शबरी के बेर
जीवन भर प्रतीक्षा करने वाली वृद्धा वनवासी तपस्विनी शबरी अपने चुने फलों से राम का सत्कार करती हैं। राम उन्हें नवधा भक्ति का उपदेश देते हैं।
पम्पा सरोवर के पश्चिमी किनारे पर मतंग ऋषि का आश्रम था। ऋषि और उनके शिष्य बहुत पहले देह छोड़ चुके थे। फिर भी आश्रम सूना नहीं था। वहाँ के वृक्ष सदा फलों से लदे रहते, और ऋषियों की चढ़ाई मालाएँ कभी मुरझाती नहीं थीं। और वहाँ एक बहुत बूढ़ी तपस्विनी रहती थी: शबरी।
शबरी वन में रहने वाले शबर समुदाय की थीं। युवावस्था में वे इस आश्रम में आई थीं और तब से ऋषियों की सेवा करती रहीं: रास्ते बुहारना, लकड़ी लाना, जल भरना। जब मतंग ऋषि के जाने का समय आया, उन्होंने शबरी से कहा था, "तुम यहीं रहना। एक दिन दशरथ के पुत्र राम इस आश्रम में आएँगे। उनका सत्कार करना। उनके दर्शन से तुम्हें वह लोक मिलेगा जहाँ से लौटना नहीं होता।"
ऋषि ने दिन नहीं बताया था। इसलिए शबरी हर दिन को वही दिन मानती रहीं। हर सुबह वे मार्ग बुहारतीं, फूल बिछातीं और वन से सबसे अच्छे फल चुनकर रखतीं। शाम को फल सूख जाते। अगली सुबह वे फिर चुन लातीं। ऐसा करते-करते उनके केश सफ़ेद हो गए और कमर झुक गई।
वह दिन
एक दिन दो तपस्वी-वेशधारी युवक धनुष लिए आश्रम की ओर आते दिखे। शबरी ने उन्हें देखते ही पहचान लिया। वे दौड़ीं, जितना वह शरीर दौड़ सकता था, और दोनों के चरणों में गिर पड़ीं।
राम ने उन्हें उठाया और पूछा, "तपस्विनी, तुम्हारा तप ठीक चल रहा है? तुम्हारे गुरु की सेवा सफल हुई?"
शबरी ने हाथ जोड़े: "आज आपके दर्शन से मेरा तप सफल हुआ, मेरा जन्म सफल हुआ, और मेरे गुरुओं की सेवा भी। जब आप चित्रकूट में थे, तभी वे दिव्य विमानों पर चले गए थे, और जाते-जाते कह गए थे कि आप आएँगे। मैंने पम्पा के किनारे के वन से आपके लिए तरह-तरह के फल-मूल इकट्ठे किए हैं।"
वाल्मीकि इतना ही कहते हैं। पर भारत के घर-घर में यह कथा एक और रूप में कही जाती है, और वह रूप लोगों को इतना प्रिय है कि वही सच लगता है। शबरी हर बेर को चखकर देखती थीं। जो खट्टा निकलता उसे फेंक देतीं, और जो मीठा होता उसे राम के लिए रख लेतीं। उन्हें यह ध्यान ही नहीं रहा कि जूठा फल किसी को नहीं दिया जाता। और राम ने वे बेर ऐसे स्वाद से खाए जैसे इससे अच्छा भोजन उन्हें कभी मिला ही न हो।
नवधा भक्ति
रामचरितमानस में शबरी संकोच से कहती हैं: "मैं नीच जाति की, मन्द बुद्धि वाली स्त्री हूँ। मैं आपकी स्तुति कैसे करूँ?"
राम उत्तर देते हैं: "भामिनि, मेरी बात सुनो। मैं केवल एक नाता मानता हूँ, भक्ति का। जाति, कुल, धन, बल, चतुराई, ये सब होते हुए भी भक्ति के बिना मनुष्य वैसा है जैसे जल के बिना बादल।" फिर वे नौ प्रकार की भक्ति बताते हैं:
- पहली, सन्तों का संग।
- दूसरी, मेरी कथा में प्रेम।
- तीसरी, अभिमान छोड़कर गुरु की सेवा।
- चौथी, कपट छोड़कर मेरे गुण गाना।
- पाँचवीं, दृढ़ विश्वास से मेरे नाम का जप।
- छठी, इन्द्रियों को वश में रखना और सज्जनों के धर्म पर चलना।
- सातवीं, सारे जगत को मुझमें देखना, और सन्तों को मुझसे भी बढ़कर मानना।
- आठवीं, जो मिल जाए उसमें सन्तोष, और सपने में भी दूसरे के दोष न देखना।
- नवीं, सबसे सरल और निष्कपट व्यवहार, और हर दशा में मुझ पर भरोसा।
"इन नौ में से एक भी जिसमें हो, वह मुझे बहुत प्रिय है। और तुममें तो सभी हैं।"
विदा
शबरी ने राम को वह वन दिखाया जहाँ उनके गुरु तप करते थे, वह वेदी जहाँ वे काँपते हाथों से फूल चढ़ाते थे, और वे मालाएँ जो आज तक ताज़ा थीं। फिर उन्होंने सीता के बारे में सुना और कहा, "पम्पा सरोवर पर जाइए। वहाँ सुग्रीव से आपकी मित्रता होगी। वह सब बता देगा।"
तब शबरी ने कहा, "मैंने जो देखना था, देख लिया। अब आज्ञा हो तो मैं वहाँ जाऊँ जहाँ मेरे गुरु गए हैं।" राम ने कहा, "जाओ, सुख से जाओ।" शबरी ने अग्नि में प्रवेश किया और एक दिव्य रूप में ऊपर उठ गईं।
शबरी के पास न कुल था, न विद्या, न यह निश्चय कि वह दिन कब आएगा। उनके पास केवल प्रतीक्षा थी, और हर सुबह का बुहारा हुआ मार्ग। रामायण कहती है कि इतना ही पर्याप्त था।
यहाँ अरण्यकाण्ड पूरा होता है। राम और लक्ष्मण पम्पा सरोवर की ओर बढ़े, जहाँ ऋष्यमूक पर्वत से कोई उन्हें देख रहा था।
अंतिम अद्यतन:
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