथ, कौशल्या, कैकेयी, वसिष्ठ और विश्वामित्र का सम्मान कैसे किया, वनवास देने वाली माता को दोष क्यों नहीं दिया, और आज इसका क्या अर्थ है।
समता और करुणा: शबरी, केवट और जटायु
श्रीराम ने वनवासी स्त्री के बेर खाए, केवट को गले लगाया और एक पक्षी का पिता की तरह संस्कार किया। गरिमा और जन्म पर इन प्रसंगों की सीख।
विनम्रता और सेवा: हनुमान का मार्ग
हनुमान ने समुद्र लाँघा, लंका जलाई और पर्वत उठाया, और किसी का श्रेय नहीं लिया। बल, कर्म और अहंकार पर उनके उदाहरण की सीख।