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रामायण कथा

उत्तरकाण्ड: रामराज्य और उसके बाद

रामराज्य: मित्रों की विदाई और हनुमान का वर

ऋषि नए राजा से मिलने आते हैं, मित्र अपने-अपने घर लौटते हैं, और हनुमान एक ही वर माँगते हैं: जब तक रामकथा कही जाए, तब तक पृथ्वी पर रहूँ।

राज्याभिषेक के कुछ दिन बाद चारों दिशाओं से ऋषि राम को आशीर्वाद देने आए। उनमें अगस्त्य भी थे। राम ने उन्हें सोने के आसनों पर बैठाया।

ऋषियों ने कहा, "राम, तुमने रावण को मारा, यह बड़ी बात है। पर उससे भी बड़ी बात यह है कि लक्ष्मण ने मेघनाद को मारा। उसे देवता भी नहीं मार सकते थे।"

राम को आश्चर्य हुआ: "कुम्भकर्ण और रावण को छोड़कर आप मेघनाद की प्रशंसा क्यों करते हैं?" तब अगस्त्य ने राक्षस कुल का पूरा इतिहास सुनाया: पुलस्त्य ऋषि, उनके पुत्र विश्रवा, विश्रवा के पुत्र कुबेर और रावण। कैसे रावण ने तप करके वर पाया, कुबेर से लंका और पुष्पक छीना, कैलास को उठाने चला तो शिव ने अँगूठे से उसे दबा दिया और उसकी चीख़ से उसका नाम 'रावण' पड़ा। कैसे उसने देवताओं को जीता, और कैसे उसे एक के बाद एक शाप मिलते गए।

हनुमान का बचपन

फिर राम ने पूछा, "मुनिवर, एक बात मेरे मन में है। वालि और रावण बलवान थे, पर मुझे लगता है कि बल में हनुमान की बराबरी उनमें से कोई नहीं कर सकता। समुद्र लाँघना, लंका जलाना, पर्वत उठा लाना, यह काम न काल कर सकता है, न इन्द्र। फिर जब वालि ने सुग्रीव को निकाला, तब हनुमान ने वालि को भस्म क्यों नहीं कर दिया? क्या इन्हें अपने बल का पता नहीं था?"

अगस्त्य मुस्कुराए: "सचमुच पता नहीं था।" और उन्होंने वह कथा सुनाई। बालक हनुमान ने उगते सूर्य को फल समझकर छलाँग लगाई थी, इन्द्र का वज्र खाया था, और फिर देवताओं से वर पाए थे। उन वरों के बल पर वह नटखट बालक ऋषियों के आश्रमों में ऊधम मचाने लगा। कभी किसी का कमण्डलु तोड़ देता, कभी वल्कल फाड़ देता। ऋषियों ने क्रोध नहीं किया; उन्होंने बस इतना शाप दिया: "तुम अपना बल भूल जाओगे। जब कोई तुम्हें याद दिलाएगा, तभी वह लौटेगा।" इसीलिए समुद्र-तट पर जाम्बवान को याद दिलाना पड़ा था।

विदाई

दिन बीतते गए। एक दिन राम ने मित्रों से कहा, "अब अपने-अपने राज्य को लौटिए। प्रजा राजा के बिना अधिक दिन नहीं रहनी चाहिए।"

उन्होंने सुग्रीव को गले लगाया: "अंगद को पुत्र की तरह रखना।" विभीषण से कहा, "लंका पर धर्म से राज्य करना।" हर वानर को उन्होंने उसका नाम लेकर बुलाया और वस्त्र, आभूषण देकर विदा किया। वानर ऐसे रोए जैसे शरीर से प्राण अलग हो रहे हों।

हनुमान का वर

अन्त में हनुमान सामने आए और हाथ जोड़कर खड़े हो गए। "प्रभु, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस एक वर दीजिए। मेरा प्रेम सदा आप में बना रहे, और मेरी भक्ति कभी न डिगे। जब तक इस पृथ्वी पर आपकी कथा कही जाती रहे, तब तक मेरे शरीर में प्राण रहें। आपकी कथा सुन-सुनकर मैं आपके वियोग को सह लूँगा।"

राम सिंहासन से उठे और उन्हें गले लगा लिया। "ऐसा ही होगा। जब तक संसार में मेरी कथा रहेगी, तब तक तुम्हारी कीर्ति रहेगी और तुम्हारे शरीर में प्राण रहेंगे। और हनुमान, तुमने मुझ पर जो उपकार किए हैं, उनमें से एक-एक के लिए मैं प्राण दे दूँ, तो भी शेष के लिए मैं तुम्हारा ऋणी रहूँगा। मैं चाहता हूँ कि वे उपकार मेरे भीतर ही पुराने हो जाएँ। तुम्हें उनका बदला चुकाने का अवसर कभी न आए, क्योंकि बदला वही चुकाता है जिस पर संकट आया हो।"

राम ने अपने गले से चन्द्रमा जैसी उज्ज्वल माला उतारकर हनुमान को पहना दी।

इसीलिए कहा जाता है कि जहाँ भी राम की कथा होती है, वहाँ हनुमान हाथ जोड़े, आँखों में आँसू भरे बैठे रहते हैं।

राज्य

फिर राम अपने काम में लग गए। वे प्रतिदिन सुबह सभा में बैठते और प्रजा के काम देखते। भरत ने एक दिन कहा, "भैया, आपके राज्य में मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी सुखी हैं। बूढ़े भी नहीं मरते, स्त्रियाँ बिना कष्ट के सन्तान को जन्म देती हैं, और बादल समय पर अमृत जैसा जल बरसाते हैं।" राम यह सुनकर प्रसन्न हुए, पर उन्होंने कहा, "भरत, राजा को यह प्रतिदिन पूछना चाहिए कि नगर में और गाँवों में लोग उसके बारे में क्या कहते हैं।"

इसी प्रश्न से आगे की कथा निकलती है।

अंतिम अद्यतन:

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