श्रीराम जन्मभूमिअयोध्या · रामायण · यात्रा मार्गदर्शिका

रामायण कथा

बालकाण्ड: श्रीराम का जन्म और बाल्यकाल

सीता स्वयंवर: शिव-धनुष भंग

राजा जनक बताते हैं कि सीता उन्हें हल की रेखा में कैसे मिलीं और शिव-धनुष की शर्त क्या है। राम धनुष उठाते हैं, प्रत्यंचा चढ़ाते हैं और धनुष टूट जाता है।

राजा जनक ने जैसे ही सुना कि विश्वामित्र आए हैं, वे पुरोहित शतानन्द को साथ लेकर स्वागत के लिए दौड़े आए। उनकी दृष्टि दो राजकुमारों पर पड़ी और वहीं ठहर गई। उन्होंने पूछा, "मुनिवर, ये दोनों कौन हैं? चाल सिंह जैसी है, आँखें कमल जैसी, कमर में तलवार और कन्धे पर धनुष। ऐसा लगता है जैसे देवता धरती पर उतर आए हों।"

विश्वामित्र ने कहा, "ये अयोध्या के महाराज दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं। इन्होंने मेरे यज्ञ की रक्षा की है। अब ये आपका वह प्रसिद्ध धनुष देखना चाहते हैं।"

पुष्प-वाटिका

रामचरितमानस यहाँ एक बहुत कोमल प्रसंग जोड़ती है, जो वाल्मीकि रामायण में नहीं है। अगली सुबह राम और लक्ष्मण गुरु की पूजा के लिए फूल लेने राजा के बाग में गए। उसी समय सीता सखियों के साथ गौरी-पूजन के लिए वहाँ आईं। दोनों ने एक-दूसरे को देखा, और देखते ही रह गए। सीता ने माता गौरी से मन ही मन प्रार्थना की। तुलसीदास कहते हैं कि देवी की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुस्कुरा उठी।

धनुष और सीता की कथा

सभा में जनक ने कहा, "यह धनुष भगवान शिव का है। देवताओं ने इसे मेरे पूर्वज देवरात के पास धरोहर रखा था। अब मेरी पुत्री की बात सुनिए। एक बार मैं यज्ञ के लिए भूमि जोत रहा था। हल की रेखा में से एक कन्या प्रकट हुई। हल की रेखा को सीता कहते हैं, इसलिए मैंने उसका नाम सीता रखा। वह मेरी गोद में पलकर बड़ी हुई।"

"मैंने प्रण किया कि अपनी यह पुत्री उसी को दूँगा जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दे। बड़े-बड़े राजा आए। चढ़ाना तो दूर, कोई इसे हिला भी न सका। अपमानित होकर उन्होंने मिथिला को एक वर्ष तक घेरे रखा। देवताओं की दी हुई सेना से मैंने उन्हें हराया।"

फिर राजा बोले, "मुनिवर, यदि राम इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा दें, तो मैं अपनी सीता इन्हें दे दूँगा।"

धनुष टूटा

धनुष लोहे की एक लम्बी पेटी में रखा था, जिसके नीचे आठ पहिए लगे थे। वाल्मीकि कहते हैं कि उसे खींचकर लाने में पाँच हज़ार बलवान पुरुष लगे।

विश्वामित्र ने कहा, "वत्स राम, धनुष को देखो।"

राम ने पेटी खोली। धनुष को देखा और बोले, "मैं इसे हाथ लगाता हूँ, और उठाने तथा चढ़ाने का प्रयत्न करूँगा।" जनक और विश्वामित्र ने कहा, "ऐसा ही करो।"

हज़ारों लोग देख रहे थे। राम ने धनुष को बीच से पकड़ा और ऐसे उठा लिया जैसे कोई खिलौना हो। प्रत्यंचा चढ़ाई। फिर कान तक खींची। और धनुष बीच से टूट गया।

ऐसा शब्द हुआ जैसे बिजली गिरी हो, जैसे पहाड़ फट गया हो। धरती काँप उठी। जनक, विश्वामित्र और दोनों भाइयों को छोड़कर सभा के सब लोग मूर्छित होकर गिर पड़े।

जब लोग सँभले, जनक ने हाथ जोड़कर कहा, "मुनिवर, मैंने राम का पराक्रम देख लिया। ऐसा मैंने कभी सोचा भी नहीं था। मेरी सीता राम को पति के रूप में पाकर जनक-कुल की कीर्ति बढ़ाएगी। मेरा प्रण सच्चा हुआ। आज्ञा हो तो मेरे दूत तेज़ रथों पर अयोध्या जाएँ और महाराज दशरथ को आदर के साथ यहाँ ले आएँ।"

विश्वामित्र ने कहा, "तथास्तु।" और दूत अयोध्या की ओर चल पड़े।

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