सुन्दरकाण्ड: हनुमान की लंका-यात्रा
हनुमान-सीता भेंट: मुद्रिका और चूड़ामणि
हनुमान वृक्ष से धीमे स्वर में रामकथा गाते हैं, सीता का विश्वास पाते हैं और मुद्रिका देते हैं। सीता पीठ पर बैठकर जाना अस्वीकार करती हैं और राम के लिए चूड़ामणि भेजती हैं।
हनुमान के सामने एक कठिन प्रश्न था: सीता से बात कैसे करें? "यदि मैं एकाएक सामने जाऊँ, तो ये मुझे रावण की माया समझेंगी और चीख़ पड़ेंगी। राक्षसियाँ जाग जाएँगी। यदि मैं पण्डितों की तरह संस्कृत बोलूँ, तो ये और डरेंगी। मुझे मनुष्यों की सीधी बोली में, धीरे से, वह बात कहनी चाहिए जो इन्हें सबसे प्रिय है।"
वे डाल पर बैठे-बैठे मधुर स्वर में गाने लगे, इतने धीमे कि केवल सीता सुन सकें:
"इक्ष्वाकु वंश में दशरथ नाम के एक राजा थे, धर्मात्मा और यशस्वी। उनके ज्येष्ठ पुत्र राम हैं, जो धनुषधारियों में श्रेष्ठ हैं। पिता के वचन के लिए वे पत्नी और भाई के साथ वन गए। वहाँ रावण ने छल से उनकी पत्नी को हर लिया। उन्हें खोजते हुए राम ने सुग्रीव से मित्रता की। सुग्रीव ने वानरों को चारों दिशाओं में भेजा। उन्हीं में से एक, मैं, सौ योजन समुद्र लाँघकर यहाँ आया हूँ। और मुझे लगता है कि जिन्हें मैं खोज रहा था, वे मुझे मिल गई हैं।"
विश्वास
सीता ने चौंककर ऊपर देखा। पत्तों में एक छोटा-सा वानर बैठा था, बिजली जैसा पीला, आँखें तपे सोने जैसी। वे घबरा गईं: "यह स्वप्न है क्या? पर मुझे तो नींद ही नहीं आती। स्वप्न में वानर देखना अशुभ होता है। फिर भी, जो इसने कहा है, वह सच हो।"
हनुमान नीचे उतरे, सिर झुकाकर हाथ जोड़े और थोड़ी दूर खड़े रहे। "देवी, आप कौन हैं जो इस वृक्ष के नीचे रो रही हैं? यदि आप वही सीता हैं जिन्हें रावण जनस्थान से हर लाया, तो बताइए।"
सीता ने अपना परिचय दिया। हनुमान थोड़ा पास आए। सीता फिर डर गईं: "तू रावण है। तू वेश बदलकर मुझे छलने आया है।" फिर बोलीं, "पर तुझे देखकर मेरा मन प्रसन्न क्यों हो रहा है? यदि तू सचमुच राम का दूत है, तो मुझे उनके बारे में बता। वे कैसे दिखते हैं?"
हनुमान ने राम और लक्ष्मण का पूरा वर्णन किया: कमल जैसी आँखें, चौड़े कन्धे, लम्बी भुजाएँ, दुन्दुभि जैसा गम्भीर स्वर। फिर ऋष्यमूक की मित्रता, गिराए हुए आभूषण, और उन्हें देखकर राम के आँसू। जैसे-जैसे वे बोलते गए, सीता की आँखों से आनन्द के आँसू बहते गए।
मुद्रिका
"माता, यह देखिए।" हनुमान ने राम के नाम से अंकित अँगूठी उनके हाथ में रख दी।
सीता ने उसे ऐसे लिया जैसे राम को ही पा लिया हो। उनका मुख राहु से छूटे चन्द्रमा जैसा खिल उठा। "वानर, तुम वीर हो, बुद्धिमान हो। तुमने अकेले इस नगरी में आकर यह कर दिखाया। अब बताओ, क्या मेरे स्वामी मुझे याद करते हैं? वे मेरे लिए कुछ कर क्यों नहीं रहे?"
"माता, वे जानते ही नहीं थे कि आप कहाँ हैं। आपके बिना वे न मधु खाते हैं, न मांस। कोई फूल या फल देखते हैं तो 'हा प्रिये' कहकर आपको पुकारते हैं। रात को नींद नहीं आती, और आ जाए तो 'सीते' कहते हुए जाग जाते हैं। अब मैं लौटकर समाचार दूँगा, और वे वानरों की सेना लेकर आ जाएँगे।"
पीठ पर बैठ चलिए
फिर हनुमान के मन में आया: "माता, इतनी प्रतीक्षा क्यों? मेरी पीठ पर बैठ जाइए। मैं आज ही आपको राम के पास पहुँचा दूँगा। पूरी लंका भी मेरा पीछा नहीं कर पाएगी।"
सीता हँस पड़ीं: "इतने छोटे शरीर से तुम मुझे कैसे ले जाओगे?" हनुमान को यह बात चुभ गई। वे बढ़ने लगे, और बढ़ते-बढ़ते पर्वत जैसे हो गए।
सीता ने कहा, "मैं तुम्हारा बल जान गई। फिर भी मैं नहीं चलूँगी। समुद्र के ऊपर तुम्हारे वेग से मैं गिर सकती हूँ। राक्षस पीछा करेंगे तो तुम मेरी रक्षा करोगे या लड़ोगे? और सबसे बड़ी बात: यदि तुम मुझे ले जाओगे, तो राम का यश घटेगा। उचित यही है कि वे स्वयं आएँ, रावण को मारें और मुझे ले जाएँ। यही उनके योग्य है।" हनुमान ने सिर झुका लिया: "आपने वही कहा जो राम की पत्नी को कहना चाहिए।"
पहचान
"माता, कोई ऐसी निशानी दीजिए जिसे केवल राम जानते हों।"
सीता ने चित्रकूट की एक बात सुनाई। "एक दिन मैं राम की गोद में सिर रखकर सोई थी। एक कौवे ने चोंच से मुझे घायल कर दिया। राम ने एक तिनका उठाया और उसे ब्रह्मास्त्र बनाकर उस पर छोड़ दिया। वह इन्द्र का पुत्र था। तीनों लोकों में भागा, किसी ने शरण नहीं दी, और लौटकर राम के चरणों में गिर पड़ा। राम ने उसे क्षमा कर दिया। उनसे पूछना: एक कौवे के लिए आपने ब्रह्मास्त्र उठाया था, तो जिसने मुझे हर लिया, उसे क्यों छोड़ रखा है?"
फिर उन्होंने आँचल की गाँठ खोली और अपना चूड़ामणि निकाला, जो उनके पिता ने विवाह में दिया था। "यह उन्हें देना। इसे देखकर उन्हें मेरी, मेरी माता की और महाराज दशरथ की, तीनों की याद आएगी। और कहना: मैं एक महीना और जीवित रहूँगी। उसके बाद नहीं।"
हनुमान ने चूड़ामणि को अपनी उँगली में पहन लिया, सीता की परिक्रमा की और प्रणाम किया। सीता की आँखें फिर भर आईं: "हो सके तो एक दिन कहीं छिपकर रुक जाओ। तुम्हें देखकर मेरा दुःख थोड़ी देर को हलका हुआ है।"
हनुमान ने कहा, "माता, धैर्य रखिए। आप शीघ्र ही राम को लंका के द्वार पर देखेंगी।"
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