स्वर्ण मृग
मारीच रावण को समझाता है, पर विवश होकर मानता है। स्वर्ण मृग बनकर वह राम को दूर ले जाता है, और राम के स्वर में उसकी अन्तिम पुकार लक्ष्मण को भी भेज देती है।
रावण का रथ समुद्र के पार एक एकान्त आश्रम पर उतरा। वहाँ मारीच रहता था, वही मारीच जिसे किशोर राम के एक बाण ने सौ योजन दूर फेंक दिया था। अब वह जटा और मृगचर्म धारण करके तप करता था।
रावण ने कहा, "मारीच, राम ने मेरी बहन का अपमान किया और मेरी सेना मार डाली। मैं उसकी पत्नी को हर लाऊँगा। तुम सोने का हिरन बनकर उसके आश्रम के सामने घूमो। सीता उसे माँगेगी, राम और लक्ष्मण उसके पीछे जाएँगे, और मैं सूनी कुटिया से सीता को उठा लाऊँगा।"
राम का नाम सुनते ही मारीच का मुँह सूख गया। उसने हाथ जोड़कर कहा:
सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः।
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥
"राजन्, सदा मीठा बोलने वाले लोग बहुत मिलते हैं। पर जो बात कड़वी हो और हित की हो, उसे कहने वाला और सुनने वाला, दोनों दुर्लभ हैं। राम को तुम नहीं जानते। मैं जानता हूँ। तब वह बारह वर्ष का बालक था, और उसके एक बाण से मैं समुद्र में जा गिरा। तब से मुझे हर वृक्ष के पीछे वल्कल पहने राम दिखता है। जिन शब्दों का आरम्भ 'र' से होता है, रथ, रत्न, उन्हें सुनकर भी मैं काँप जाता हूँ। राम धर्म की मूर्ति है। सीता को छूना जलती आग को छूना है। लंका जल जाएगी। लौट जाओ।"
रावण की आँखें लाल हो गईं: "मैंने तुमसे सलाह नहीं माँगी, आज्ञा दी है। नहीं मानोगे तो अभी मारे जाओगे।" मारीच ने सोचा: मरना दोनों ओर है। रावण के हाथ से मरने से अच्छा है राम के बाण से मरूँ। वह रथ पर बैठ गया।
हिरन
सीता कुटिया के बाहर फूल चुन रही थीं। उन्होंने एक ऐसा हिरन देखा जैसा कभी किसी ने नहीं देखा था। शरीर सोने का, उस पर चाँदी की बूँदें, सींग मणियों जैसे, और वह कभी पास आता, कभी दूर भागता। सीता ने पुकारा, "आर्यपुत्र, लक्ष्मण, जल्दी आइए! देखिए कैसा सुन्दर मृग है। इसे पकड़ लाइए। वनवास पूरा होगा तो इसे अयोध्या ले चलेंगे। और यदि जीवित न पकड़ा जाए, तो इसकी खाल पर मैं आपके साथ बैठूँगी।"
लक्ष्मण ने देखते ही कहा, "भैया, ऐसा हिरन संसार में होता नहीं। यह मारीच की माया है।" पर राम ने सीता की आँखों में चाह देखी। बोले, "यदि यह मारीच है, तो इसे मारना वैसे भी मेरा कर्तव्य है। लक्ष्मण, तुम धनुष लेकर यहीं रहो और जटायु के साथ सीता की रक्षा करो। एक क्षण के लिए भी असावधान मत होना।"
पुकार
हिरन राम को खींचता गया। कभी झाड़ियों में छिप जाता, कभी दूर टीले पर दिखता। जब आश्रम बहुत पीछे छूट गया, तब राम समझ गए कि लक्ष्मण ठीक कहते थे। उन्होंने बाण छोड़ा। बाण हृदय में लगा। हिरन का रूप छूट गया और मारीच ताड़ के वृक्ष जितना ऊँचा उछलकर गिरा। मरते-मरते उसने राम के स्वर में पुकारा: "हा सीते! हा लक्ष्मण!"
राम का मन काँप गया। वे तेज़ी से आश्रम की ओर लौटे।
सीता के कठोर वचन
वह पुकार कुटिया तक पहुँची। सीता घबरा गईं: "लक्ष्मण, जाओ! तुम्हारे भाई संकट में हैं।" लक्ष्मण नहीं हिले। "देवी, तीनों लोकों में कोई नहीं जो भैया को हरा सके। यह राक्षस की माया है। भैया ने मुझे आपकी रक्षा सौंपी है।"
भय में मनुष्य वह कह देता है जो बाद में उसे जीवन भर चुभता है। सीता ने कहा, "तुम भाई के शत्रु हो जो उन्हें संकट में देखकर भी खड़े हो। क्या तुम्हारे मन में कोई पाप है? राम के बिना मैं अग्नि में कूद जाऊँगी।"
लक्ष्मण के कानों में जैसे गरम तेल पड़ा। उन्होंने हाथ जोड़े: "आप मेरे लिए देवता के समान हैं, मैं उत्तर नहीं दूँगा। वन के देवता साक्षी हैं कि मैंने उचित कहा था। वे ही आपकी रक्षा करें। मुझे बुरे शकुन दिख रहे हैं।" वे बार-बार मुड़कर देखते हुए चले गए।
लोक-कथाओं में यहाँ कहा जाता है कि लक्ष्मण ने जाते समय कुटिया के चारों ओर एक रेखा खींची, जिसे लक्ष्मण-रेखा कहते हैं। वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग नहीं है, पर इसका अर्थ वही है: कुछ सीमाएँ हमारी रक्षा के लिए होती हैं।
कुटिया अब अकेली थी।
अंतिम अद्यतन:
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