सुन्दरकाण्ड: हनुमान की लंका-यात्रा
"देखी सीता": हनुमान की वापसी
हनुमान लौटते हैं और वानर सुग्रीव के मधुवन में उत्सव मनाते हैं। वे राम को चूड़ामणि और सीता का संदेश देते हैं, और राम, जिनके पास देने को कुछ नहीं, उन्हें गले लगा लेते हैं।
समुद्र के इस पार वानर सुबह से उत्तर की ओर टकटकी लगाए खड़े थे। तभी दूर आकाश में बादल की गरज जैसा शब्द हुआ। जाम्बवान ने कहा, "सुनो! यह हनुमान की गर्जना है। जो काम बिगाड़कर लौटता है, वह ऐसे नहीं गरजता।"
हनुमान महेन्द्र पर्वत पर उतरे। वानर उन्हें घेरकर खड़े हो गए। कोई फल ले आया, कोई बैठने के लिए डालियाँ। हनुमान ने सबसे पहले बड़ों को प्रणाम किया, और फिर दो ही शब्द कहे:
"देखी सीता।"
वानर उछल पड़े। कोई पूँछ चूमने लगा, कोई वृक्ष पर चढ़ गया, कोई हनुमान को छूकर देखने लगा कि वे सचमुच लौट आए हैं। अंगद ने उन्हें गले लगा लिया: "बल में, धैर्य में, स्वामी-भक्ति में तुम्हारे जैसा कोई नहीं। तुमने हम सबके प्राण बचा लिए।"
हनुमान ने बैठकर पूरी कथा सुनाई: मैनाक, सुरसा, सिंहिका, लंका की रात, अशोक वाटिका, रावण की धमकी, सीता का संदेश, और जलती हुई नगरी। अन्त में उन्होंने कहा, "सीता का तप ही लंका को जला देता। मैं तो निमित्त भर था।"
अंगद जोश में बोला, "तो हम सब चलकर रावण को मार दें और सीता को ले आएँ!" जाम्बवान ने उसे रोका: "पुत्र, हमें खोजने की आज्ञा मिली थी, लाने की नहीं। राम स्वयं अपनी पत्नी को जीतकर लाएँगे। चलो, उन्हें समाचार दें।"
मधुवन
किष्किन्धा के मार्ग में मधुवन पड़ता था। वह सुग्रीव का प्रिय बाग़ था, और उसकी रखवाली उनके मामा दधिमुख करते थे। उसमें किसी को घुसने की आज्ञा नहीं थी।
वानरों ने अंगद से कहा, "युवराज, आज तो मधु पी लेने दीजिए।" अंगद ने हनुमान की ओर देखा और हँसकर कह दिया, "जाओ।" फिर क्या था। वानरों ने छत्ते तोड़े, मधु पिया, फल खाए, नाचे, गाए, एक-दूसरे पर गिरे। रखवालों ने रोका तो उन्हें भी घसीट दिया। दधिमुख बूढ़े थे; उन्हें भी दो-चार घूँसे पड़ गए।
दधिमुख रोते हुए सुग्रीव के पास पहुँचे: "महाराज, अंगद और उसके साथियों ने मधुवन उजाड़ दिया!"
सुग्रीव सुनकर प्रसन्न हो उठे। उनकी पूँछ ख़ुशी से हिलने लगी। लक्ष्मण ने पूछा, "इसमें प्रसन्न होने की क्या बात है?" सुग्रीव बोले, "जिनका समय निकल चुका है और जिन पर मृत्यु-दण्ड है, वे यदि मेरे बाग़ में उत्सव मना रहे हैं, तो इसका एक ही अर्थ है। हनुमान ने सीता को देख लिया है।"
राम के सामने
वानर आकाश-मार्ग से आए और प्रस्रवण पर्वत पर उतरे। हनुमान ने राम के चरणों में सिर रखा और कहा, "देवी जीवित हैं। वे नियम से रहती हैं, और उनका मन केवल आप में है।"
राम ने कहा, "हनुमान, सब कुछ बताओ। वे कहाँ हैं? कैसी हैं? उन्होंने मेरे लिए क्या कहा?"
हनुमान ने एक-एक बात कही: वह मैला वस्त्र, भूमि पर सोना, चारों ओर राक्षसियाँ, रावण की धमकी, और वह क्षण जब वे अपनी चोटी से प्राण देने को खड़ी हो गई थीं। उन्होंने कौवे की कथा सुनाई। फिर सीता का अन्तिम संदेश: "मैं एक महीना और जीवित रहूँगी।" और उन्होंने चूड़ामणि राम के हाथ में रख दिया।
राम ने उसे छाती से लगा लिया। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। "सुग्रीव, इस मणि को देखकर मेरा हृदय वैसे ही पिघलता है जैसे बछड़े को देखकर गाय का। यह मेरे ससुर ने विवाह के समय वैदेही को दिया था, और यह उसके सिर पर शोभा पाता था। आज लगता है जैसे मैंने उसे ही देख लिया। हनुमान, फिर कहो, उसने क्या कहा था। तुम्हारे शब्द मुझे ऐसे जिलाते हैं जैसे रोगी को औषधि।"
गले लगाना
फिर राम ने वह कहा जो हनुमान के लिए किसी भी पुरस्कार से बड़ा था:
"हनुमान ने वह किया है जो पृथ्वी पर कोई मन से भी नहीं कर सकता। समुद्र को कौन लाँघ सकता है? रावण की रक्षा की हुई लंका में कौन घुसकर जीवित लौट सकता है? सेवक तीन तरह के होते हैं। जो स्वामी का कठिन काम पूरा करके उसके साथ और भी भला कर आए, वह उत्तम है। हनुमान ने वही किया है। इसने मुझे, लक्ष्मण को और पूरे रघुवंश को बचा लिया।"
"पर मुझे एक बात का दुःख है। इतना प्रिय समाचार लाने वाले को देने के लिए आज मेरे पास कुछ नहीं है। जो मेरे पास है, वही देता हूँ।"
और राम ने हनुमान को छाती से लगा लिया।
रामचरितमानस में हनुमान इस पर इतना ही कहते हैं कि वानर का पुरुषार्थ तो बस एक डाल से दूसरी डाल पर कूदना है; समुद्र लाँघना, लंका जलाना, यह सब प्रभु का प्रताप था।
फिर राम समुद्र की ओर देखने लगे। "सीता का पता तो मिल गया। पर यह सेना सौ योजन का समुद्र कैसे पार करेगी?"
यहाँ सुन्दरकाण्ड पूरा होता है। आगे युद्धकाण्ड की कथा है।
अंतिम अद्यतन:
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