श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

किष्किन्धाकाण्ड: सुग्रीव से मैत्री

वर्षा ऋतु और सुग्रीव का भूला हुआ वचन

सुग्रीव का राज्याभिषेक होता है और वर्षा आरम्भ हो जाती है। राम चार मास गुफा में प्रतीक्षा करते हैं। सुग्रीव वचन भूल जाते हैं, हनुमान याद दिलाते हैं और लक्ष्मण क्रोध में पहुँचते हैं।

सुग्रीव ने राम से कहा, "आप किष्किन्धा चलिए और अपने हाथों मेरा अभिषेक कीजिए।" राम ने मना कर दिया: "मित्र, पिता की आज्ञा है कि मैं चौदह वर्ष किसी गाँव या नगर में प्रवेश न करूँ। तुम जाओ। सुग्रीव राजा बनें और अंगद युवराज।" ऐसा ही हुआ।

फिर राम ने आकाश की ओर देखा। "यह श्रावण का महीना है। वर्षा के चार महीने सेना नहीं चल सकती, नदियाँ पार नहीं हो सकतीं। तुम बहुत दुःख झेल चुके हो, अब घर में सुख से रहो। कार्तिक आते ही रावण के वध की तैयारी करना।"

गुफा में चार महीने

राम और लक्ष्मण प्रस्रवण पर्वत की एक गुफा में रहने लगे। बादल घिर आए। राम उन्हें देखते और कहते, "लक्ष्मण, देखो, आकाश शोक से पीले पड़े रोगी जैसा लगता है। बादलों की गोद में बिजली ऐसे तड़पती है जैसे रावण की गोद में वैदेही। सुग्रीव अपनी पत्नी के साथ है और उसका राज्य लौट आया है। मेरी पत्नी छिन गई है, राज्य छिन गया है, और मैं नदी के कगार की तरह धीरे-धीरे ढह रहा हूँ।"

लक्ष्मण हर बार वही कहते: "भैया, शोक से कोई काम नहीं बनता। शरद की राह देखिए।"

शरद

बादल छँट गए। आकाश धुलकर नीला हो गया। नदियाँ सिमट गईं, रास्ते सूख गए, और हंस लौट आए। पर किष्किन्धा से कोई सन्देश नहीं आया।

सुग्रीव बरसों बाद सुख पाकर उसमें डूब गए थे। उन्होंने राज-काज मंत्रियों पर छोड़ दिया था और दिन-रात रनिवास में रहते थे। केवल हनुमान को समय का ध्यान था। उन्होंने एकान्त में सुग्रीव से कहा, "राजन्, आपको राज्य और यश मिल गया। अब मित्र का काम शेष है। जो मित्र का काम समय बीत जाने पर करता है, वह बड़ा काम करके भी कुछ नहीं करता। राम कहेंगे नहीं, वे आपकी राह देख रहे हैं। उनके कहने से पहले कर दीजिए।"

सुग्रीव चौंके। उन्होंने सेनापति नील को आज्ञा दी कि सब दिशाओं के वानरों को पन्द्रह दिन में बुलाओ। पर स्वयं फिर महल में चले गए।

लक्ष्मण का क्रोध

उधर राम का धैर्य टूट गया। "लक्ष्मण, चार महीने मुझे सौ वर्ष जैसे लगे। सुग्रीव काम निकल जाने पर मुझे भूल गया। जाओ, उससे कहो: जिस मार्ग से वालि गया है, वह बन्द नहीं हुआ है। वचन पर टिके रहो।"

लक्ष्मण धनुष लेकर चले तो क्रोध से उनकी साँस फुफकार रही थी। राम ने पीछे से कहा, "वह हमारा मित्र है। कठोर मत होना, पहले समझाना।"

किष्किन्धा के द्वार पर वानरों ने उन्हें देखा और डर के मारे इधर-उधर भागे। अंगद काँपते हुए समाचार लेकर भीतर गया। लक्ष्मण महल के भीतर तक पहुँच गए। वहाँ नूपुरों और गीतों का शब्द सुनकर वे लज्जा से रुक गए और धनुष की टंकार की। उस टंकार से सुग्रीव का नशा उतर गया।

सुग्रीव ने तारा से कहा, "तुम आगे जाओ। स्त्रियों के सामने महात्मा कठोर नहीं होते।" तारा ने बड़ी समझदारी से बात की: "राजकुमार, क्रोध का यह समय नहीं है। सुग्रीव ने बहुत दुःख देखा है, इसलिए सुख में उन्हें समय का पता नहीं चला। वे कृतघ्न नहीं हैं। उन्होंने सेना बुलाने की आज्ञा पहले ही दे दी है। करोड़ों वानर और भालू चल पड़े हैं।"

लक्ष्मण भीतर गए और सुग्रीव से खरी बात कही: "जो मित्र से काम निकालकर बदला नहीं चुकाता, वह सबसे अधम है।" सुग्रीव ने अपने गले की माला तोड़कर फेंक दी और हाथ जोड़े: "मैंने जो कुछ पाया, राम की कृपा से पाया। मुझसे भूल हुई। सेवक की भूल क्षमा की जाती है।" लक्ष्मण का क्रोध उतर गया: "आपके जैसा मित्र पाकर मेरे भाई सनाथ हुए। मैंने जो कठोर कहा, उसे भूल जाइए।"

सुग्रीव पालकी में बैठकर राम के पास गए। उनके पीछे धूल का ऐसा बादल उठा कि सूर्य ढक गया: हिमालय, विन्ध्य, मलय और समुद्र-तट के वानर और भालू आ रहे थे। सुग्रीव चरणों में झुके तो राम ने उन्हें उठाकर गले लगा लिया, और एक भी उलाहना नहीं दिया।

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