श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

किष्किन्धाकाण्ड: सुग्रीव से मैत्री

वालि और सुग्रीव की कथा, वालि-वध

सुग्रीव बताते हैं कि भाई वालि ने उन्हें कैसे निकाला। राम अपना बल सिद्ध करते हैं, वालि राम के बाण से गिरता है, प्रश्न करता है और पुत्र अंगद को सुग्रीव को सौंपता है।

सुग्रीव ने अपनी कथा सुनाई। "वालि मेरे बड़े भाई हैं और किष्किन्धा के राजा थे। मैं उनकी सेवा करता था। एक रात मायावी नाम का असुर नगर के द्वार पर आकर ललकारने लगा। वालि उसके पीछे दौड़े, और मैं उनके पीछे। असुर एक गुफा में घुस गया। वालि ने कहा, 'तुम द्वार पर रुको, मैं इसे मारकर आता हूँ।'"

"मैं एक वर्ष वहीं खड़ा रहा। फिर भीतर से गर्जना सुनाई दी, और गुफा के मुँह से रक्त की धारा बह निकली। भाई का स्वर नहीं आया। मैंने समझा कि वे मारे गए। असुर बाहर न आ जाए, इसलिए मैंने एक शिला से गुफा बन्द कर दी और रोता हुआ लौट आया। मंत्रियों ने मुझे सिंहासन पर बैठा दिया।"

"कुछ दिन बाद वालि लौट आए, जीवित। उन्होंने समझा कि मैंने राज्य के लोभ से उन्हें गुफा में बन्द किया था। मैंने मुकुट उनके चरणों में रख दिया, पर उन्होंने एक न सुनी। एक वस्त्र में मुझे निकाल दिया और मेरी पत्नी रूमा को छीन लिया। तब से मैं पृथ्वी भर भागता रहा हूँ।"

राम ने कहा, "जिसने भाई की पत्नी छीनी, वह आज ही मेरे बाण से मरेगा।"

बल की परीक्षा

सुग्रीव के मन में सन्देह था। वालि का बल असीम था: वह सूर्योदय से पहले चारों समुद्रों पर जाकर सन्ध्या कर आता था। सुग्रीव ने दुन्दुभि नाम के असुर का पहाड़ जैसा कंकाल दिखाया, जिसे वालि ने मारकर एक योजन दूर फेंका था। राम ने उसे पाँव के अँगूठे से उछाला, और वह दस योजन दूर जा गिरा। फिर सुग्रीव ने साल के सात वृक्ष दिखाए। राम ने एक बाण छोड़ा। वह सातों वृक्षों और पर्वत को भेदकर लौटा और तरकश में आ गया। सुग्रीव ने सिर भूमि पर रख दिया।

पहला और दूसरा युद्ध

सुग्रीव ने किष्किन्धा के द्वार पर जाकर ललकारा। दोनों भाई भिड़ गए। राम वृक्ष की ओट में धनुष लिए खड़े रहे, पर बाण नहीं छोड़ा: दोनों रूप, वेश और चाल में इतने एक जैसे थे कि पहचानना असम्भव था। सुग्रीव पिटकर भागे और दुखी होकर बोले, "आपने वचन देकर मुझे मरवा दिया होता।" राम ने कारण बताया, और लक्ष्मण ने सुग्रीव के गले में फूलों की एक माला डाल दी।

सुग्रीव ने फिर ललकारा। इस बार वालि की पत्नी तारा ने उसका हाथ पकड़ लिया: "जो अभी हारकर गया, वह तुरन्त लौट आया है। अवश्य उसे कोई सहारा मिला है। अंगद ने सुना है कि अयोध्या के राजकुमार राम उसके मित्र बने हैं। सुग्रीव तुम्हारा भाई है। उसे युवराज बना दो और वैर छोड़ दो।" वालि नहीं माना।

युद्ध भयानक हुआ। जब सुग्रीव का बल टूटने लगा और वे इधर-उधर देखने लगे, राम ने बाण छोड़ दिया। वह वालि की छाती में लगा, और वह इन्द्र के ध्वज की तरह गिर पड़ा।

वालि के प्रश्न

वालि ने राम को देखा और कठोर वचन कहे: "आप धर्मात्मा कहलाते हैं। मैं आपसे लड़ नहीं रहा था, किसी और से लड़ रहा था। आपने छिपकर मुझे क्यों मारा? मैंने आपका क्या बिगाड़ा था? सीता के लिए मुझसे कहते, मैं रावण को गले में रस्सी बाँधकर एक दिन में ले आता।"

राम ने शान्त भाव से उत्तर दिया: "वालि, यह सारी पृथ्वी इक्ष्वाकु वंश के अधीन है, और हम भरत की आज्ञा से धर्म की रक्षा करते हैं। छोटा भाई पुत्र के समान होता है। तुमने जीवित भाई की पत्नी को अपने घर में रख लिया। इस अपराध का दण्ड मृत्यु है, और दण्ड देना राजा का काम है। जिसे राजा दण्ड दे देता है, वह पाप से छूटकर स्वर्ग जाता है। मैंने सुग्रीव को वचन दिया था, और मैं वचन नहीं तोड़ता।"

वालि कुछ देर चुप रहा। फिर उसने हाथ जोड़ दिए: "आप ठीक कहते हैं। मुझे अपनी चिन्ता नहीं। मेरा एक ही पुत्र है, अंगद। वह अभी बालक है। उसे आप अपना समझिएगा।"

उसने सुग्रीव को पास बुलाया, अपने गले की वह स्वर्ण-माला उतारकर उन्हें दी जो इन्द्र ने दी थी, और कहा, "भाई, हमारे भाग्य में साथ-साथ सुख भोगना नहीं था। अंगद को अपने पुत्र की तरह रखना। और तारा की सलाह कभी मत टालना; वह जो कहती है, वही होता है।" फिर उसने अंगद से कहा, "बेटा, अब सुग्रीव की आज्ञा में रहना।" और उसकी आँखें मुँद गईं।

तारा पति के शरीर से लिपटकर रोईं। सुग्रीव भी रोए: "जिस राज्य के लिए भाई मारा गया, वह मुझे अब नहीं चाहिए।" राम की आँखें भी भीग गईं। उन्होंने सबको धीरज बँधाया, और वालि का संस्कार राजा के योग्य सम्मान से हुआ।

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