युद्धकाण्ड (लंकाकाण्ड): लंका का युद्ध
मेघनाद और संजीवनी पर्वत
मेघनाद के अस्त्र से पूरी सेना गिर पड़ती है और हनुमान हिमालय से औषधियों का पर्वत ले आते हैं। लक्ष्मण मेघनाद का वध करते हैं, रावण की शक्ति से मूर्छित होते हैं और फिर जी उठते हैं।
कुम्भकर्ण के बाद रावण के पुत्र देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा और अतिकाय भी मारे गए। रावण सिंहासन पर सिर पकड़कर बैठ गया। तब मेघनाद ने कहा, "पिताजी, जब तक इन्द्रजित जीवित है, आप शोक क्यों करते हैं? आज मैं दोनों भाइयों को समाप्त कर दूँगा।"
ब्रह्मास्त्र
उसने रणभूमि में अग्नि जलाकर हवन किया, फिर रथ सहित अदृश्य हो गया और ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। आकाश से बाणों की ऐसी वर्षा हुई कि कुछ दिखता ही नहीं था। सुग्रीव गिरे, अंगद गिरे, नील गिरे। सरसठ करोड़ वानर दिन के पाँचवें भाग में भूमि पर पड़े थे। राम ने लक्ष्मण से कहा, "यह ब्रह्मा का अस्त्र है। इसका अपमान नहीं करना चाहिए। इसे सह लो।" और दोनों भाई भी मूर्छित होकर गिर पड़े।
रात हो गई। रणभूमि में सन्नाटा था। केवल दो जन खड़े थे: विभीषण और हनुमान। वे मशाल लेकर घायलों के बीच घूमने लगे। एक जगह वृद्ध जाम्बवान पड़े थे, बाणों से बिंधे हुए, आँखें खुल नहीं रही थीं।
विभीषण ने पूछा, "आर्य, आप जीवित हैं?"
जाम्बवान ने धीमे स्वर में कहा, "मैं तुम्हें स्वर से पहचानता हूँ। यह बताओ, हनुमान जीवित हैं?"
विभीषण चकित हुए: "आपने राम और लक्ष्मण के बारे में नहीं पूछा। हनुमान के बारे में क्यों?"
"क्योंकि यदि हनुमान जीवित हैं, तो हम सब मरकर भी जीवित हैं। और यदि वे नहीं रहे, तो हम जीते हुए भी मरे हुए हैं।"
हनुमान ने झुककर उनके चरण छुए: "मैं यहाँ हूँ।" जाम्बवान बोले, "पुत्र, समुद्र के ऊपर से हिमालय जाओ। वहाँ ऋषभ और कैलास शिखरों के बीच एक पर्वत है जिस पर औषधियाँ रात में दीपक की तरह चमकती हैं। चार बूटियाँ लाओ: मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी, सुवर्णकरणी और सन्धानी।"
पर्वत
हनुमान त्रिकूट पर चढ़े, पर्वत को पाँव से दबाया और उत्तर की ओर उड़ गए। वे समुद्र, नदियाँ, नगर और वन पार करते हुए हिमालय पहुँचे। उन्होंने वह चमकता हुआ पर्वत देखा।
पर औषधियों ने जान लिया कि कोई उन्हें लेने आया है, और वे छिप गईं। हनुमान ने पर्वत भर में खोजा। कौन-सी बूटी कौन-सी है, यह पहचानना सम्भव नहीं था, और समय निकला जा रहा था। उन्होंने गरजकर पर्वत से कहा, "यदि तुझे राम पर भी दया नहीं आती, तो मैं तुझे ही उखाड़ ले चलता हूँ।"
उन्होंने शिखर को वृक्षों, हाथियों और सोने की खानों समेत उखाड़ लिया, हथेली पर रखा और उड़ चले। भोर से पहले वे लंका में थे। औषधियों की गन्ध हवा में फैली, और जो जहाँ पड़ा था, वहीं उठ बैठा, जैसे नींद से जागा हो। राम और लक्ष्मण उठे। जाम्बवान उठे। हनुमान पर्वत को वापस हिमालय में रख आए।
मायावी सीता
मेघनाद ने देखा कि बल से काम नहीं बनता। अगले दिन वह रथ पर एक मायावी सीता को बैठाकर लाया, और हनुमान के सामने उसके केश पकड़कर तलवार से उसे काट डाला। "जिसके लिए तुम लड़ रहे हो, वह अब नहीं रही।"
हनुमान ने रोते हुए राम को बताया। राम कटे वृक्ष की तरह गिर पड़े। तब विभीषण ने कहा, "राम, यह माया है। रावण सीता को कभी नहीं मरवा सकता। मेघनाद ने यह इसलिए किया है कि हम शोक में पड़े रहें और वह निकुम्भिला के स्थान पर अपना यज्ञ पूरा कर ले। यदि वह यज्ञ पूरा हो गया, तो उसे कोई नहीं मार सकेगा। लक्ष्मण को अभी मेरे साथ भेजिए।"
लक्ष्मण और मेघनाद
लक्ष्मण ने भाई के चरण छुए और विभीषण के साथ चल पड़े। वानरों ने यज्ञ की रक्षा करती सेना पर आक्रमण किया। मेघनाद को हवन अधूरा छोड़कर उठना पड़ा। उसने चाचा को देखा और कड़वे शब्द कहे: "आप यहीं जन्मे और बड़े हुए, और अपने ही कुल का भेद शत्रु को देते हैं? पराया गुणवान हो तो भी पराया ही होता है।" विभीषण ने उत्तर दिया, "मैं राक्षस कुल में जन्मा, पर मेरा स्वभाव वैसा नहीं। मैंने अधर्म को छोड़ा है, कुल को नहीं।"
लक्ष्मण और मेघनाद का युद्ध तीन दिन और तीन रात चला। दोनों के शरीर बाणों से भर गए। कोई थका नहीं, कोई पीछे नहीं हटा। अन्त में लक्ष्मण ने इन्द्र का अस्त्र धनुष पर चढ़ाया और उसे छोड़ने से पहले यह कहा:
धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि।
पौरुषे चाप्रतिद्वन्द्वः शरैनं जहि रावणिम्॥
"यदि दशरथ के पुत्र राम धर्मात्मा हैं, सत्य पर अटल हैं, और पराक्रम में उनका कोई जोड़ नहीं है, तो हे बाण, तू रावण के इस पुत्र को मार।"
बाण छूटा, और मेघनाद का सिर धरती पर आ गिरा। लक्ष्मण ने अपने बल की शपथ नहीं ली थी। उन्होंने भाई के धर्म की शपथ ली थी।
शक्ति और एक भाई का विलाप
पुत्र की मृत्यु से रावण पागल-सा हो गया। अगले दिन उसने लक्ष्मण पर वह शक्ति चलाई जो मय दानव ने बनाई थी। वह लक्ष्मण की छाती में धँस गई, और वे पहाड़ की तरह गिर पड़े।
राम ने भाई को गोद में लिया, और जो कहा वह आज भी हर भाई को याद है:
देशे देशे कलत्राणि देशे देशे च बान्धवाः।
तं तु देशं न पश्यामि यत्र भ्राता सहोदरः॥
"पत्नी हर देश में मिल सकती है, मित्र और सम्बन्धी भी हर देश में मिल सकते हैं। पर मैं ऐसा कोई देश नहीं देखता जहाँ सगा भाई फिर मिल जाए।"
वैद्य सुषेण ने लक्ष्मण का मुख देखा: "इनमें प्राण हैं। हनुमान, उसी पर्वत से विशल्यकरणी ले आओ।" हनुमान फिर गए, फिर बूटी नहीं पहचान पाए, और फिर पूरा शिखर उठा लाए। सुषेण ने बूटी पीसकर सुँघाई। लक्ष्मण उठ बैठे। राम ने उन्हें छाती से लगा लिया और आँसू नहीं रोक सके।
लोक में यह प्रसंग इस रूप में अधिक प्रसिद्ध है कि लक्ष्मण को मेघनाद की शक्ति लगी थी और हनुमान एक ही बार पर्वत लाए। वाल्मीकि रामायण में पर्वत दो बार आता है। दोनों में बात एक ही है: जब सब उपाय थक गए, तब हनुमान थे।
अंतिम अद्यतन:
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