सुन्दरकाण्ड: हनुमान की लंका-यात्रा
हनुमान का समुद्र-लंघन
हनुमान महेन्द्र पर्वत से छलाँग लगाते हैं। वे मैनाक का विश्राम नहीं लेते, सुरसा को बुद्धि से जीतते हैं, सिंहिका का अन्त करते हैं और संध्या को लंका के तट पर पहुँचते हैं।
महेन्द्र पर्वत की चोटी पर हनुमान खड़े हुए। उन्होंने सूर्य, इन्द्र, पवन और ब्रह्मा को प्रणाम किया, फिर पूर्व की ओर मुँह करके अपने पिता वायुदेव को। उन्होंने वानरों से कहा, "जैसे राम का छोड़ा हुआ बाण जाता है, वैसे ही मैं लंका जाऊँगा। यदि सीता वहाँ न मिलीं तो स्वर्ग तक खोजूँगा, और वहाँ भी न मिलीं तो रावण को बाँधकर ले आऊँगा।"
फिर उन्होंने शरीर को सिकोड़ा, भुजाएँ पर्वत पर टिकाईं और छलाँग लगा दी। उस झटके से पर्वत काँप उठा, चट्टानों से जल के सोते फूट निकले, और जो वृक्ष उनके वेग में उखड़े, वे कुछ दूर तक उनके पीछे ऐसे उड़ते गए जैसे लोग विदा होते किसी प्रियजन के पीछे चलते हैं। नीचे समुद्र पर उनकी छाया दस योजन चौड़ी और तीस योजन लम्बी पड़ रही थी।
मैनाक
समुद्र ने सोचा, "मुझे इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर के पुत्रों ने बढ़ाया था। ये हनुमान उसी वंश के राम का काम करने जा रहे हैं। मुझे इनकी सेवा करनी चाहिए।" उसने अपने भीतर छिपे सोने के शिखरों वाले मैनाक पर्वत से कहा, "ऊपर उठो और इन्हें विश्राम दो।"
मैनाक जल को चीरकर ऊपर उठा। हनुमान ने उसे बाधा समझा और छाती के धक्के से गिरा दिया। तब मैनाक ने मनुष्य का रूप धरकर कहा, "वानरश्रेष्ठ, मैं बाधा नहीं हूँ। आपके पिता पवनदेव ने एक बार मेरी रक्षा की थी। मेरे शिखर पर थोड़ा रुकिए, फल खाइए, फिर जाइए।"
हनुमान ने हाथ से उसे छू भर दिया और बोले, "आपने कहा, इसी से मेरा सत्कार हो गया। पर मैंने प्रतिज्ञा की है कि बीच में नहीं रुकूँगा, और दिन ढल रहा है।" तुलसीदास इसी को यूँ कहते हैं:
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
सुरसा
देवताओं ने हनुमान की बुद्धि परखनी चाही। उन्होंने नागों की माता सुरसा को भेजा। वह भयानक राक्षसी का रूप धरकर मार्ग में खड़ी हो गई: "ब्रह्मा ने मुझे वर दिया है कि मेरे सामने से कोई मेरे मुख में गए बिना नहीं निकल सकता। आओ, मेरे मुख में प्रवेश करो।"
हनुमान ने कहा, "माता, मैं राम के काम से जा रहा हूँ। सीता का समाचार देकर लौट आऊँ, तब तुम्हारे मुख में आ जाऊँगा। यह मेरा सत्य वचन है।" सुरसा नहीं मानी। हनुमान बोले, "तो उतना बड़ा मुँह खोलो जिसमें मैं समा सकूँ," और दस योजन के हो गए। सुरसा ने बीस योजन मुँह फैलाया। हनुमान तीस के हुए, उसने चालीस किया। हनुमान पचास, वह साठ। ऐसे बढ़ते-बढ़ते जब उसका मुँह सौ योजन का हो गया, हनुमान अचानक अँगूठे जितने छोटे हो गए, उसके मुख में गए और तुरन्त बाहर निकल आए।
"माता, मैं तुम्हारे मुख में हो आया। तुम्हारा वर भी सच्चा रहा। अब आज्ञा दो।" सुरसा अपने असली रूप में आकर हँसी: "जाओ पुत्र, तुममें बल भी है और बुद्धि भी। तुम्हारा काम सिद्ध होगा।"
सिंहिका
आगे हनुमान को लगा कि कोई उन्हें पीछे खींच रहा है, जैसे उलटी हवा में नाव रुक जाए। नीचे देखा तो समुद्र में सिंहिका नाम की राक्षसी थी, जो उड़ते हुए प्राणियों की छाया पकड़कर उन्हें खींच लेती थी। उसने मुँह फाड़ा। हनुमान छोटे होकर सीधे उसके मुख में घुसे, भीतर से उसके मर्म फाड़ दिए और बाहर निकल आए। राक्षसी जल में गिर पड़ी।
आकाश के सिद्धों ने कहा, "जिसमें ये चार गुण हों, धैर्य, सूझ, बुद्धि और दक्षता, वह किसी काम में नहीं हारता।" तीन बाधाएँ आईं, और तीनों का उत्तर अलग था: स्नेह को हनुमान ने विनम्रता से लौटाया, परीक्षा को बुद्धि से जीता, और शत्रु को बल से मारा।
लंका का तट
सौ योजन पूरे हुए। सामने हरे वनों से ढका एक तट था, और उसके पीछे त्रिकूट पर्वत की चोटी पर एक नगरी, जो संध्या की धूप में सोने की तरह चमक रही थी। हनुमान ने सोचा, "इतना बड़ा शरीर देखकर राक्षस चौंक जाएँगे।" वे अपने सहज रूप में आए और लम्ब पर्वत पर उतरे।
न उनकी साँस फूली थी, न थकान थी। वे बोले, "सौ योजन क्या, मैं ऐसे कई सौ योजन लाँघ सकता हूँ।" फिर उन्होंने लंका की ओर देखा और सोचने बैठ गए। नगरी के चारों ओर खाई और सोने का परकोटा था, द्वारों पर धनुषधारी राक्षस खड़े थे। यहाँ बल से नहीं, धैर्य से काम लेना था। उन्होंने सूर्य के डूबने की प्रतीक्षा की।
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