उत्तरकाण्ड: रामराज्य और उसके बाद
लव-कुश का जन्म और रामायण की शिक्षा
वाल्मीकि आश्रम में सीता के जुड़वाँ पुत्र जन्म लेते हैं। शत्रुघ्न लवणासुर को मारकर मथुरा बसाते हैं। बालक बड़े होते हैं और पूरी रामायण कण्ठस्थ करते हैं।
सीता वाल्मीकि के आश्रम में तपस्विनियों के बीच रहने लगीं। वे वल्कल पहनतीं, भूमि पर सोतीं और आश्रम के काम में हाथ बँटातीं। वे किसी से अपने दुःख की बात नहीं करती थीं।
शत्रुघ्न की यात्रा
उन्हीं दिनों यमुना-तट के ऋषि राम के पास आए: "महाराज, मधुवन में लवण नाम का असुर रहता है। उसके पास शिव का दिया एक शूल है। जब तक वह शूल उसके हाथ में है, उसे कोई नहीं मार सकता। वह प्रतिदिन ऋषियों और पशुओं को खा जाता है।"
राम ने भाइयों की ओर देखा। भरत उठने लगे, पर शत्रुघ्न ने हाथ जोड़ लिए: "भैया, भरत ने नन्दीग्राम में चौदह वर्ष भूमि पर सोकर बहुत कष्ट सहा है। लक्ष्मण ने वन में सहा है। यह काम मुझे दीजिए।" राम ने वहीं उनका अभिषेक कर दिया: "जाओ, उसे मारो और उस देश के राजा बनो।"
शत्रुघ्न सेना आगे भेजकर अकेले चले। मार्ग में वे वाल्मीकि के आश्रम में एक रात रुके। उसी रात, आधी रात को, आश्रम में हलचल हुई। मुनि-कुमार दौड़ते हुए आए: "गुरुदेव, राम की पत्नी ने दो पुत्रों को जन्म दिया है।"
नामकरण
वाल्मीकि प्रसन्न होकर गए। उन्होंने कुश की एक मुट्ठी ली, उसके ऊपर के भाग से पहले जन्मे बालक का मार्जन करवाया और नीचे के भाग से, जिसे लव कहते हैं, दूसरे का। "पहले का नाम कुश होगा, और दूसरे का लव।"
शत्रुघ्न ने अपनी पर्णकुटी में यह समाचार सुना। वे उसी समय सीता की कुटिया के द्वार तक गए और बाहर से ही बोले, "माता, बड़े सौभाग्य की बात है।" फिर वे रात भर जागते रहे; वह सावन की रात उन्हें क्षण भर जैसी लगी। सुबह वे पश्चिम की ओर चल दिए। उन्होंने यह बात अयोध्या में किसी से नहीं कही।
लवणासुर
शत्रुघ्न ने ऋषि च्यवन से लवण का भेद जाना: वह सुबह शिकार को निकलता है तो शूल घर में छोड़ जाता है। अगली सुबह वे धनुष लेकर उसके नगर के द्वार पर खड़े हो गए। लवण हज़ारों मरे हुए पशुओं का बोझ लिए लौटा। शत्रुघ्न ने उसे भीतर जाने नहीं दिया। दोनों में घोर युद्ध हुआ। लवण के फेंके वृक्ष से शत्रुघ्न एक बार मूर्छित भी हो गए। फिर उन्होंने वह दिव्य बाण छोड़ा जो राम ने दिया था, और लवण का अन्त हो गया।
वहीं यमुना के किनारे शत्रुघ्न ने एक नगरी बसाई। बारह वर्ष में वह धन-धान्य से भर गई। उसका नाम मधुरा था, जिसे आज मथुरा कहते हैं।
बारह वर्ष बाद शत्रुघ्न राम के दर्शन के लिए अयोध्या चले, और फिर वाल्मीकि के आश्रम में रुके। रात को उन्होंने वीणा के साथ एक गान सुना। उसमें वही सब था जो उन्होंने अपनी आँखों से देखा था: राम का वनवास, भरत का नन्दीग्राम, लंका का युद्ध। उनकी आँखों से आँसू बहते रहे। सैनिकों ने पूछना चाहा कि यह कौन गा रहा है। शत्रुघ्न ने कहा, "मुनियों के आश्रम में ऐसे आश्चर्य होते रहते हैं। उनसे पूछना उचित नहीं।"
दो शिष्य
वे गाने वाले लव और कुश थे।
वाल्मीकि ने उन्हें वैसे ही पाला जैसे कोई अपने पौत्रों को पालता है। उन्होंने उन्हें वेद पढ़ाए और धनुष चलाना सिखाया। और जब उन्होंने देखा कि दोनों की स्मृति तीव्र है और स्वर मधुर, तो उन्हें अपना पूरा काव्य सिखाया: चौबीस हज़ार श्लोक, पाँच सौ सर्ग, सात काण्ड। उन्होंने उसे पढ़ने के लिए नहीं, गाने के लिए रचा था, वीणा के साथ, तीनों सप्तकों में।
दोनों बालक रूप में राम जैसे थे, जैसे एक ही बिम्ब के दो प्रतिबिम्ब। वे ऋषियों की सभा में खड़े होकर वह काव्य गाते, तो सुनने वालों की आँखें भर आतीं। कोई उन्हें अपना कमण्डलु दे देता, कोई वल्कल, कोई मृगचर्म। ऋषि कहते, "आश्चर्य है। जो बहुत पहले हुआ, वह इनके गाने से आँखों के सामने होता हुआ लगता है।"
सीता यह सब देखतीं। उन्होंने पुत्रों को कभी नहीं बताया कि जिस राजा की कथा वे गाते हैं, वह कौन है।
जो बालक बिना महल और बिना राज्य के, पिता से दूर, वन में पले, उन्हें किसी आवश्यक वस्तु की कमी नहीं रही। उनके पास एक अडिग माँ थी और एक महान गुरु।
अंतिम अद्यतन:
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शत्रुघ्न: मौन सेवक भ्राता
दशरथ के सबसे छोटे पुत्र शत्रुघ्न ने भरत की सेवा की, वनवास काल में अयोध्या सँभाली, लवणासुर का वध किया और मथुरा नगरी बसाई।
विभीषण: कुल से ऊपर धर्म
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जटायु: रावण से लड़ने वाले गिद्धराज
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